हाथरस भूगोल भर नहीं बल्कि सत्ता, व्यवस्था और वर्चस्व की नग्न तस्वीर है

सिमोन द बोवुआर अपनी पुस्तक 'द सेकंड सेक्स' में लिखती हैं-'One is not born, but rather becomes, woman' (स्त्री पैदा नहीं होती बल्कि उसे बना दिया जाता है). दरअसल, सिमोन इसी सोशल कंस्ट्रक्शन की बात करती हैं. जहां जेंडर के आधार पर स्त्री को गढ़ा जाता है.

Source: News18Hindi Last updated on: October 13, 2020, 11:41 PM IST
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हाथरस भूगोल भर नहीं बल्कि सत्ता, व्यवस्था और वर्चस्व की नग्न तस्वीर है
उत्‍तर प्रदेश का हाथरस केस. (कॉंसेप्ट इमेज)
हम एक ऐसे समाज का हिस्सा हैं जहां जन्म से स्त्री-पुरुष को जेंडर के रूप में गढ़ा जाता है. यह प्रक्रिया फिर ताउम्र चलती रहती है. इस गढ़ंत में समाज द्वारा आरम्भ से ही लड़की को कमजोर साबित करने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है. उसे जीवन की आरम्भिक अवस्था में बता दिया जाता है कि तुम घर के पुरुषों से अलग हो. उसकी यह 'अलग' पहचान परिवार और समाज द्वारा निर्मित होती है. इस पहचान के साथ ही उसके लिए कुछ पैमाने निर्धारित कर दिए जाते हैं जिसके अनुसार उन्हें 'यह करना है, ऐसे करना है और यह नहीं करना' आदि बताया जाता है. यह प्रक्रिया परिवार से आरम्भ होती है जहां लड़की को बताया जाता है कि तुम्हें ऊंची आवाज में बात नहीं करनी, घर के भीतर जो खेल, खेले जा सकते हैं वही खेलने हैं, ऐसे उठना, बैठना, चलना, बातें करना, जवाब देना है.

सामाजिक गढंत (Social Construction) की प्राथमिक पाठशाला परिवार ही है. यहीं से लड़कों को 'शेर' और लड़कियों को 'गाय' जैसा होने की ट्रेनिंग मिलती है. यहां यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि मानसिक व्यवहार में प्रतीकों की बड़ी अहम भूमिका होती है. सिमोन द बोवुआर अपनी पुस्तक 'द सेकंड सेक्स' में लिखती हैं-'One is not born, but rather becomes, woman' (स्त्री पैदा नहीं होती बल्कि उसे बना दिया जाता है). दरअसल, सिमोन इसी सोशल कंस्ट्रक्शन की बात करती हैं. जहां जेंडर के आधार पर स्त्री को गढ़ा जाता है. इस गढ़ंत में सामाजिक और मानसिक व्यवहार की महत्वपूर्ण भूमिका होती है क्योंकि समाज की संरचना में कई खांचे हैं. उन खांचों की निर्मिती मोटे तौर पर MASCULINE ही है. इस MASCULINITY को पोषित परिवार एवं समाज करता है. यह पोषण एक नहीं बल्कि कई स्तरों पर होता है.

कई मामलों में वर्चस्‍व देता है हिंसा को वैधता
अगर सामाजिक संरचना को व्यापक स्तर पर देखें तो इसकी वर्गीय और जातीय संरचना भी स्पष्ट होती है. हिंसा में इस व्यापक संरचना की भी भूमिका होती है. ग्रामीण समाज में महिलाओं पर होने वाली हिंसा में जातीय वर्चस्व को अनदेखा नहीं किया जा सकता है. अगर आप पिछले एक वर्ष के आंकड़े भी उठा कर देख लें तो यह बात स्पष्ट हो जाएगी. कई मामलों में तो यह वर्चस्व हिंसा को वैधता देता हुआ भी दिखाई देता है. आखिर यह साहस आता कहां से है? इस पर विचार करना चाहिए. महिलाओं पर होने वाली किसी भी तरह की हिंसा के विमर्श को सोशल कंस्ट्रक्शन से अलग होकर नहीं देखा जा सकता है.
महिलाओं के खिलाफ अपराध में करीबी की संख्‍या ज्‍यादा
अगर आंकड़ों पर भी नजर डालें तो राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्योरो ने 2019 में जो आंकड़े जारी किए उनके अनुसार महिलाओं के खिलाफ अपराधों की संख्या में वर्ष 2018 की तुलना में 2019 में 7.3% की वृद्धि हुई है. यह रिपोर्ट बताती है कि अनुसूचित जाति के खिलाफ हिंसा में भी 7.2% की वृद्धि हुई है. महिलाओं के खिलाफ दर्ज अपराधों के मामलों में 30.9 प्रतिशत मामलों में अपराधी करीबी ही पाए गए हैं. इसमें पति, पड़ोसी से लेकर रिश्तेदार तक शामिल हैं. ऐसे में सामाजिक संरचना और प्रवृत्ति को समझना जरुरी है. सिर्फ सख्त कानून से इस प्रवृत्ति को नहीं रोका जा सकता है क्योंकि कानून का दखल अभी भी सामाजिक संरचना से बाहर है.

महिलाओं पर होने वाली शारीरिक हिंसा के कई मामले तो दर्ज भी नहीं होते हैं. कई बार समाज के डर से तो कई बार अपराधियों के जातीय वर्चस्व और दबंगई के कारण क्योंकि हमारे समाज में इज्जत की जिम्मेदारी स्त्री के कन्धों पर ही है. उसे ही अग्नि परीक्षा देनी होती है. जो मामले किसी भी तरह से कानून की चौखट तक पहुंच जाते हैं तो वहां भी न्याय के लिए एक अलग संघर्ष है. यह कोई मध्ययुगीन भारत की बात नहीं है बल्कि 21वीं सदी के भारत की है. हाथरस, हस्तिनापुर नहीं है बल्कि 21वीं सदी के विकसित और स्वयं को सभ्य कहने वाले समाज का एक हिस्सा है. हाथरस सिर्फ एक राज्य में अवस्थिति भूगोल भर नहीं है बल्कि सत्ता, व्यवस्था, जातीय संदर्भ और वर्चस्व की नग्न तस्वीर है. क्या 21वीं सदी के भारत की यह स्थिति चिंतनीय नहीं है. यह घटना का इस समाज विचलित नहीं करती है? क्या हाथरस सिर्फ उत्तर प्रदेश तक सीमित है? समय हो तो सोचिए ...महिला को लेकर गैर जिम्‍मेदाराना रहा है सरकारों का रुख
हर एक घटना के बाद इस तरह के अपराधों को लेकर चिंता भी व्यक्त की जाती है लेकिन मूल पर कम ही बात होती है. बात राजनीति, कानून, न्याय और इधर तो मुआवजे पर केन्द्रित हो जाती है. इस डिस्कोर्स में अपराध की प्रवृति नेपथ्य में चली जाती है. निर्भया केस के बाद सख्त कानून की बात उठी और जेएस वर्मा कमेटी ने 2013 में यौन हिंसा कानून में सुधार को लेकर अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी. उस रिपोर्ट में कई बातों के साथ हिंसा की प्रवृति पर बात की गई थी. इस प्रवृत्ति का सोशल कंस्ट्रक्शन से गहरा नाता है लेकिन उस रिपोर्ट की कुछ बातों पर सरकार ने अमल किया और बाकियों के साथ वही हुआ जो इस देश में आयोगों, समितियों की रिपोर्टों के साथ होता रहा है.

महिलाओं पर होने वाले यौन अपराधों को लेकर सामाजिक और क़ानूनी रूप से सभी सरकारों का रुख गैर-जिम्मेदार पूर्ण ही रहा है. इसकी पुष्टि समय-समय पर महिलाओं को लेकर नेताओं के बयान करते हैं. इसलिए सोचने की जरूरत है कि राजनैतिक इच्छाशक्ति अपने स्तर पर समाज के इस अपराधिक व्यवहार को लेकर कितनी गंभीर है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक अध्ययन से पता चलता है कि भारत में प्रत्येक 54वें मिनट पर एक औरत के साथ बलात्कार होता है और वहीं सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ वीमेन के अनुसार भारत में प्रतिदिन 42 महिलाएं बलात्कार का शिकार होती हैं.

बलात्‍कार जैसे अपराध में सजा की दर केवल 27% रही
एनसीआरबी के मुताबिक 2018 में महिलाओं ने करीब 33,356 बलात्कारों की रिपोर्ट दर्ज करवाई. वहीं क़ानूनी कार्यवाही को देखा जाए तो यह आंकड़ा बताता है कि बलात्कार के दोषियों को सजा देने की दर लगभग 27% रही है. यह आंकड़ा सख्त कानून बनने के बाद का है. यह स्थिति तब है जबकि सर्वोच्च न्यायालय भी यह कहता है कि ‘बलात्कार से पीड़ित महिला बलात्कार के बाद स्वयं अपनी नज़रों से गिर जाती है. और जीवन भर उसे उस अपराध की सजा भुगतनी पड़ती है जो उसने किया ही नहीं होता.’ इसके बावजूद भी दोषियों को सजा दिलाने की दर को आप देख सकते हैं.

इससे अपराध की मानसिकता को तो समझा ही जा सकता है साथ ही साथ यह उस लचर न्यायिक व्यवस्था को प्रदर्शित करता है जिसमें हम और आप रह रहे हैं. ऐसे में सवाल है कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक देश इस तरह के जघन्य अपराधों को लेकर कानून के साथ-साथ सामाजिक स्तर पर विफल क्यों रहा है ? आखिर क्यों इस तरह के मामले राजनैतिक नफे- नुकसान के तौर पर देखे जाते हैं? क्यों बलात्कार जैसे जघन्य अपराध में भी जाति खोज निकाली जाती है? क्यों जातीय आधार पर अपराधियों का बचाव किया जाता है? जिस दर से ये अपराध लगातार बढ़ते जा रहे हैं वह बेहद चिंतनीय है. यह हमारे कानून ही नहीं बल्कि समाजीकरण के सिद्धांतों और मूल्यों पर भी गहरे सवाल खड़े करता है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
ब्लॉगर के बारे में
प्रकाश उप्रेती

प्रकाश उप्रेती

उत्तराखंड के खोपड़ा गाँव में जन्म। पहाड़, दिल्ली होते हुए वर्धा से पढ़ाई-लिखाई। हिंदी की महत्वपूर्ण पत्रिकाओं व अखबारों में लेखन। पहाड़ों में विशेष रुचि। मिजाज़ से घुमक्कड़, पेशे से अध्यापक। वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज में तदर्थ अध्यापक के तौर पर अध्यापन कार्य।

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First published: October 13, 2020, 11:38 PM IST
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