हिन्दी दिवस: डिजिटल दौर में भाषा पर गर्व के साथ प्रश्न भी जरूरी

हिन्दी की वैश्विक पहचान भले ही निर्मित हो रही हो लेकिन अपने ही देश में वह निर्वासन झेल रही है. यही स्थिति सोचने पर मजबूर करती है कि क्या सिर्फ गर्व करने से भाषा विकसित होगी?

Source: News18Hindi Last updated on: September 14, 2020, 8:48 AM IST
शेयर करें: Facebook Twitter Linked IN
हिन्दी दिवस: डिजिटल दौर में भाषा पर गर्व के साथ प्रश्न भी जरूरी
दुनिया में लगभग सभी देशों में हिंदी बोलने वालों की संख्या एक अरब तीस करोड़ के पार पहुंच चुकी है.
डिजिटल दौर में तकनीकी का विकास ही नहीं बल्कि वैश्विक स्तर पर साहित्य और संस्कृति का विस्तार भी हुआ. इस विस्तार में हिंदी ने भाषा के बतौर अपनी वैश्विक स्थिति को मजबूत किया और एक पहचान कायम की है. आज दुनिया के बहुत सारे मुल्कों में हिंदी बोली जाती है और उन मुल्कों में भारतीय संस्कृति, परंपरा, धार्मिक अनुष्ठान, तीज-त्योहारों का आयोजन भी समय-समय पर होता रहता है. भारतीय संगीत और नृत्य को लेकर पश्चिमी देशों में बड़ा आकर्षण है. इसके साथ ही भारत की प्राचीन वैदिक संस्कृति को जानने व समझने के लिए भी बहुत सारे लोग हिंदी सीखते हैं. फादर कामिल बुल्के इस बात का एक सशक्त उदाहरण हैं.

आज दुनिया में लगभग सभी देशों में हिंदी बोलने वालों की संख्या एक अरब तीस करोड़ के पार पहुंच चुकी है जो कि दुनिया में बोली जाने वाली किसी भी भाषा से अधिक है. हिंदी की वैश्विक स्वीकार्यता का बड़ा कारण भारत का डिजिटल माध्यमों के जरिए भाषा का विस्तार और उसके फलस्वरूप उपभोक्ता बाजार, हिंदी सिनेमा और भारतीय संस्कृति को जानने-समझने की ललक है. इस ललक में डिजिटल माध्यमों के मार्फ़त हिंदी की उपस्थिति एक महत्वपूर्ण कारक है. माइक्रोसॉफ्ट के जरिए हिंदी का विकास और सोशल मीडिया, यूट्यूब, ब्लॉग आदि के जरिए हिंदी की वैश्विक उपस्थिति ने भारत के प्रति लोगों की जिज्ञासा को बढाया और वैश्विक स्तर पर हिंदी को नई पहचान दी.

नई शिक्षा नीति-2020 में भी भाषा के सवाल को गंभीरता से लिया गया है. भारतीय भाषाओं में ज्ञान निर्माण को प्राथमिकता देने की बात कही गई है. इसमें डिजिटल माध्यमों की बड़ी अहम भूमिका होगी. डिजिटल माध्यमों के जरिए भाषा ने भिन्न-भिन्न देशों के बीच पुल का काम किया और भारतीय ज्ञान, विज्ञान को लेकर पश्चिमी देशों में जो जिज्ञासा का भाव था उसे पंख दिए. भारत, अपनी समृद्ध वैदिक संस्कृति के विविध संदर्भों के कारण विश्व भर के लोगों का केंद्र रहा है. भारत की मजबूत आध्यात्मिक परंपरा और विश्व बंधुत्व की परिकल्पना भी शेष विश्व के नागरिकों को आकर्षित करती रही है.

डिजिटल क्रांति की देन है कि हिंदी तकनीक की भाषा भी बन चुकी है, बहुत सारी ई-कॉमर्स कंपनियों ने हिंदी में ट्रेडिंग आरंभ कर दी है.बड़ी-बड़ी ई- कॉमर्स कंपनियां हिंदी के माध्यम से लोगों को उत्पाद बेच रही हैं. कई कंपनियों ने हिंदी में अपनी सुविधाएँ आरंभ की हैं. फ्लिपककार्ट, अमेज़ॉन जैसी ऑनलाइन कंपनियाँ हिंदी की पुस्तकों के साथ-साथ किंडल जैसे प्लेटफॉर्म पर हिंदी समेत अन्य भारतीय भाषाओं की कृतियाँ आसानी से उपलब्ध होने लगी हैं.
आज हिंदी का अपना एक वैश्विक बाजार निर्मित हो चुका है. इस वैश्विक बाजार में हिंदी सबकी जरूरत है. इसलिए बड़ी-बड़ी कंपनियों के मालिक अपने कर्मचारियों को अन्य भाषाओं के साथ-साथ हिंदी सीखने पर ज़ोर दे रहे हैं. डिजिटल दौर में दुनिया में बाजार और व्यवहार की भाषा हिंदी बनती जा रही है. आज दुनिया के 40 से अधिक देशों के 600 से अधिक विश्वविद्यालयों और स्कूलों में हिंदी की पढ़ाई हो रही है. यह सिर्फ एक भाषा की पढ़ाई नहीं बल्कि भाषा के जरिए भारत की संस्कृति को जानने व समझने का भी अवसर है.

डेनमार्क के एक विश्वविद्यालय में हिंदी की प्राध्यापिका रजनी बहल विदेशी बच्चों के द्वारा बड़ी संख्या में हिंदी सीखने के पीछे के तात्पर्य को स्पष्ट करती हुई बताती हैं कि 'पहले सीटें भरनी बहुत मुश्किल होती थी लोग सिर्फ चाइनीज़ व जापानीज़ सीखने आते थे, मगर अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापार बढ़ जाने से लोग हिंदी सीखने लगे हैं.'


बहल बताती हैं कि उनके पास तीन तरह के विद्यार्थी हिंदी सीखने आते हैं- एक जो इंडियन कंपनियों के साथ मिलकर व्यापार कर रहे हैं. दूसरे, जो इंडियन कुकिंग सीख रहे हैं और इस सिलसिले में उनका भारत जाना भी होता है. इन दो श्रेणी के लोगों को बस बोलचाल के लिए हिंदी जानने में रुचि है. तीसरा, युवा समुदाय जिसे भारतीय संस्कृति व दर्शन में जिज्ञासा है वह ढंग से हिंदी पढ़ना-लिखना जानना चाहता है”. बहल के इस अनुभव से भी काफी कुछ स्पष्ट हो जाता है. वैश्विक स्तर पर भारतीय दर्शन, संस्कृति, को लोग समझ रहे हैं और अपना रहे हैं और इस परंपरा को विस्तार देने में डिजिटल प्लेटफार्म की बड़ी अहम् भूमिका है. इसमें भाषा ही महत्वपूर्ण सेतु है.
इस डिजिटल युग में अलग-अलग माध्यमों और तकनीकी के जरिए पूरी दुनिया भारतीय नृत्य, संगीत एवं अन्य कलाओं से गहरे रूप में परिचित हो पा रही है. विदेशों में भारतीय शास्त्रीय संगीत को लेकर लोगों में बड़ी गहरी रुचि है. वहाँ लोग भारतीय ज्ञान परंपरा के साथ-साथ सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ना चाहते हैं और आज दुनिया के तमाम छोटे-बड़े देशों में भारतीय सांस्कृतिक परंपरा का ज़ोर है.


इस बात को अर्चना पैन्यूली अपने एक आलेख में पुख्ता भी करती हैं- 'विश्व का अगर एक छोटा सा क्षेत्र स्केंडिनेवियन देशों की बात करें तो आँकड़े बताते हैं कि सभी स्केंडिनेवियन देशों में हिंदी समितियाँ और हिंदी धार्मिक एवं सांस्कृतिक संस्थाएँ हैं जो समय-समय पर भारतीय तीज-त्योहारों, राष्ट्रीय दिवसों व अन्य अवसरों पर सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करती रहती हैं. इन कार्यक्रमों में हिंदी भाषा का ही उपयोग होता है. डेनमार्क में नाना प्रकार की भारतीय संस्थाएँ हैं: इंडियन डेनिश सोसाइटी, ऑल इंडियन कल्चरल सोसाइटी डेनमार्क, इंडियंस इन डेनमार्क, मिलाप घर, डेनमार्क तेलुगू एसोसिएशन, बंगाली एसोसिएशन,जो भारतीय त्योहारों व राष्ट्रीय दिवसों पर कार्यक्रम आयोजित कर विदेशों में बसे भारतीयों को अपनी जड़ों से जोड़े रखती हैं और भारतीय संस्कृति को सहेजे हुए हैं. कोपेनहेगन में कुछ संस्थाएँ व व्यक्ति हैं जो भारतीय शास्त्रीय नृत्य व हिंदी सिनेमा के गीतों पर नृत्य पाठशाला चला रहे हैं. उदाहरण के तौर पर- ब्रिटिश महिला लूसी बेनन ओडिसी व हिंदी सिनेमा पर नृत्य पाठशाला चलाती हैं. डेनिश महिला ऐनेमेटे कार्पन, प्रेसिडेंट ऑफ इंडियन म्यूजिक सोसाइटी भारतीय संगीत पर पाठशाला चला रही हैं यही भाषा की ताकत भी है.'

दुनिया के आर्थिक मानचित्र पर जब उदारीकरण, भूमंडलीकरण के साथ ‘ग्लोबल विलेज़’ की अवधारणा ने आकार लिया तो उसके बहुत पहले से ही भारतीय ज्ञान व सांस्कृतिक परंपरा के प्रति विश्वभर के लोगों की रुचि रही है. हाँ, यह जरूर है कि तकनीकी और आर्थिक घेराबंदी ने दुनिया में एक-दूसरे तक की पहुँच को आसान बना दिया. आज बहुत कुछ एक क्लिक से जाना जा सकता है. इस बात का सबसे ज्यादा फायदा बाजार ने उठाया है. बाजार ने भाषा और संस्कृति को भी उत्पाद में बदल दिया है लेकिन इन सबके बावजूद हिंदी की ताकत को बाजार और पूरी दुनिया ने माना है. वैश्वीकरण के माहौल में अब हिंदी विदेशी कंपनियों के लिए भी लाभ का जरिया बनने लगी है. वे अपने उत्पादों को बड़ी आबादी तक पहुंचाने के लिए हिंदी को माध्यम बना रहे हैं.

गूगल से लेकर दुनिया की तमाम बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ हिंदी को तरजीह दे रही हैं. इनका मकसद भले ही उपभोक्ता हो पर उससे कहीं न कहीं हिंदी एक वैश्विक ताकत के तौर पर तो मजबूती पा रही है. यही नहीं 2016 में हुए अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव के मतदान पर्ची पर पहली बार हिंदी में मतदाताओं को धन्यवाद का उल्लेख किया गया था. अमेरिका के चुनावी इतिहास में पहली बार अन्य भाषाओं के साथ हिंदी ने अपनी जगह बनाई. यह एक भाषा के बढ़ते दायरे का प्रतीक तो है ही इसके साथ वैश्विक स्तर पर हिंदी की स्वीकार्यता का प्रमाण भी है.


वैश्विक स्तर पर हिंदी अब व्यापार, रोजगार और पहचान की भाषा बन चुकी है. इस पहचान को मजबूत करने में हिंदी सिनेमा का भी महत्वपूर्ण योगदान है. एक समय में जैसे देवकी नन्दन खत्री के उपन्यासों को पढ़ने के लिए बहुत से उर्दू भाषी लोगों ने हिंदी सीखी ठीक उसी प्रकार आज देश-विदेश में बहुत से भिन्न-भिन्न, भाषा-भाषी हिंदी सिनेमा एवं डिजिटल माध्यमों के कारण हिंदी सीख रहे हैं. भाषा के माध्यम से वह भारत व भारत की संस्कृति से भी परिचित हो रहे हैं. बहुत सी बहुराष्ट्रीय कंपनियों की शाखाएँ भारत में भी हैं. वह बेहतर व्यापार के लिए अपने कर्मचारियों को हिंदी सीखने के लिए बकायदा प्रोत्साहित करते हैं. इस तरह डिजिटल युग में हिंदी की वैश्विक पहचान निर्मित हुई है.आज भाषा सीमाओं से पार, लोगों तक आसानी से पहुँच रही है. इस पहुँचने में डिजिटल माध्यमों की ही भूमिका रही है.

डिजिटल दौर में भाषा को बरतने की प्रविधि में बदलाव भी आए हैं. वह ज़बान के जरिए तो विस्तार पाती ही है लेकिन अब तकनीक भी उसके विस्तार में महत्वपूर्ण कड़ी है. हिंदी की वैश्विक पहचान भले ही निर्मित हो रही हो लेकिन अपने ही देश में वह निर्वासन झेल रही है. यही स्थिति सोचने पर मजबूर करती है कि क्या सिर्फ गर्व करने से भाषा विकसित होगी? पिछले 67 वर्षों से हिंदी दिवस की रस्म पूरी की जा रही है, क्या इससे कोई बदलाव आया है ? हिंदी में ज्ञान निर्माण के लिए सरकारी स्तर पर कितनी कोशिशें हुई हैं ? राजनैतिक ज़मात के लिए हिंदी का वोट के अतिरिक्त क्या महत्व है ? क्या भाषा को लेकर हमारा समाज सचेत रहता है ? कैसे हिंदी पढना और पढ़ाना गर्व का नहीं बल्कि शर्म का विषय बनता गया ? इसी देश में कई स्कूल हिंदी में बात करने पर जुर्माना लगाते हैं ? आखिर क्यों हिंदी के खांटी प्रदेश में 8 लाख बच्चे हिंदी में ही फेल हो जाते हैं ? इन प्रश्नों पर तो विचार करना ही होगा नहीं तो 14 सितम्बर हिंदी के श्राद्ध से ज्यादा कोई महत्व नहीं अर्जित कर पाएगा.

डिजिटल दौर में हिंदी एक ओर वैश्विक स्तर पर स्थापित हो रही है जिसके कई कारण हैं लेकिन वहीं अपने ही देश में हिंदी को लेकर गंभीर उदासीनता है. इस उदासी को समझे बिना वैश्विक ताकत का हर्ष फीका है. भाषा से संस्कृति का गहरा नाता है. इसलिए यह चिंता सिर्फ भाषा के सवाल तक सीमित नहीं रहती है. इसका दूरगामी प्रभाव है. भाषा का कमजोर होना, समाज एवं संस्कृति का कमजोर होना भी है.
ब्लॉगर के बारे में
प्रकाश उप्रेती

प्रकाश उप्रेती

उत्तराखंड के खोपड़ा गाँव में जन्म। पहाड़, दिल्ली होते हुए वर्धा से पढ़ाई-लिखाई। हिंदी की महत्वपूर्ण पत्रिकाओं व अखबारों में लेखन। पहाड़ों में विशेष रुचि। मिजाज़ से घुमक्कड़, पेशे से अध्यापक। वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज में तदर्थ अध्यापक के तौर पर अध्यापन कार्य।

और भी पढ़ें

facebook Twitter whatsapp
First published: September 14, 2020, 8:45 AM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर