आंदोलन की जमीन कमजोर हुई तो जमीन के आंदोलन भी भटके हैं

समाज में प्रतिरोध (Resistance in society) की धारा ही आंदोलन की जमीन (Ground of movement) है लेकिन प्रतिरोध के कई आयाम और तरीके हैं . इन आयामों को कई बुद्धिजीवियों (Intellectuals) ने सैद्धांतिक रूप में समझने और समझाने की कोशिश भी की है.

Source: News18Hindi Last updated on: September 22, 2020, 1:59 PM IST
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आंदोलन की जमीन कमजोर हुई तो जमीन के आंदोलन भी भटके हैं
आज आंदोलन की सफलता एवं विफलता में नागरिक समाज से ज्यादा मीडिया की भूमिका हो गई है.
प्रतिरोध की अभिव्यक्ति और संस्कृति उतनी ही पुरानी है जितना मानव सभ्यता का इतिहास लेकिन प्रतिरोध की प्रकृति व आयामों में जरूर समय की गति के अनुसार परिवर्तन आया है. प्रतिरोध का संबंध मानव की चेतना से है और चेतना के विकास के साथ-साथ प्रतिरोध का दायरा व तरीके भी बदलते रहे हैं. आरंभिक दौर में मनुष्य का प्रतिरोध सामाजिक संस्थाओं से था जो आधुनिक युग में सत्ता से हो गया. सत्ता का अर्थ यहां आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और अपने रूढ अर्थ में राजनैतिक संदर्भ से है. प्रतिरोध की चेतना आंदोलन के लिए जमीन तैयार करती है. आधुनिक लोकतान्त्रिक प्रणाली में तो आंदोलन एक महत्वपूर्ण टूल है. सत्ता और संस्थानों की निरकुंशता के खिलाफ आवाज उठाने का सशक्त तरीका आंदोलन ही है. डॉ. लोहिया ने आंदोलन की ताकत को समझते हुए ही कहा था- ‘अगर सड़कें खामोश हो जाएँ, तो संसद आवारा हो जाएगी’. यह बात आंदोलनों के महत्व और लोकतंत्र में उनकी जरूरत को रेखांकित करती है. सैद्धांतिक तौर पर आंदोलन को समझे तो यह यथास्थिति के खिलाफ आक्रोश की सुनियोजित अभिव्यक्ति है. कुछ लोग इस यथास्थिति को बनाकर रखना चाहते हैं और कुछ लोग उसे तोड़ना चाहते हैं. इस यथास्थिति को खत्म करना या उसके प्रति आक्रोश अभिव्यक्त करना ही आंदोलन का प्रथम उद्देश्य होता है. यह आक्रोश ही प्रतिरोध की जमीन तैयार करता है. इस तरह से आक्रोश के जरिए प्रतिरोध की ताकत जन्म लेती है और फिर किसी आंदोलन का उदय होता है.

आंदोलन एक प्रकार का सामाजिक परिवर्तन है, जिसका प्रारम्भ मुख्यतः व्यवस्था की जड़ता व परिस्थितियों के प्रति उपजे असंतोष से होता है. हाल में चल रहे आंदोलनों को इससे समझा भी जा सकता है लेकिन इधर आंदोलनों की प्रकृति एवं प्रवृत्ति में भी परिवर्तन हुआ है. अब आंदोलन का स्वरूप 19वीं सदी वाला नहीं रहा है बल्कि उसमें सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक कई परिवर्तन देखे जा सकते हैं. कई बार आंदोलन एक सुनियोजित व प्रायोजित तरीके से सामने आते हैं जिनका लक्ष्य पहले से तय होता है लेकिन कई बार स्वत: स्फूर्त या (SPONTANEOUS) रूप में उभरते हैं. इस (Spontaneity) में लंबे समय से पल रहे प्रतिरोध की अहम् भूमिका होती है जो कि एक बड़े आंदोलन के रूप में मुखरित होता है. भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ऐसा ही था.

आंदोलन की प्रकृति को लेकर अरुण कुमार अपने एक लेख में प्रश्नकर्ता की मुद्रा में लिखते हैं कि 'क्या आंदोलन स्वत: स्फूर्त होते हैं ? वे कब और कैसे घटित होते हैं ? इसको समझने के लिए समाजशास्त्रीय, राजनीतिक और ऐतिहासिक अध्ययन की जरूरत है. समाज की चेतना में परिवर्तन से आंदोलनों का दोतरफा रिश्ता है. हाल के समय में साम्यवादी, समाजवादी, राष्ट्रवादी, नारीवादी, अमेरिका में अश्वेतों के, भारत में दलित आंदोलन, दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद विरोधी, परमाणु विरोधी, पर्यावरणीय और धार्मिक आंदोलनों के कारण व्यवहार में परिवर्तन देखा गया है.' सामाजिक ढाँचे में परिवर्तन के साथ-साथ आंदोलनों की प्रवृत्ति और प्रकृति में भी परिवर्तन आया है . इसलिए आंदोलन के साथ-साथ प्रतिरोध को भी समझना जरुरी है.

समाज में प्रतिरोध की धारा ही आंदोलन की जमीन है लेकिन प्रतिरोध के कई आयाम और तरीके हैं . इन आयामों को कई बुद्धिजीवियों ने सैद्धांतिक रूप में समझने और समझाने की कोशिश भी की है. इटली के अंतोनियो ग्राम्शी, हंगरी के बुद्धिजीवी कार्ल पोलोनी और जेम्स सी. स्कॉट आदि बुद्धिजीवियों ने अपने-अपने ढंग से प्रतिरोध का परीक्षण कर उसके आंतरिक लक्षणों को सामने लाने का काम किया है. ग्राम्शी प्रतिरोध में पूंजीवाद और उसकी संपूर्ण संरचना ने जिस असमानता को वैश्विक स्तर पर जन्म दिया है उसके खिलाफ बौद्धिक वर्ग की भूमिका को देखते हैं. परंपरागत अर्थशास्त्र के खिलाफ काम करने वाले पोलोनी ने अपना विश्लेषण अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मुक्त बाज़ार के भौतिक प्रभावों के खिलाफ प्रतिरोध पर केंद्रित किया. नव-मार्क्सवादी स्कॉट प्रतिरोध के वैयक्तिक स्तर पर ज्यादा ध्यान देते हैं . उनके अनुसार रोजाना होने वाले प्रतिरोध ज्यादा जरूरी है क्योंकि वे ही एक संस्कृति, एक आंदोलन और एक राष्ट्र बनाते हैं, क्योंकि यही प्रतिरोध लोगों को सक्रिय आंदोलनकारी बनाए रखता है.
मार्क्स और एंगेल्स के मुताबिक समाज अपने विभिन्न वर्गों के बीच संघर्ष के चलते ही आगे बढ़ा है . कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो में लिखा उनका प्रसिद्ध कथन, ‘आज तक का जीवित सभी समाजों का इतिहास वर्ग संघर्षों का इतिहास रहा है’ इन सभी संदर्भों को रेखांकित करता है. इसके साथ ही आंदोलनों के अध्येता सुंदर चंद ठाकुर प्रतिरोध की इस पूरी संस्कृति को पावर की संरचना से जोड़कर देखते हैं, 'मानव सभ्यता के इतिहास को देखें तो यह बात साफ दिखती है कि प्रतिरोध की संस्कृति सत्ता या पावर की संस्कृति जितनी ही पुरानी है. सभ्यता की हर संरचना में हमें सत्ता और प्रतिरोध का समानांतर आगे बढ़ता हुआ पारस्परिक संबंध दिखाई देता है. मध्ययुग में जहां यह संबंध सामाजिक संरचना की बुनियाद के रूप में उभरकर आया और प्रतिरोध पर सत्ता की पावर ज्यादा हावी होती दिखाई दी, वहीं आधुनिक युग तक आते-आते प्रतिरोध की ताकत सामंतवाद और साम्राज्यवाद के समक्ष लोहा लेती दिखाई देती है. उत्तर आधुनिक काल तक आते-आते सत्ता के स्वरूप में जबर्दस्त बदलाव दिखाई देता है. अब पावर सिर्फ राजनीतिक सत्ता या उसके सामाजिक निकायों तक सीमित नहीं रह गई, बल्कि वह बाज़ार, सामाजिक वर्ग, ज्ञान, पैसा, आदि तक दिखाई देने लगी.' शक्ति के इस विकेंद्रीकरण ने आंदोलनों की प्रवृत्ति में ख़ासा परिवर्तन किया है. इधर के आंदोलन सत्ता परिवर्तन से ज्यादा व्यवस्था परिवर्तन के आंदोलन रहे हैं और व्यवस्था में भी वो कितना परिवर्तन कर पाए यह देखा जा सकता है लेकिन सत्ता ने आंदोलनों को खत्म करने नए-नए तरीके जरुर ईजाद कर लिए.

इन मांग आधारित आंदोलनों को सत्ता द्वारा या तो थका कर खत्म कर दिया गया या फिर अपनी परिणिति पर पहुँचने से पहले ही ये बिखर गए. बहुत से आंदोलन समझौतों के साथ भी खत्म हुए. 21वीं सदी का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन जिसे अन्ना या लोकपाल बिल आंदोलन के तौर पर भी जाना जाता है, उसकी अंतिम परिणिति समझौते पर ही हुई. ऐसे में परम्परागत तौर-तरीकों से वर्तमान के आंदोलनों को नहीं आंका जा सकता है. आज आंदोलन की सफलता एवं विफलता में नागरिक समाज (civil society) से ज्यादा मीडिया की भूमिका हो गई है. क्योंकि वही ‘ओपिनियन मेकर’ के तौर पर उभर आया है. इसलिए हाल में जितने भी आंदोलन हुए उनका सत्ता पर वैसा असर ही नहीं हुआ जैसा होना चाहिए था.

उदाहरण के तौर पर पिछले एक दशक में हुए किसानों, शिक्षकों, छात्रों, आंगनबाडी कर्मचारियों आदि के आंदोलनों को देख सकते हैं. इन जमीन के आन्दोलनों का संसद पर वैसा असर नहीं हुआ जैसा पहले हुआ करता था. याद कीजिए दिल्ली के जंतर-मंतर पर कर्नाटक के किसान अपनी आवाज संसद तक पहुँचाने के लिए रोज नए-नए तरीके ईजाद कर रहे थे लेकिन उनसे कुछ ही दूरी पर स्थित संसद तक उनकी आवाज नहीं पहुंची. अंतत: कुछ वादों और समझौतों के साथ थक-हार कर वो लौट गए. ऐसा ही आंगनबाडी की महिलाओं और छात्र, शिक्षकों के आंदोलनों के साथ भी हुआ. इसका एक कारण संगठित प्रयास में आई कमी है तो वहीं दूसरा, सत्ता द्वारा आंदोलनों को थका कर खत्म कर देने की रणनीति. इसके चलते आंदोलनों का चरित्र भी समझौतावादी और सुविधाभोगी होता चला गया. भारतीय मध्यवर्ग ने आंदोलन की जमीन को मजबूत करने की बजाए कमजोर ही किया है. उसी के कारण किसानों से लेकर छात्रों तक के आंदोलन को सत्ता ने गंभीरता से नहीं लिया क्योंकि इधर आंदोलनों ने भी अपनी गंभीरता को धूमिल किया है.हाल के वर्षों में अगर आन्दोलन की जमीन कमजोर हुई है तो जमीन के आंदोलन भी दिशा भटके हैं. आंदोलनों का चरित्र भी बदल गया. अब हिंसक और अहिंसक आंदोलन के बीच की लकीर धुंधली हो गई है. राज्य का दमन आन्दोलनों को दबाने के लिए हमेशा ही रहा है लेकिन आंदोलनों का अहिंसात्मक चरित्र उनकी ताकत थी. यह ताकत भी कमजोर हुई है. इसने राज्य को आंदोलनों के दमन की अभूतपूर्व शक्ति दे दी. इसलिए आंदोलन जैसे सामूहिक प्रयास विफल हो रहे हैं. हाल के आंदोलन में कोई बहुत परिवर्तनकारी आंदोलन नज़र नहीं आता है और जो कुछ एक चुनौतीपूर्ण आंदोलन खड़े भी हुए हैं तो उन्हें या तो सत्ता ने नज़र अंदाज कर खत्म कर दिया या फिर उनकी परिणिति समझौते में हो गई. यह कहीं से भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है. एक जीवट और जीवंत लोकतंत्र में आंदोलन या सडक की आवाजें बहुत महत्वपूर्ण होती हैं. जनता के लिए ही नहीं बल्कि सत्ता के लिए भी आंदोलनों का होना आवश्यक है. सत्ता द्वारा आंदोलन की आवाज को अनसुना करना लोकतंत्र की नींव का कमजोर होना है.
ब्लॉगर के बारे में
प्रकाश उप्रेती

प्रकाश उप्रेती

उत्तराखंड के खोपड़ा गाँव में जन्म। पहाड़, दिल्ली होते हुए वर्धा से पढ़ाई-लिखाई। हिंदी की महत्वपूर्ण पत्रिकाओं व अखबारों में लेखन। पहाड़ों में विशेष रुचि। मिजाज़ से घुमक्कड़, पेशे से अध्यापक। वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज में तदर्थ अध्यापक के तौर पर अध्यापन कार्य।

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First published: September 22, 2020, 1:59 PM IST
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