नई शिक्षा नीति 2020 : नीति, नीयत और नियमन

आजाद भारत में शिक्षा पर बात होते हुए भी सबसे ज्यादा अनदेखी शिक्षा की ही हुई. कमीशन पर कमीशन बने लेकिन शिक्षा का मूलभूत ढांचा औपनिवेशिक भारत वाला ही रहा. उसमें परिवर्तन की कोशिश कम ही नजर आई. आजादी के बाद राजनैतिक जमातों ने माना कि एक बेहतर समाज के निर्माण में शिक्षा बहुत ही महत्वपूर्ण है लेकिन सिर्फ ऐसा माना.

Source: News18Hindi Last updated on: August 7, 2020, 8:28 PM IST
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नई शिक्षा नीति 2020 : नीति, नीयत और नियमन
इन प्रावधानों का लिखित रूप कमोबेश पहले की नीतियों जैसा ही है. कुछ नई चीजों को भी जोड़ा गया है.
शिक्षा को लेकर कोई नीति बने और उसका पाठ चंद बिंदुओं में होकर सिमट जाए. एक नागरिक समाज में इस गंभीर विषय का ऐसा अगम्भीर पाठ, शिक्षा को लेकर हमारी सोच, सजगता और चिंतन को आईना दिखाने जैसा है. इस तरह के पाठ का नतीजा ही है कि हम राजनैतिक हलकों में भी शिक्षा को लेकर वह गंभीरता नहीं देखते हैं जो कि होनी चाहिए. बस 'विश्व गुरु' कह देने भर से तो काम नहीं चलेगा. उसके लिए शिक्षा जैसे अहम मुद्दे को लेकर गंभीर होना पड़ेगा. बेसिक शिक्षा से लेकर व्यावहारिक शिक्षा तक पर चिंतन करना पड़ेगा. सीधे तौर पर मैकाले की वर्चस्ववादी नीति से बाहर निकलना होगा तभी वह नींव या फाउंडेशन मजबूत होगी जिसका जिक्र बस मिड-डे मील तक सीमित है. इसलिए नई शिक्षा नीति 2020 को वर्तमान के साथ बीते हुए कल और आने वाले कल के परिप्रेक्ष्य में भी समझना होगा.

इस समझ में नीति का क्रियान्वयन महत्वपूर्ण पक्ष है. अक्सर नीतियां बनती हैं और बस कागजों तक सीमित रह जाती हैं. धरातल पर उनका क्रियान्वयन होता ही नहीं है. उदाहरण के रूप में 1968 और 1986 की 'शिक्षा नीति' की सिफारिशों को देखा जा सकता है. इसलिए नई शिक्षा नीति 2020 के नए पन से कम महत्वपूर्ण उसका क्रियान्वयन नहीं है.

आजाद भारत में शिक्षा पर बात होते हुए भी सबसे ज्यादा अनदेखी शिक्षा की ही हुई. कमीशन पर कमीशन बने लेकिन शिक्षा का मूलभूत ढांचा औपनिवेशिक भारत वाला ही रहा. उसमें परिवर्तन की कोशिश कम ही नजर आई. आजादी के बाद राजनैतिक जमातों ने माना कि एक बेहतर समाज के निर्माण में शिक्षा बहुत ही महत्वपूर्ण है लेकिन सिर्फ ऐसा माना. इस मानने की परिणिति University Education Commission (1948-1949) और Secondary Education Commission (1952-1953) के रूप में हुई. उसके बाद  Education Commission (1964-66) बना और फिर सन् 1968 में भारत की पहली शिक्षा नीति कोठारी कमीशन की सिफारिशों पर लागू हुई. इस नीति में भी कई ऐसे प्रावधान थे जिनको लेकर शिक्षा में अमूल-चूल परिवर्तन की बात कही जा रही थी. उनमें से प्रमुख प्रावधान थे.

भाषाओं का विकास, माध्यमिक स्तर पर त्रिभाषा नीति, 14 वर्ष तक के सभी बच्चों को अनिवार्य शिक्षा, रोजगार परक शिक्षा, विज्ञान एवं कृषि संबंधी शिक्षण संस्थानों का विकास, संस्कृत भाषा को बढ़ावा देना और उसमें शिक्षा और शिक्षण पर अतिरिक्त ध्यान देना, उच्च शिक्षा पर विशेष ध्यान देना, शिक्षा के साथ खेल व सांस्कृतिक गतिविधियों को भी अनिवार्य करना और उसे शिक्षा का हिस्सा मानना और 10+2+3 के प्रारूप को लागू करना.
नीति में वह सभी बातें थी जो शिक्षा, शिक्षण, शिष्य और शिक्षकों के लिहाज से महत्वपूर्ण थी. कोठारी कमीशन का यह प्रयास भारतीय शिक्षा प्रणाली में परिवर्तनकारी हो सकता था लेकिन इसका क्रियान्वयन ही नहीं हो पाया. नीति कागज तक सीमित रह गई. कुछ बातें सुविधा के अनुरूप अपना ली गईं बाकी कागजों में धूल खाती रहीं.
इस नीति के 18 वर्ष बाद सन् 1986 में दूसरी शिक्षा नीति आई. इस शिक्षा नीति में सन् 1992 में संसोधन हुआ. उसके बाद 1993 में प्रो. यशपाल कमेटी बनी और इस नीति की सिफारिशों को लागू करने की कोशिश की गई. इस दूसरी शिक्षा नीति में बहुत सी बातें वही थीं जो पहली शिक्षा नीति में थीं. इस नीति की प्रमुख सिफारिशें -  सबके लिए शिक्षा में समान अवसर पैदा करना, तकनीक आधारित शिक्षा को बढ़ावा देना,  प्राथमिक शिक्षा को बेहतर करने के लिए 'ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड', नवोदय विद्यालय खोलना और ग्रामीण भारत में शिक्षा की पहुंच को सुलभ बनाना, ओपन यूनिवर्सिटी और दूरस्थ शिक्षा का विस्तार करना, इंजीनियरिंग और मेडिकल में राष्ट्रीय स्तर पर सयुंक्त प्रवेश परीक्षा का प्रावधान, शिक्षकों के प्रशिक्षण पर जोर, भाषा के विकास पर गंभीरता दिखाना, महिलाओं, पिछड़े और अल्पसंख्यकों को शिक्षा से जोड़ना व इस ओर विशेष ध्यान देना और विज्ञान सम्मत शिक्षा प्रणाली का विकास करना आदि प्रावधान थे. नीति की यह सभी बातें भविष्य के भारत की शिक्षा प्रणाली को बेहतर बनाने वाली थी. लेकिन प्रश्न वही कि क्या ये लागू हो पाई? जमीनी स्तर पर इनकी हकीकत से कौन वाकिफ़ नहीं है.

इसके बाद जब 21वीं सदी की पहली और भारत की तीसरी नई शिक्षा नीति 2020 में आई तो फिर वही प्रश्न खड़े हो गए जो पूर्व में थे. इस नई शिक्षा नीति के लक्ष्य को 2040 तक पूरा करने की बात कही जा रही है. इससे पहले की नीतियों में भी लक्ष्य थे लेकिन जमीन पर वह उतरे ही नहीं. अगर कोठारी कमीशन की सिफारिशें ही धरातल पर आ जाती तो आज संस्कृत की वो हालत नहीं होती जो है.
मैकाले की नीतियों से हम बाहर आ चुके होते. भारत की सभी भाषाओं का विकास हो चुका होता और समाज, वैज्ञानिक चेतना से लैस होता. जबकि ऐसा नहीं है. इसलिए नई शिक्षा नीति को एक साथ आशा और संदेह की दृष्टि से देखा जा रहा है. इस नीति में बहुत से प्रावधान तो वही हैं जो पिछली नीतियों से चले आ रहे हैं और आगे की नीतियों में भी चलते रहेंगे, ऐसा लगता है. क्योंकि शिक्षा को लेकर हमारी गंभीरता आज भी बहुत कम है. नीति निर्माता शिक्षा को 'राज्य का विषय' कम ही मानते हैं. वह धीरे-धीरे शिक्षा को निजी हाथों में देने पर ज्यादा जोर दे रहे हैं. शिक्षा का यह निजीकरण दूसरी शिक्षा नीति के आने के बाद से जोर-शोर से होने लगा था. आज तो उसी का विस्तार हो रहा है. अब 34 वर्षों के बाद नई शिक्षा नीति 2020 में आई है.  इन वर्षों में हुए बदलावों को देखते हुए शिक्षा नीति में भी बदलाव की आवश्यकता थी.  यह शिक्षा नीति 2015 में बनी सुब्रह्मण्यन कमेटी और 2017 में गठित डॉ. कस्तूरीरंगन समिति की सिफारिशों पर तैयार की गई है. 2019 में 650 पेज का इसका मसौदा सार्वजनिक किया गया था ताकि इस संदर्भ में सुझाव दिए जा सकें और अब कैबिनेट की मंजूरी के साथ नई शिक्षा नीति 2020 को वैधता दे दी गई है.

यह एक तरह से आने वाले वर्षों में शिक्षा को लेकर नीति क्या होगी उसका प्रारूप है. एक तरह से विजन डॉक्यूमेंट है. इसके आधार पर ही शिक्षा की दिशा-दशा तय होगी. यही भविष्य के भारत का निर्माण करने वाला डॉक्यूमेंट है. इसलिए इसे बहुत जल्दी में पढ़ा जाना देश और भविष्य दोनों की सेहत के लिए हानिकारक है. सरकार ने इसकी सिफारिशों को 2040 तक पा लेने का लक्ष्य रखा है. इसलिए यह जानना जरुरी है कि आखिर इसमें भविष्य की शिक्षा के लिए क्या बातें हैं और उसकी दिशा क्या होगी. मोटे तौर पर नई शिक्षा नीति 2020 को- प्राथमिक शिक्षा, बोर्ड आधारित शिक्षा, उच्च शिक्षा और  शिक्षण पद्धति व शोध की दिशा आदि के संदर्भ के साथ समझा जा सकता है.  इस नीति में प्राथमिक शिक्षा पर जोर दिया गया है. यह मानते हुए कि बच्चों की सीखने की ललक सबसे ज्यादा आरम्भिक वर्षों में होती है.
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कक्षा 6 से ही व्यावसायिक शिक्षा पर जोर दिया जाएगा.


प्राथमिक शिक्षा के तौर पर 3 से 6 वर्ष की आयु वाले बच्चों के लिए प्री- स्कूल की व्यवस्था होगी जिसमें मुख्य रूप से आँगनबाड़ी और बाल वाटिका के जरिए बच्चों में खेल- खेल में ही रूचि पैदा की जाएगी. उसके बाद 6 वर्ष की उम्र में पहली कक्षा में दाखिला होगा. इससे पहले यह उम्र 5 वर्ष थी. साथ ही रटने की बजाय समझने वाली शिक्षा पद्धति को बढ़ावा दिया जाएगा और बच्चों पर कम से कम मानसिक तनाव पड़े इसके लिए सिलेबस का बोझ भी कम किया गया है. 5वीं कक्षा तक बच्चों के लिए मातृभाषा/ स्थानीय या क्षेत्रीय भाषा को शिक्षण के माध्यम के रूप में प्रयोग करने की बात कही गई है. साथ ही इसे 8वीं तक संभव हो तो बढ़ाने की बात भी कही है. भाषा के विकास के लिए त्रिभाषा फ़ॉर्मूला को अपनाया जाएगा,  कक्षा 6 से ही व्यावसायिक शिक्षा पर जोर दिया जाएगा. कला, विज्ञान और कॉमर्स अनुशासनों के चुनाव के लिए अंकों की रेस को खत्म किया जाएगा, वोकेशनल शिक्षा को स्कूल स्तर से ही बढ़ावा दिया जाएगा, 10+2 के शैक्षिक मॉडल के स्थान पर 5+3+3+4 प्रणाली को अपनाया जाएगा, स्नातक पाठ्यक्रम में मल्टीपल एंट्री एंड एक्ज़िट व्यवस्था होगी जिसमें स्नातक कोर्स में छात्र कई स्तरों पर पाठ्यक्रम को छोड़ सकेंगे और उन्हें उसी के अनुरूप डिग्री या प्रमाण-पत्र प्रदान दिया जाएगा, 1 वर्ष के बाद प्रमाणपत्र, 2 वर्षों के बाद एडवांस डिप्लोमा, 3 वर्षों के बाद स्नातक की डिग्री और 4 वर्ष में शोध के साथ स्नातक की डिग्री दी जाएगी, शोध के लिए एम.फिल को समाप्त कर दिया गया है और शिक्षा पर जीडीपी का 6% खर्च किया जाएगा. शिक्षकों के परिशिक्षण की व्यवस्था होगी, ‘शिक्षकों के लिये राष्ट्रीय व्यावसायिक मानक’ का विकास किया जाएगा और  रिसर्च की अलग व्यवस्था की जाएगी आदि प्रावधान इस नई शिक्षा नीति में हैं.

इन प्रावधानों का लिखित रूप कमोबेश पहले की नीतियों जैसा ही है. कुछ नई चीजों को भी जोड़ा गया है. असल मसला इनके क्रियान्वयन का ही है. शिक्षा पर जीडीपी का 6% खर्च करने की बात 1986 में कही गई थी लेकिन हुआ कभी नहीं. त्रिभाषा फ़ॉर्मूला, संस्कृत को बढ़ावा देना आदि चीजों को अपनाने की बात तब भी थी लेकिन जमीन पर कुछ नहीं उतरा. शिक्षा की हालत दिनों-दिन खराब होती गई. शिक्षा को ‘वस्तु’ (कॉमोडिटी) के तौर पर देखा जाने लगा. WTO में  बकायदा शिक्षा को उत्पाद के रूप में रखा गया. राज्य ने हर शिक्षा नीति के साथ शिक्षा से स्वयं को मुक्त और उसे निजी हाथों में देने की कोशिश जारी रखी. उसी का परिणाम वह ‘प्राइवेट स्कूल’ हैं जिन्हें ‘पब्लिक स्कूल’ कहा जाता है. जनता और शिक्षा के साथ इससे बड़ा मजाक क्या होगा कि लाखों में फ़ीस लेने वाले स्कूलों को ‘पब्लिक स्कूल’ कहा जाता है. यही शिक्षा की नीति और नीयत है. इसलिए नई शिक्षा नीति को ध्यान से समझने की जरूरत है.  साथ ही यह सोचना होगा कि शोध की गुणवत्ता एम.फिल. खत्म कर देने से कैसे बढ़ जाएगी ? कॉलेजों को स्वायत्त कर देने से उच्च शिक्षा से कितने लोग वंचित रह जाएँगे ? यह उच्च शिक्षा के निजीकरण की तरफ पहला कदम तो साबित नहीं होगा ? जहाँ स्कूल से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक 40 से 50 प्रतिशत शिक्षकों के पद रिक्त हैं वहां कैसे नई शिक्षा नीति के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है. इस तरह के कई सवाल और आशंकाएं हैं जिनका जवाब भविष्य के गर्भ में है.

इस शिक्षा नीति को पढने के बाद एक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि अब तक तीनों शिक्षा नीतियों में संस्कृत, हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं के विकास की बात कही गई है लेकिन इनमें कहीं भी निजी स्कूलों, कॉलेज और विश्वविद्यालयों में संस्कृत, हिंदी आदि के पठन- पाठन पर कोई जोर नहीं दिया गया है. ऐसे में भाषा का विकास कैसे होगा ? उसको बढ़ावा देने का क्या अर्थ है ? इस तरफ भी विचार करना चाहिए.

इस तरह से यह शिक्षा नीति कई सकारात्मक बिंदुओं के साथ आशंकाएं भी पैदा करती है. खासकर उच्च शिक्षा और शिक्षा के निजीकरण को लेकर. इसकी नीति, नीयत और नियमन को गंभीरता से समझना होगा. शिक्षा का सवाल ज्वर नहीं है. इसलिए सभी पक्षों पर ठहर कर विचार करना होगा. तभी वर्तमान का भविष्य सही दिशा में अग्रसर होगा.
ब्लॉगर के बारे में
प्रकाश उप्रेती

प्रकाश उप्रेती

उत्तराखंड के खोपड़ा गाँव में जन्म। पहाड़, दिल्ली होते हुए वर्धा से पढ़ाई-लिखाई। हिंदी की महत्वपूर्ण पत्रिकाओं व अखबारों में लेखन। पहाड़ों में विशेष रुचि। मिजाज़ से घुमक्कड़, पेशे से अध्यापक। वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज में तदर्थ अध्यापक के तौर पर अध्यापन कार्य।

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First published: August 7, 2020, 8:23 PM IST
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