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ऑनलाइन शिक्षण क्लास रूम का विकल्प नहीं हो सकता  

दुनिया के कई उत्कृष्ट संस्थान और शिक्षाविद इस नए दौर में ‘शिक्षण की तकनीक’ और ‘क्लास रूम’ की उपयोगिता पर बात करने लगे हैं. एक तरफ वर्चुअल शिक्षण पर जोर है और उसके लिए अलग-अलग तरह की तकनीक का सहारा लिया जा रहा है. दूसरी तरफ शिक्षण संस्थान वर्चुअल शिक्षण के लिए लगातार दबाव बना रहे हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: May 23, 2020, 2:44 PM IST
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ऑनलाइन शिक्षण क्लास रूम का विकल्प नहीं हो सकता  
कोरोना वायरस के दौरान दुनियाभर में ऑनलाइन क्लास का चलन बढ़ा है.
कोविड़-19 के बाद दुनिया के मानचित्र में बहुत कुछ बदलने वाला है. भूगोल में भले ही कोई परिवर्तन न आए लेकिन आंतरिक संरचना और संस्थाओं में बड़े बदलाव होने सुनिश्चित हैं. यहाँ से दुनिया भर की संस्थाओं का इतिहास- कोविड-19 युग से ‘पूर्व’ और ‘बाद’ की दृष्टि से पढ़ा व समझा जाएगा. इस महामारी के कारण फिजिकिल या सोशल डिस्टेंसिंग व्यक्ति और उनके समूहों के बीच ही नहीं बल्कि संस्थाओं के बीच भी पैदा हो गई है. इसका गहरा असर स्वास्थ्य सेवाओं के साथ शिक्षण संस्थाओं पर भी पड़ने वाला है. स्वास्थ्य सेवाओं में जहाँ ढांचागत परिवर्तन होगा तो वहीं शिक्षण संस्थाओं में संरचनागत बड़े बदलाव देखे जा सकते हैं. यहाँ से दुनिया शिक्षण पद्धति में बड़े बदलावों की तरफ बढ़ रही है. हाल में दिल्ली विश्वविद्यालय ने ऑनलाइन ‘ओपन बुक’ परीक्षा लेने का विकल्प देकर इस बदलाव की ओर संकेत भी दे दिए हैं. अकादमिक हलकों इसे कोविड-19 युग के बाद शिक्षण के विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है.

दुनिया के कई उत्कृष्ट संस्थान और शिक्षाविद इस नए दौर में ‘शिक्षण की तकनीक’ और ‘क्लास रूम’ की उपयोगिता पर बात करने लगे हैं. एक तरफ वर्चुअल शिक्षण पर जोर है और उसके लिए अलग-अलग तरह की तकनीक का सहारा लिया जा रहा है. दूसरी तरफ शिक्षण संस्थान वर्चुअल शिक्षण के लिए लगातार दबाव बना रहे हैं. हर रोज नए तरह के ‘एप’ को माध्यम के तौर पर प्रयोग करने के दिशा-निर्देश जारी हो रहे हैं लेकिन वर्चुअल शिक्षण के शोर में,  चुनौतियाँ और विद्यार्थियों के पक्ष की बात कहीं गुम हो जा रही है. इस परिवर्तन में क्लास रूम, कॉलेज, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, पूर्व में चल रहे दूरस्थ शिक्षा के नतीजे,  विदेशों से पढने आने वाले विद्यार्थी, तकनीक की पहुँच, गांवों में बसते भारत आदि पर बहुत कम बात हो रही है. वर्चुअल शिक्षण से इन सब पर क्या असर होगा, उस पर उतनी मजबूती से बात नहीं हो रही जितनी की वर्चुअल शिक्षण के गुणों को बताने में हो रही है. उसमें एक तरह से क्लास रूम और कोविड-19 पूर्व की शिक्षण पद्धति को संदेह की दृष्टि से देखा जा रहा है. वर्चुअल शिक्षण को क्लास रूम शिक्षण के स्थापना के तौर प्रस्तुत किया जा रहा है. वाकई क्या ऐसा संभव है ! यह  एक अस्थाई स्थिति तो हो सकती लेकिन क्या यही भविष्य में क्लास रूम शिक्षण का विकल्प होगा ? इस प्रश्न के साथ यह बात भी अंतर्निहित कि हम ‘क्लास रूम’ शिक्षण को समझते कितना हैं.

आप क्या पहले बिना क्लास रूम के शिक्षण की कल्पना कर सकते थे? क्या शिक्षण मात्र विश्वविद्यालय द्वारा निर्धारित ‘सिलेबस’ को पढ़ा देना भर है? एक क्लास की संरचना का क्या कोई असर विद्यार्थी पर नहीं होता? क्या एक शिक्षक के लिए यह संभव है कि वह बिना ‘आई कॉटेक्ट’ के अदृश्य में पढ़ाते रहे? शिक्षक का छात्र से पढ़ाने भर का संबंध होता है? क्या वर्चुअल शिक्षण में विद्यार्थी की अन्य प्रतिभाओं को जाना व समझा जा सकता है? क्या आप बिना क्लास रूम के विद्यार्थी की मानसिकता को समझ सकते हैं? क्लास रूम मात्र ब्लैक- बोर्ड और डेस्क तो नहीं है न ? क्या वर्चुअल के शोर में इन सारे प्रश्नों को नकारा जा सकता है? वर्चुअल शिक्षण के जरिए इसकी पूर्ति हो सकती है? मुझे लगता है कि वर्चुअल शिक्षण की जरूरतों पर विचार करने से पहले क्लास रूम पर बात होनी चाहिए. वर्चुअल शिक्षण के पक्ष में तर्क देने वाले सिर्फ ‘शिक्षण होना चाहिए’ इस संदर्भ में ही बात कर रहे हैं जबकि यह विश्लेषण सतही और बदली हुई परिस्थितियों में भविष्य की शिक्षण पद्धति को समझने के लिए पर्याप्त नहीं है! क्लास रूम शिक्षण का स्थानापन या विकल्प कंप्यूटर की स्क्रीन नहीं हो सकती है. जैसे सामाजिकता का विकल्प एकाकीपन थोड़ा न. यह तो एक तरह से विलोम को ही विकल्प बना देने जैसा है. इसे ही भविष्य के तौर पर देखना कितना भयानक है. ‘तकनीक आधारित शिक्षा’ और ‘तकनीक से ही शिक्षा–शिक्षण’ में बहुत अंतर है. इस अंतर को समझ लेने से क्लास रूम शिक्षण और कॉलेज के ‘स्पेस’ की महत्ता स्पष्ट हो जाएगी .

एक विद्यार्थी के शिक्षण में कॉलेज का वातावरण भी महत्वपूर्ण होता है. वह कॉलेज में अलग-अलग अनुशासन के विद्यार्थियों और शिक्षकों से मिलता है. यही वह जगह होती है जहाँ वह अपने भीतर की प्रतिभा को आकार देता है. कॉलेज में एक विज्ञान का विद्यार्थी कई घंटे लैब में बिताने के बाद लॉन या एम.पी. थिएटर में नाटक की रिहर्सल कर रहा होता है. हिंदी, अंग्रेजी, इतिहास और राजनीतिशास्त्र के विद्यार्थी अपने-अपने विषयों को एक-दुसरे के जरिए भी समझने की कोशिश करते हैं. एक तरह से शिक्षा और शिक्षण का अंतरानुशासनिक वातावरण तैयार होता जिसका प्रभाव विद्यार्थी के अध्ययन के साथ-साथ मानसिकता पर भी पड़ता है. यह सब संभव कॉलेज के वातावरण में हो पाता है. क्या किसी ‘एप्पल’ के कंप्यूटर  या फोन की स्क्रीन में इसे रचा जा सकता है? कैमरे के जरिए विद्यार्थियों के चेहरे भर देख लेने से शिक्षण संभव है? कॉलेज के उस वातावरण की परिपूर्ति कहाँ से होगी? क्या इसकी अनदेखी की जा सकती है ? वर्चुअल शिक्षण के पक्ष में तर्क देने वाले शिक्षाविद क्या इसका भी कोई प्रतिपक्ष रच रहे हैं? इन बातों को नजरअंदाज करके ‘पढाई’ पर बात हो सकती है!, ठहर कर सोचना होगा. यह भी देखना होगा कि अब तक जो इसी तरह के ‘शिक्षण के मोड़’ थे, उनकी क्या स्थिति है.
व्यक्तियों के बीच की सोशल/ फिजिकल डिस्टेंसिंग से कहीं गंभीर मसला शिक्षण में अपनाए जाने वाली ‘डिस्टेंस’ से है. भारत के कई विश्वविद्यालय दूरस्थ या डिस्टेंट मोड़ से पढाई करवाते हैं. मेरे पहले वाक्य को आप ‘डिग्री बांटते हैं’ भी पढ़ सकते हैं. यूजीसी द्वारा गठित कई कमेटियों ने दूरस्थ माध्यम से दी जाने वाली शिक्षण पद्धति के तरीकों से लेकर गुणवत्ता को प्रश्नांकित किया है. यह कोई छुपा हुआ तथ्य भी नहीं है लेकिन इस दौर में हम वापस ‘डिस्टेंट मोड़ ऑफ़ एजुकेशन’ की तरह ही तो बढ़ रहे हैं. विद्यार्थियों को गठरी भर शिक्षण सामाग्री उपलब्ध करा देना और कहीं भी बैठकर उनको वीडियो के जरिए लगभग एकालाप की मुद्रा में पढ़ा देने से शिक्षा और शिक्षण को लेकर डिस्टेंस ही बढेगा. इस डिस्टेंस से जुड़े वर्चुअल शिक्षण के पक्षधर जब यह कहते हैं कि ‘आप जो बोल रहें हैं वह रिकॉर्ड होगा, अब क्लास रूम की तरह कुछ भी बोल देने से नहीं चलेगा बल्कि सोच- समझकर और तैयारी के साथ बोलना होगा’. तो यह तर्क चीजों को बहुत ही सरलीकृत कर देखना है. आज आप क्लास में बिना तैयारी के जा ही नहीं सकते हैं. अब विद्यार्थी आप से ज्यादा सजग रहते हैं. शिक्षक जो कह रहे हैं उसे ज्यों का त्यों मान लेने वाली पीढ़ी को गुजरे कई साल हो गए हैं. इसलिए ऐसे तर्क देना कहीं न कहीं विद्यार्थियों के विवेक को भी संदेह की दृष्टि से देखना है. वर्चुअल शिक्षण दूरी को पाटने की बजाय बढ़ाएगा ही. यह दूरी कई स्तरों पर होगी.

भारत में शिक्षण के लिए बहुत से विदेशी विद्यार्थी भी आते हैं. भारत सरकार द्वारा वर्ष 2019 की जारी AGR रिपोर्ट के अनुसार 47,427 विदेशी विद्यार्थीयों ने उच्च शिक्षा में प्रवेश लिया. यही रिपोर्ट कहती है कि दुनिया के 164 मुल्कों से विद्यार्थी भारत में पढने आते हैं. ये विदेशी विद्यार्थी भारत में रहकर सिर्फ पढ़ते ही हैं क्या ! इनका भारतीय संस्कृति, भाषा, परिवेश से कोई नाता नहीं होता? इनके जरिए भी क्या भारतीय संस्कृति का फैलाव दुनिया में नहीं होता ? इसका माइक्रो स्तर पर अर्थव्यवस्था से कोई संबंध नहीं है ? इन सब सवालों का जवाब वर्चुअल शिक्षण में संभव है? क्या सूडान का कोई विद्यार्थी अपने देश में बैठकर भारतीय प्रोफेसर से वर्चुअल शिक्षण लेकर भारत को जान सकता है ? इन सब सवालों के आलोक में भी वर्चुअल शिक्षण को देखना होगा लेकिन दुर्भाग्य कि इसके पक्षधर इन सवालों से बचते हुए निकलकर अपनी बात कह रहे हैं.

हार्वड यूनिवर्सिटी ने अब अगले सत्र से वर्चुअल क्लास ही करने का फैसला ले लिया तो हम क्यों नहीं कर सकते हैं कि मानसिकता से चलने वाला नहीं है. अभी हार्वड बहुत दूर है. हम तो अभी ‘बैक बेंचर’ के प्रश्नों में ही उलझे हैं. इस वर्चुअल शिक्षण से ‘बैक बेंचर’ की ग्रंथि टूट जाएगी इसी से लहालोट हो रहे हैं और इसे ही परिवर्तन की बड़ी सफलता मान रहे हैं. विद्यार्थियों की समस्याओं का एक यही हल वर्चुअल शिक्षण के पक्षधर लोगों के पास है. यहाँ जब मैं विद्यार्थी कह रहा हूँ तो हमें लड़कियों और दिव्यांग विद्यार्थियों की समस्या पर अलग से विचार करना होगा. वर्चुअल शिक्षण में उनके साथ पेश आने वाली कठिनाइयों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. दिल्ली विश्वविद्यालय के ‘दौलत राम कॉलेज’ में पढ़ाने वालीं डॉ. संज्ञा उपाध्याय जब लडकियों की ऑनलाइन क्लास लेने के अपने अनुभवों को सोशल मीडिया पर साझा करती हैं तो लड़कियों के हवाले से लिखती हैं, “मैम मैं अब और क्लास नहीं कर सकूंगी. मेरा मोबाइल रीचार्ज नहीं हो सकता है. पापा ने मना कर दिया है, पैसे नहीं हैं”  और “मैम, एक ही कमरे का घर है. क्लास के वक्त सब वहीं होते हैं. कोई भी किसी काम के लिए कह दे, तो मना नहीं कर सकती और ध्यान भी बंटता है, इसलिए...” इन समस्याओं का समाधान वर्चुअल शिक्षण में कैसे हो सकता है? ऐसे में इन सभी प्रश्नों पर गंभीरता से विचार करना होगा नहीं तो वर्चुअल शिक्षण के फायदे गिनाते-गिनाते हम बड़ी आबादी को ‘शिक्षा’ से वंचित भी कर सकते हैं! इसे हम भारत में इंटरनेट की उपलब्धता, स्कूल और कॉलेज से ड्रॉप-आउट दर आदि के हवाले से भी समझ सकते हैं. इसलिए फिलहाल तो वर्चुअल शिक्षण कहीं से भी स्थाई तौर पर क्लास रूम टीचिंग का  विकल्प नहीं हो सकता है. पढना सिर्फ ‘पढना’ नहीं वह न वह गुनना और गढ़ना भी है.(नोटः यह लेखक के निजी विचार हैं)
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ब्लॉगर के बारे में
प्रकाश उप्रेती

प्रकाश उप्रेती

उत्तराखंड के खोपड़ा गाँव में जन्म। पहाड़, दिल्ली होते हुए वर्धा से पढ़ाई-लिखाई। हिंदी की महत्वपूर्ण पत्रिकाओं व अखबारों में लेखन। पहाड़ों में विशेष रुचि। मिजाज़ से घुमक्कड़, पेशे से अध्यापक। वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज में तदर्थ अध्यापक के तौर पर अध्यापन कार्य।

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First published: May 23, 2020, 2:40 PM IST
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