Opinion: विकास की दौड़ में पीछा छूटता पर्यावरण, 'उपभोग' पर लगा प्रश्न चिन्ह

पूरी दुनिया के जंगलों का 10वां भाग पिछले 20 वर्षों में खत्म हुआ है. भारत में एक समय 50 प्रतिशत से अधिक वन क्षेत्र था. आज वह सिकुड़ते हुए केवल 24.5% ही रह गया है. इसके बावजूद भी विकास के मुखौटे के साथ जो नीतियां बन रही हैं वह प्रकृति विरोधी हैं. इसका ताजा उदाहरण दूनघाटी का है.

Source: News18Hindi Last updated on: October 30, 2020, 9:59 AM IST
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Opinion: विकास की दौड़ में पीछा छूटता पर्यावरण, 'उपभोग' पर लगा प्रश्न चिन्ह
भारत में विकास की होड़ ने पर्यावरण के संकट को जन्म दिया. आधुनिक सभ्यता में जो विकास का खाका बना उसी का परिणाम पर्यावरणीय संकट है.
विकास का क्या अर्थ है! विकास की नीति में जंगल, जमीन, जल और जीवन के लिए कितनी गुंजाइश है! विकास की नीति मानवीय जरूरतों से लालसाओं की तरफ तो नहीं बढ़ गई है! क्या लाखों पेड़ों को काटना, पहाड़ों को ध्वस्त करना, जंगली जीवों को विस्थापित करना, नदियों के नैसर्गिक बहाव को बांधना ही विकास है ! क्या घर-घर तक सड़कों का जाल बिछ जाना ही विकास है ? मनुष्य के जीवन को अधिक से अधिक सुविधाभोगी बनाना ही विकास की नीति का ध्येय है ! इस पर सोचना चाहिए. गांधी ने जब यह कहा-"प्रकृति में सभी की आवश्यकताओं की पूर्ति करने की क्षमता है पर लालसा एक मनुष्य की भी पूरा नहीं कर पाएगी" तो दरअसल वह विकास की उन्हीं बेलगाम नीतियों की बात कर रहे थे जिनका असर आज दिखाई दे रहा है. इन बेलगाम नीतियों के कारण जो प्राकृतिक दोहन हो रहा है उसमें हमारी बढ़ती जरूरतें, अनियंत्रित लालच और उपयोग की जगह उपभोग की प्रवृत्ति है जबकि मनुष्य और प्रकृति का रिश्ता सृष्टि के आरंभ से ही सह-अस्तित्व का रहा है लेकिन सभ्यता के विकास के साथ यह रिश्ता कमजोर होता गया है.

भारत में विकास की होड़ ने पर्यावरण के संकट को जन्म दिया. आधुनिक सभ्यता में जो विकास का खाका बना उसी का परिणाम पर्यावरणीय संकट है. विकास के मॉडल को लेकर आजाद भारत में दो तरह की सोच और नीतियां रहीं हैं. एक जिसे नेहरू का विकास मॉडल कहा गया जिसका ज़ोर मानव श्रम से ज़्यादा मशीनी संचालन में था जिसका आधार औद्योगिक और तकनीकी को बढ़ावा देना था, तो वहीं दूसरा मॉडल गांधी का था जो कि कुटीर और लघु उद्योगों के साथ मानव श्रम पर ज़ोर देता है लेकिन भारत ने नेहरू के विकास मॉडल को अपनाया और गांधी धीरे-धीरे पीछे छूटते गए. आज तो वह बहुत दूर हो चुके हैं. अब जो पूंजी आधारित और संचालित विकास मॉडल है उसमें पर्यावरण हाशिए की वस्तु है. 80 के दशक में पश्चिमी देशों में व्यक्ति पहले या प्रकृति पहले (man first or nature) की बहस भी चली. इसकी गूंज भारत में भी सुनाई दी. इसके बाद भी पर्यावरण को दृष्टि में रखकर हमारी नीतियां नहीं बनी. नीति निर्माताओं के लिए पर्यावरण हमेशा नेपथ्य का सवाल रहा है जबकि पर्यावरण के प्रति जागरूकता और चिंता का संबंध मनुष्य के अपने परंपरागत अधिकारों से है.

पर्यावरण के साथ मनुष्य का आरंभ से गहरा रिश्ता रहा है लेकिन उपभोग की लालसा ने धीरे-धीरे इस रिश्ते को तहस-नहस कर डाला. उसी का परिणाम है कि आज पर्यावरण संरक्षण पूरे विश्व में चिंता का विषय है. पर्यावरण के संकट के प्रति वैश्विक स्तर पर विकसित और विकासशील देशों द्वारा 1972 में स्टॉकहोम सम्मेलन किया गया उसके बाद वैश्विक स्तर पर पर्यावरण की समस्या व जलवायु परिवर्तन को लेकर बहसें हुईं और पर्यावरणीय संकट को पहचाना गया.


जब वैश्विक स्तर पर यह सब हो रहा था उसी के एक वर्ष बाद 1973 में उत्तराखंड के चमोली जिले के रेणी गांव के लोगों ने आजाद भारत के पहले पर्यावरण आंदोलन को जन्म दिया. यह आंदोलन था 'चिपको आंदोलन'. इस आंदोलन में महिलाओं और जनसामान्य ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और पर्यावरण को लेकर एक नई बहस को जन्म दिया. इस चेतना व आंदोलन के बावजूद भी जो वन नीतियां और विकास की नीतियां बनी उनमें पर्यावरण की बराबर अनदेखी की गई. ऐसा निरंतर होता रहा. लोगों ने आवाज उठाई और अपने संसाधनों को बचाने के लिए आंदोलन किए लेकिन सरकार की नीतियों में कोई बड़ा अंतर नहीं आया. कुछ समय पहले ही उत्तराखंड में चारधाम यात्रा के लिए बन रही ऑलवेदर रोड के प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए पर्यावरण मंत्रालय ने 25,300 पेड़ों को काटने की अनुमति दे दी थी क्योंकि विकास का अर्थ पहाड़ों में ‘सड़क’ हो गया है. सरकार की चिंताओं में कभी पर्यावरण रहा ही नहीं. उनकी नीतियां विकास के उस पॉपुलर व फौरी ढांचे के अनुरूप होती हैं, जहां पर्यावरण का सवाल नेपथ्य में चला जाता है जबकि हमारे देश में जल, जंगल और जमीन संस्कृति और पवित्रता के प्रतीक माने जाते हैं. आरंभ में प्रकृति के साथ मनुष्य का रिश्ता ‘उपयोग’ का था न की आज की तरह ‘उपभोग’ का. जैसे-जैसे सभ्यता का विकास हुआ वैसे-वैसे प्रकृति और मनुष्य का रिश्ता भी कमजोर होता गया और प्रकृति उपभोग और हमारी लालसाओं की शिकार बनती गई. जो ग्लेशियर (हिमालय पर बहने वाली बर्फीली नदियां) 20,000 साल पहले अपने उच्चतम स्तर पर थे. करीब 12,000 साल पहले ये थोड़े पिघलने लगे और आज स्थिति यह है कि ग्लेशियर लगातार पिघल ही रहे हैं. हिमालय क्षेत्र की पूरी पारस्थितिकी ही बदल गई है. वर्ष दर वर्ष नदियों का जल स्तर कम होता जा रहा है. पहाड़ों से निकलने वाली कई नदियां बिल्कुल सूख चुकी हैं. इसके बाद भी हमारी नीतियों में विकास की वह सोच है जो भविष्य के लिए विनाश का कारण होगी.
पूरी दुनिया के जंगलों का 10वां भाग पिछले 20 वर्षों में खत्म हुआ है. भारत में एक समय 50 प्रतिशत से अधिक वन क्षेत्र था. आज वह सिकुड़ते हुए केवल 24.5% ही रह गया है. इसके बावजूद भी विकास के मुखौटे के साथ जो नीतियां बन रही हैं वह प्रकृति विरोधी हैं. इसका ताजा उदाहरण दूनघाटी का है. यह घाटी वैसे भी संवेदनशील है.


इसके बावजूद उत्तराखंड सरकार ने देहरादून के जॉली ग्रांट एयरपोर्ट का विस्तार करने के लिए शिवालिक ऐलिफेंट रिज़र्व एरिया की 215 एकड़ जमीन का हिस्सा लेने का फैसला किया है. इसमें थानो क्षेत्र के लगभग 10 हज़ार पेड़ काटे जाएंगे. इससे दून घाटी की पारिस्थितिकी पर गहरा प्रभाव तो पड़ेगा ही साथ ही इस पूरे क्षेत्र में रहने वाले वन्य प्राणियों के जीवन पर भी गहरा संकट आ जाएगा. विकास की इस दौड़ में इनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है. जबकि यहां पर पहले से ही एयरपोर्ट है और यहीं नहीं बल्कि इसके अतिरिक्त राज्य में अन्य जगहों जैसे पन्त नगर, गौचर और पिथौरागढ़ आदि जगहों पर भी हवाई पट्टियां हैं. उसके बावजूद इस हवाई अड्डे का विस्तार सरकार करना चाहती है. सरकार इसे राष्ट्रीय से अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा बनाना चाहती है. इसके लिए 10 हजार पेड़ों की बलि और हजारों वन्य प्रणियों के जीवन को नष्ट करने में भी सरकार को गुरेज नहीं है. सरकार की प्राथमिकता नए 10,000 पेड़ लगाना नहीं है और न ही पारिस्थितिकी, जो एक मात्र जरूरी चीज है वह है: 'विकास'. इस विकास और विस्तार के नाम पर इस क्षेत्र की 30 से भी ज्यादा पेड़ों की प्रजातियों को नष्ट किया जा रहा है. यह क्षेत्र हाथियों के लिए महत्वपूर्ण है. इसके बावजूद भी सरकार यहां हर हाल में एयरपोर्ट का विस्तार करना चाहती है. इस लिए सवाल उठता है कि क्या विस्तार इतना जरुरी है कि उसके बिना काम नहीं चल सकता? इस विस्तार जो विनाश हो रहा है उसकी भरपाई कैसे होगी?

सोचना यह भी होगा कि क्या वाकई यह ऐसी जरूरत है जिसके लिए पूरी पारिस्थितिकी को खतरे में डाला जा सकता है? क्या यह उपयोग से ज्यादा उपभोग की प्रवृत्ति का नतीजा तो नहीं है ? विकास के इस प्रापूरी दुनिया के जंगलों का 10वां भाग पिछले 20 वर्षों में खत्म हुआ है. भारत में एक समय 50 प्रतिशत से अधिक वन क्षेत्र था. आज वह सिकुड़ते हुए केवल 24.5% ही रह गया है. इसके बावजूद भी विकास के मुखौटे के साथ जो नीतियां बन रही हैं वह प्रकृति विरोधी हैं. इसका ताजा उदाहरण दूनघाटी का है.रूप के साथ हम दुनिया को कहां ले जा रहे हैं! साथ ही विकास के इस मॉडल का क्या कोई स्थानापन हो सकता है! जहां पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना समाज की जरूरतों को भी पूरा किया जा सकता है. क्या फिर से गांधी के मॉडल पर विचार नहीं करना चाहिए ! क्या आत्मनिर्भरता विकास के वर्तमान मॉडल में संभव है या फिर गांधी और गांव की तरफ लौटना होगा ? इन प्रश्नों को इस विकास के बरक्स देखना होगा और ठहर कर अगर सोचा जाए तो इनके जवाब भी मिल जाएंगे.
(डिस्क्लेमर: यह लेखक के निजी विचार हैं.) 


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
प्रकाश उप्रेती

प्रकाश उप्रेती

उत्तराखंड के खोपड़ा गाँव में जन्म। पहाड़, दिल्ली होते हुए वर्धा से पढ़ाई-लिखाई। हिंदी की महत्वपूर्ण पत्रिकाओं व अखबारों में लेखन। पहाड़ों में विशेष रुचि। मिजाज़ से घुमक्कड़, पेशे से अध्यापक। वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज में तदर्थ अध्यापक के तौर पर अध्यापन कार्य।

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First published: October 30, 2020, 9:54 AM IST
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