राहत इंदौरी 'थे' नहीं 'हैं'

राहत इंदौरी साहब ने शायरी में अद्भुत प्रयोग किए हैं. उनकी शायरी और ग़ज़लों में जहाँ एक ओर शब्दों की कारीगरी है तो वहीं दूसरी ओर कहन में एक अलग अंदाज है. इसी अंदाज का मुरीद पूरा हिन्दोस्तान है. सैफ़ुद्दीन सैफ़ का यह शेर राहत साहब के अंदाज़-ए-बयाँ पर सटीक बैठता है- "अंदाज़-ए-बयाँ रंग बदल देता है, वर्ना दुनिया में कोई बात नई बात नहीं". राहत साहब का यही अंदाज़-ए-बयाँ उन्हें अपने समकालीन शायरों से जुदा करता है और उनकी एक अलग पहचान भी बनाता है. वह गहरी बात को भी मामूली ढंग से कहने वाले शायर थे.

Source: News18Hindi Last updated on: August 12, 2020, 6:41 PM IST
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राहत इंदौरी 'थे' नहीं 'हैं'
राहत साहब ने फिल्मों के लिए गीत भी लिखे लेकिन उनका मन तो शायरी में ही रमता था. (फाइल फोटो)
एक शायर जो अपने समाज को शब्दों में उकेर देता है. उसके शब्दों की खनक सत्ता के गलियारों तक पहुंचती है. वह रौशन जिंदगी की परछाई में उभरते अँधेरे को रचता है. वह किसी खास दौर का नहीं बल्कि हर दौर का शायर है. उसके 'कहन' में वो गति है जो अनकहे को भी बयां कर देती है. शायरी या कविता अपने कहन में अगर विपक्ष रचती है तो राहत इंदौरी साहब उस विपक्ष की सबसे मजबूत आवाज़ हैं. राहत साहब के लिए "थे" लिखा ही नहीं जा सकता है. वह तो हैं और सदियों रहेंगे. अभी उनकी शायरी आने वाली कई नस्लों की ज़बान पर रहेगी और उस शायरी के साथ राहत साहब जिंदा रहेंगे. वैसे भी कला को जिंदा रखने वाला इंसान मरता नहीं है.

राहत साहब ने शायरी में अद्भुत प्रयोग किए हैं. उनकी शायरी और ग़ज़लों में जहाँ एक ओर शब्दों की कारीगरी है तो वहीं दूसरी ओर कहन में एक अलग अंदाज है. इसी अंदाज का मुरीद पूरा हिन्दोस्तान है. सैफ़ुद्दीन सैफ़ का यह शेर राहत साहब के अंदाज़-ए-बयाँ पर सटीक बैठता है- "अंदाज़-ए-बयाँ रंग बदल देता है, वर्ना दुनिया में कोई बात नई बात नहीं". राहत साहब का यही अंदाज़-ए-बयाँ उन्हें अपने समकालीन शायरों से जुदा करता है और उनकी एक अलग पहचान भी बनाता है. वह गहरी बात को भी मामूली ढंग से कहने वाले शायर हैं-

अभी गनीमत है सब्र मेरा, अभी लबालब भरा नहीं हूं मैं

वो मुझको मुर्दा समझ रहा है, उसे कहो मरा नहीं हूं मैं.
आजादी के बाद शायरी को जीवन संवाद से जोड़ने वाले जो चंद शायर थे उनमें से एक नाम राहत इंदौरी का है. राहत साहब  हर दौर में आवाम  की आवाज़ बने. उनकी शायरी में एक ओर प्रेम है तो दूसरी ओर संघर्ष की जिजीविषा नजर आती है.

आँख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो

ज़िंदा रहना है तो तरकीबें बहुत सारी रखोबहुत ग़ुरूर है दरिया को अपने होने पर

जो मेरी प्यास से उलझे तो धज्जियां उड़ जाएं.

उनकी शायरी का तीखापन अक्सर सत्ताधारी लोगों के स्वाद को खराब कर देता है. वह समय की नब्ज़ को भली-भांति पकड़ने वाले शायर हैं. तभी वह सियासत के छद्म को बेनक़ाब करते हुए समकालीन मुद्दों पर बैखौफ़ अंदाज़ से लिखते हैं-

जो आज साहिबे मसनद हैं,कल नही होंगे,

किरायेदार हैं, ज़ाती मकान थोड़ी है...

सभी का खून है शामिल यहां की मिट्टी में,

किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी है.

यह बात राहत इंदौरी ही कह सकते हैं. यह उन्होंने उस दौर में कहा जब लोकतंत्र को कैद कर लिया गया था. उनके फ़न का यही अंदाज था कि हुकूमत किसी की भी रही हो उनकी आवाज हमेशा जनपक्षधर ही रही. उस दौर में भी वह सत्ता को आइना दिखा रहे थे और इस दौर में भी. वह 70-80 के दशक से ही अपनी आवाज़ को आवाम तक पहुंचाते रहे हैं. एक बात राहत साहब के लिए कही जाती है जो वो कई इन्टरव्यू में बता चुके हैं कि जब वो नवीं कक्षा में थे तब स्कूल में एक मुशायरा हुआ. उस मुशायरे में जांनिसार अख्तर आए हुए थे. राहत साहब ने उनका ऑटोग्राफ लिया और कहा कि ‘मैं भी शे'र पढ़ना चाहता हूँ, इसके लिए क्या करना होगा’.अख्तर साहब ने उन्हें कहा कि, ‘पहले कम से कम एक हजार शे'र याद कर लो.’ इस बात पर राहत साहब बोल पड़े कि इतने शे'र तो मुझे अभी याद हैं. उसके बाद अख्तर साहब ने उन्हें एक शे’र में कहा- ‘तो फिर इस शे'र को पूरा करो और उन्होंने लिखा- ‘हमसे भागा न करो दूर, ग़ज़लों की तरह’ यह पढ़कर राहत बोल दिए- ‘हमने चाहा है तुम्हें, चाहने वालों की तरह’. उस उम्र में भी राहत इंदौरी को 3 हजार के आस-पास शे’र याद थे. यह वह प्रतिभा थी जो उस कच्ची उम्र से ही एक अलग ख़्वाब देख रही थी. वही दुनिया आज हम सबके सामने है. राहत साहब ने हमेशा जांनिसार अख्तर का बहुत ही एहतराम किया लेकिन शायरी की दुनिया में उनके उस्ताद ‘कैसर इंदौरी’ थे. उनकी शागिर्दी में ही राहत साहब ने एक समय अपने नाम के साथ ‘कैसरी’ जोड़ लिया था. वह ‘राहत कैसरी’ लिखने लगे थे. उसके बाद उस्ताद की सलाह पर ही उन्होंने अपना नाम ‘राहत इंदौरी’ रख लिया था. आज हम सभी उन्हें इसी नाम से जानते हैं.

राहत साहब ने फिल्मों के लिए गीत भी लिखे लेकिन उनका मन तो शायरी में ही रमता था. इसलिए उस गली को संकरी ही रहने दिया और विस्तार ग़ज़लों की दुनिया को दिया. फिल्मों में उन्होंने सर, जानम, औज़ार, आरज़ू, मिशन कश्मीर, घातक, मुन्नाभाई एमबीबीएस, खुद्दार जैसी कई फिल्मों के लिए गाने लिखे. उनके गानों में शायरी की महक और मोहब्बत की तडप थी. उनके कई गाने लोगों की ज़बान पर भी चढ़े लेकिन उनको वह दुनिया बहुत रास नहीं आई.

वह एक ऐसे शायर थे जो सियासत और मोहब्बत पर समान गति से लिखते थे. वह एक ओर सियासत की तिकडमी चाल को समझते थे तो वहीं दूसरी ओर मोहब्बत की दुश्वारियों से भी वाकिफ़ थे. वह सियासत को जब देखते हैं तो कुछ इस लहजे में अपने दौर की हलचल को व्यक्त करते हैं-

मुझे खबर नहीं, मंदिर जले हैं या मस्जिद

मेरी निगाह के आगे तो सब धुआं है मियां .

इसी के साथ जब वह मोहब्बत पर लिखते हैं तो जी भरकर लिखते हैं. वह भी बिना लागलपेट के-

फूलों की दुकानें खोलो, खुशबु का व्यापार करो

इश्क़ खता है तो, ये खता एक बार नहीं, सौ बार करो.

राहत साहब का यही वो अंदाज़ था जो उन्हें जीवंत शायर बनाता है. उन्होंने शायरी को आम लोगों तक पहुंचाया. राहत इंदौरी खांटी उर्दू के शायर नहीं हैं. उनकी शायरी में आवाम की आवाज़ और वही भाषा है. इसलिए पिछले 4-5 दशकों में देश-विदेश का कोई ऐसा बड़ा मुशायरा नहीं होगा जिसमें राहत इंदौरी साहब ने शिरकत न की हो. उनकी शायरी के दीवाने हर मुल्के में और हर दौर में रहे. उनके लिए शायरी इल्म भी और इल्तिजा भी है . तभी तो वो कहते हैं-

मैं मर भी जाऊं तो मेरी इक अलग पहचान लिख देना

लहू से मेरी पेशानी पे हिन्दुस्तान लिख देना..

इस शे’र को कहते हुए जिसने भी राहत इंदौरी को देखा होगा उसके ज़हन में आज भी वो ‘कहन’ का अंदाज ज़िंदा होगा. वह शे’र पढ़ते नहीं बल्कि कहते हैं. उनके कहने का जो अंदाज़ है वो दृश्य पैदा कर देता है. राहत साहब को शायरी कहते हुए देखना भाषा, दृश्य और भंगिमा के एक विहंगम स्वरूप से रु-ब-रु होना है. अब यह संभव नहीं. इस दौर में राहत साहब का अलविदा कहना सबको खलेगा. कई दशकों तक दिलों पर राज करने वाला शायर दिल का दौरा पड़ने से दुनिया को अलविदा कहे यह विडम्बना ही है. दिल के धडकने और रुक जाने के बीच जो महीन लकीर है उसका दुख इतना बड़ा हो सकता है, यह राहत साहब के जाने से समझा जा सकता है. वह मौत से तो कभी डरे ही नहीं लेकिन ऐसे चले जाएंगे, किसी ने सोचा न था-

राह में ख़तरे भी हैं लेकिन ठहरता कौन है

मौत कल आती है आज आ जाए डरता कौन है

तेरे लश्कर के मुक़ाबिल मैं अकेला हूँ मगर

फ़ैसला मैदान में होगा कि मरता कौन है.

यह कहने वाला शायर मर थोड़े न सकता है. आप उनकी शायरी से इत्तेफाक रखें या न रखें लेकिन उन्हें भुलाया तो नहीं जा सकता है. उनकी शायरी की गूंज सड़क से लेकर संसद तक सुनाई देती है और आगे भी रहेगी. एक शायर के लिए यही सबसे बड़ा ताज है. इसलिए राहत साहब जिन्दा थे और जिन्दा रहेंगे. उनकी शायरी का टोन भले ही सत्ता की मुखालफत का रहा हो लेकिन आवाज जनता की है, नहीं तो भला ऐसा कौन लिखता है-

दो गज सही ये मेरी मिल्कियत तो है

ऐ मौत तूने मुझे ज़मींदार कर दिया......

(डिस्क्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं)
ब्लॉगर के बारे में
प्रकाश उप्रेती

प्रकाश उप्रेती

उत्तराखंड के खोपड़ा गाँव में जन्म। पहाड़, दिल्ली होते हुए वर्धा से पढ़ाई-लिखाई। हिंदी की महत्वपूर्ण पत्रिकाओं व अखबारों में लेखन। पहाड़ों में विशेष रुचि। मिजाज़ से घुमक्कड़, पेशे से अध्यापक। वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज में तदर्थ अध्यापक के तौर पर अध्यापन कार्य।

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First published: August 12, 2020, 6:39 PM IST
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