सोशल मीडिया बना साहित्यिक वाद-विवाद और संवाद का मंच

अब लगभग नए और पुराने सभी लेखक (Author) अपने विचारों को व्यक्त करने के लिए सोशल मीडिया (Social Media) माध्यम का प्रयोग कर रहे हैं. इस दौरान सोशल मीडिया बहुत सी साहित्यिक बहसों (Literary Debates) का गवाह भी रहा है.

Source: News18Hindi Last updated on: July 9, 2020, 1:05 PM IST
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सोशल मीडिया बना साहित्यिक वाद-विवाद और संवाद का मंच
सोशल मीडिया ही साहित्य की संगोष्ठियों का अखाडा बन गया है.
कोविड-19 (Covid-19) के दौर में सोशल मीडिया (Social Media) एक महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म के रूप में सामने आया है. इससे पहले जहां इसकी गंभीरता और नियमन को लेकर बहुत सारे सवाल खड़े किए जा रहे थे. वहीं आज यह माध्यम साहित्यिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र बन गया है. इसके इर्दगिर्द ही बहुत कुछ घट रहा है. साहित्य के गंभीर अध्येता जहां पहले इस माध्यम की गंभीरता और इससे जुडाव को लेकर सहज नहीं होते थे, आज वह भी इस माध्यम का भरपूर प्रयोग कर रहे हैं. साहित्य की गंभीर बहसों, विवादों और विचारों का माध्यम सोशल मीडिया बन चुका है. अब लगभग नए और पुराने सभी लेखक (Author) अपने विचारों को व्यक्त करने के लिए इस माध्यम का प्रयोग कर रहे हैं. इस दौरान सोशल मीडिया बहुत सी साहित्यिक बहसों (Literary Debates) का गवाह भी रहा है.

इन बहसों ने साहित्य के गलियारे को चर्चा में बनाए रखा. दूर-दराज में बैठे लेखकों ने पाठकों से जुड़ने और साहित्य के आकाश में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए इस दौरान सोशल मीडिया का खूब इस्तेमाल किया. एक तरह से सोशल मीडिया ही साहित्य की संगोष्ठियों का अखाडा बन गया है. इन बदली हुई परिस्थितियों में सोशल मीडिया, साहित्यिक संवाद का महत्वपूर्ण अंग बन गया. साहित्य से जुडी पत्रिकाओं, संस्थाओं और संस्थानों के फेसबुक पेज पर हर रोज लेखकों के संवाद कार्यक्रम हो रहे हैं और उन पर खूब चर्चा भी हो रही है. इस माध्यम का एक बड़ा फायदा यह भी है कि इन चर्चाओं में साहित्य को बरतने, साहित्य में रूचि रखने वाले और साहित्य को दूर से देखने वाले सभी किसी न किसी रूप में शामिल हो रहे हैं. इससे साहित्य का वितान विस्तृत ही हो रहा है.

साहित्य में संवाद और विवादों का पुराना नाता है. समय- समय पर साहित्यिक मान्यताओं को लेकर वाद-विवाद होते रहते हैं. इधर सोशल मीडिया में संवाद की तार्किक प्रक्रिया में भी कई विवाद खड़े हुए. साहित्य के ये विवाद सोशल मीडिया पर छाए रहे है. इनमें प्रमुख रूप से 'हंस' पत्रिका के संपादक संजय सहाय का एक लाइव प्रोग्राम में 'प्रेमचंद की कुछ कहानियों को छोड़कर बाकी सबको कूड़ा कह देना' बड़ा विवाद का विषय रहा. उनकी इस टिप्पणी के बाद तो साहित्य के हर हलके से प्रतिक्रिया आने लगी. संजय सहाय उसी 'हंस' पत्रिका के संपादक हैं जिसके संस्थापक संपादक प्रेमचंद थे. प्रेमचंद ने 300 से ज्यादा कहानियां लिखी हैं. उनकी कई कहानियां तो साहित्य में आज भी मील का पत्थर हैं. कुछ पर विवाद भी हैं और कुछ औसत दर्जे की कहानियां भी हैं लेकिन उनकी कहानियों को कूड़ा कह देना कहीं से तर्कसम्मत नहीं है. इसलिए साहित्य से नाता रखने वाले कई लोगों ने इस पर आपत्ति भी दर्ज की है.

हिंदी के वरिष्ठ कवि और पत्रकार विमल कुमार इस पूरे विवाद पर लिखते हैं कि 'एक कथाकार संपादक ने प्रेमचंद की बीसेक कहानियों को उम्दा बताया पर उनकी शेष कहानियों को कूड़ा बताकर हिंदी साहित्य में एक नया विवाद खड़ा कर दिया है. यह कोई पहला मौका नहीं है कि किसी लेखक ने हिंदी के किसी यशस्वी लेखक की रचनाओं को कूड़ा बताया हो. करीब बीस साल पहले जब सुमित्रानंदन पंत की जन्मशती मनाई जा रही थी तो प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह ने पंत की कविताओं को कूड़ा बताया था. दुनिया का हर बड़ा लेखक अपनी हर रचना उत्कृष्ट नहीं लिखता है. इसलिए उसकी रचनाओं को कमजोर बताने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए लेकिन हम जिस अंदाज में किसी लेखक की आलोचना करते हैं, आपत्ति उस पर होती है.' एक रचनाकार जब 300 से ज्यादा कहानियां लिख रहा है तो सभी उत्कृष्ट होंगी, यह कल्पना भी नहीं की जा सकती है. उनमें कुछ कहानियां औसत दर्जे की भी होंगी और हैं भी लेकिन उन्हें कूड़ा कहना कहीं से भी पाठ की आलोचना नहीं है. यह भावावेश का तर्क है, आलोचना का नहीं.
समय-समय पर साहित्यिक मान्यताओं को लेकर वाद-विवाद होते रहते हैं.
समय-समय पर साहित्यिक मान्यताओं को लेकर वाद-विवाद होते रहते हैं.


खैर, संजय सहाय की इस विवादास्पद स्थापना के बाद साहित्य में प्रेमचंद के मूल्यांकन पर नए सिरे से बहस होने लगी है. कई लोगों ने संजय सहाय की कहानियों पर भी प्रश्न उठाए और यह विवाद बढ़ता चला गया. प्रेमचंद पर महत्वपूर्ण काम करने वाले कमल किशोर गोयनका ने भी संजय सहाय की इस स्थापना पर अपनी प्रतिक्रिया दी. उन्होंने संजय सहाय की कहानियों पर प्रश्न खड़े करते हुए उत्कृष्टता के पैमाने को ही कटघरे में खड़ा कर दिया. सोशल मीडिया पर यह विवाद दिनों-दिन बढ़ता जा रहा. इस बढ़ने के क्रम ने हिंदी साहित्य में प्रेमचंद को नए सिरे से देखने और समझने की एक खिड़की खोल दी है.

इसके साथ ही संजय चतुर्वेदी द्वारा कविता पर दिए एक लाइव व्याख्यान के बाद सोशल मीडिया पर कविता को लेकर नई बहस छिड़ गई. उनका यह कथन कि 'लय, पद और छंद अब हिंदी कविता में किसी के पास नहीं बचे हैं. इसे नामवर और मैनेजर वाले लोग तो वापस नहीं लाएंगे. इसे वो नए लोग लाएंगे जो रौशनी से कहीं बाहर हैं.' उनके इस वक्तव्य के बाद हिंदी कविता में छंद की वापसी, कविता में लय और दक्षिण बनाम वाम की कविता के खांचों पर खूब बहस हुई. इस विवाद में नए से लेकर पुराने लेखक तक कूदे. खासकर वरिष्ठ कवि मंगलेश डबराल ने संजय चतुर्वेदी के आरोपों का खंडन करते हुए बड़े ही सलीके से लिखा और इस विवाद को थोड़ा और आगे बढाया. मंगलेश डबराल ने इस संदर्भ में लिखा कि 'कुछ तत्व खड्गहस्त अंदाज में कविता की उस पीढ़ी के पीछे पड़ गए हैं जो समकालीन यथार्थ के अनुभव को किसी पारंपरिक छंद में नहीं बांधना चाहती है. पता नहीं वे किस छंद की बात कर रहे हैं.' इसके बाद यह विवाद काव्यात्मक फासीवाद की शक्ल में आगे बढ़ा. संजय चतुर्वेदी की स्थापनाओं से कविता के व्याकरण को लेकर सोशल मीडिया में बहस चल पड़ी. इस बहस ने कविता के कई पोरों को खोला और नए-नए संदर्भ सामने आए. इन संदर्भों की भी साहित्यिक बिरादरी में बड़ी हलचल रही. कविता का कवित्व उसकी लय में होता है. छंद उस लय को अनुशासन प्रदान करते हैं. कविता की छंद से मुक्ति और कविता में छंद की उपयोगिता का प्रसंग तो छायावाद और निराला के जमाने से चल रहा है. अब इसको लेकर एक नई बहस चल पड़ी है. इससे शायद हिंदी कविता की कोई नई धारा निकले.इस तरह से साहित्यिक दुनिया इस दौरान सोशल मीडिया पर सक्रिय रही. इस सक्रियता में वाद-विवाद का सिलसिला रामचंद्र शुक्ल के इतिहास पर की गई टिप्पणी से आरम्भ हुआ. उसके बाद तो जितने भी लाइव प्रोग्राम हुए सबमें साहित्य की आंतरिक खींचतान स्पष्ट दिखाई दी. नए से लेकर पुराने लेखकों ने इस माध्यम को सहज अपनाया और अपनी बातों को बड़े पाठक वर्ग तक पहुंचाया. वरिष्ठ कवि आलोक धन्वा के कविता पाठ को ही देखें तो उनके लाइव कविता पाठ को हजारों लोगों ने देखा और सुना. यह इस माध्यम की ताकत भी है. सब एक साथ बहस भी कर सकते हैं और एक दुसरे को इत्मिनान से सुन भी सकते हैं. साहित्य में आए इस तकनीकी बदलाव ने बहुत कुछ बदल दिया है. गोष्ठी-संगोष्ठी के तौर तरीकों से लेकर कहन के अंदाज तक में बड़ा परिवर्तन आया है. साहित्यकारों ने इस परिवर्तन को बहुत जल्दी और सहजता से अपना भी लिया है. अब तो हर रोज सोशल मीडिया के माध्यमों के जरिये कवि-सम्मेलन से लेकर साहित्य पर गंभीर विचार-विमर्श हो रहा है. आगे यह विमर्श क्या रूप लेगा यह तो समय तय करेगा. फिलहाल तो साहित्य की सारी हलचलों का केंद्र सोशल मीडिया ही बना हुआ है.
ब्लॉगर के बारे में
प्रकाश उप्रेती

प्रकाश उप्रेती

उत्तराखंड के खोपड़ा गाँव में जन्म। पहाड़, दिल्ली होते हुए वर्धा से पढ़ाई-लिखाई। हिंदी की महत्वपूर्ण पत्रिकाओं व अखबारों में लेखन। पहाड़ों में विशेष रुचि। मिजाज़ से घुमक्कड़, पेशे से अध्यापक। वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज में तदर्थ अध्यापक के तौर पर अध्यापन कार्य।

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First published: July 9, 2020, 1:04 PM IST
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