Teacher’s Day: डिजिटल क्लास ने खत्म की ‘गुरु और गोविंंद’ वाली दुविधा

शिक्षक दिवस (Teacher’s Day) के दिन हर साल कुछ दोहे, सूक्तियों और कथनों के साथ हम अपने-अपने शिक्षकों को याद करते हैं लेकिन उन स्थितियों को नजरअंदाज कर देते हैं जो दिनों-दिन शिक्षा, शिक्षक, शिक्षण और विद्यार्थियों के बीच एक खाई पैदा कर रहे हैं. अब शिक्षकों की भूमिका सीमित होती जा रही है. हजारों शिक्षकों के पद खाली हैं. बड़ी संख्या में कॉन्ट्रैक्ट पर शिक्षक पढ़ा रहे हैं. शिक्षकों के भीतर असुरक्षा बोध है. ऐसे में कैसे वह गुरु- शिष्य का रिश्ता कायम होगा जिसकी अपेक्षा की जाती है.

Source: News18Hindi Last updated on: September 5, 2020, 7:22 AM IST
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Teacher’s Day: डिजिटल क्लास ने खत्म की ‘गुरु और गोविंंद’ वाली दुविधा
खुले आसमान के नीचे एक क्लास.
ज्ञान की अपनी एक सत्ता होती है. इस सत्ता को समय-समय पर चुनौतियां भी मिलती रही हैं. भारतीय ज्ञान परम्परा में तो शास्त्रार्थ होता रहा और उससे ज्ञान की परम्परा समृद्ध भी होती रही. इस परम्परा से ज्ञान की कई धाराएं विकसित हुई लेकिन ज्ञान की सभी धाराओं में गुरु का बड़ा महत्व रहा. इधर अकादमिक दुनिया में 20वीं सदी के उत्तरार्ध में फूको द्वारा स्थापित सत्ता और ज्ञान (Power and Knowledge) की अवधारणा पर खूब चर्चा हुई. इसका सामाजिक एवं अकादमिक दोनों रूपों से विश्लेषण हुआ और संस्थाओं, संस्थानों एवं संस्थानिकता के संदर्भों के हवाले से भी सत्ता और ज्ञान के डिस्कोर्स को समझा गया. इस डिस्कोर्स के बाद ज्यादातर विद्वानों की सहमति इस बात से थी कि सत्ता और ज्ञान का देखा-अनदेखा, कहा-अनकहा गठजोड़ होता है. सत्ता अपनी नीति व नियमों को ज्ञान तंत्र की स्वीकार्यता के जरिए जनता के बीच स्थापित करती है.

यह धारणा 20वीं सदी की थी लेकिन 21वीं सदी में ज्ञान और सत्ता के साथ तकनीक भी जुड़ गई. ज्ञान के पूरे डिस्कोर्स में तकनीक ने बड़ा बदलाव किया. यहां से ज्ञान, सूचनाओं में सिमटने लगा और सत्ता, सूचनाओं की उत्पादक बन गई. ज्ञान, सूचनाओं की तरह वस्तुनिष्ठ हो गया और विवेक की पैमाइश चार में से एक सही विकल्प पर टिक गई. यह विकल्प भी एक क्लिक के सहारे खोजा और जाना जा सकता है. इसके बाद तो ‘गुरु और गोविन्द’ वाली दुविधा भी ख़त्म हो गई. गुरु का वही जड़ अर्थ नहीं रह गया बल्कि उसका विस्तार हो गया. अब यह विस्तार लैपटॉप एवं फोन की स्क्रीन तक हो गया है. शिक्षा, शिक्षण एवं शिक्षक के बीच जो भी रिश्ता बचा था उसे कोविड -19 ने ध्वस्त कर दिया है. इस दौर में बहुत कुछ बदला है. ज्ञान और तकनीक का रिश्ता मजबूत हुआ है लेकिन इस मजबूती में बहुत कुछ है जो कमजोर भी हुआ है. अक्सर उस पर कम ही बात हुई है. शिक्षक दिवस (Teacher’s Day) पर अगर उस पक्षपर बात न हो तो काहे का दिवस.

इस दौर में शिक्षा का पूरा तंत्र तकनीक आधारित हो गया है. शिक्षक लैपटॉप या मोबाइल की खिड़की से सिलेबस बांच रहा है और छात्र मात्र श्रोता हैं. क्या यही शिक्षा, शिक्षक, शिक्षण और विद्यार्थियों का रिश्ता है ? निर्धारित पाठ को पढ़ा देना ही शिक्षक का काम है ? क्या यही शिक्षण है ? जब एक क्लिक पर सब ज्ञान मिल रहा है और विद्यार्थियों व शिक्षकों के बीच शिक्षण ‘नोट्स’ आधारित हो गया है तो ऐसे में आखिर शिक्षक की भी जरूरत क्या है? इन सवालों से टकराए बिना क्या शिक्षक दिवस हो सकता है? जरूरी है इन सवालों पर बात करना. ऑनलाइन शिक्षा को विकल्प के तौर पर देखते- देखते अब शिक्षक भी विकल्प के तौर पर ही देखे जा रहे हैं क्योंकि शिक्षण का जो तरीका तकनीक के साथ विकसित हो रहा है उसमें संवाद से ज्यादा एकालाप और ज्ञान के बरक्स सूचनाओं को ज्यादा महत्व दिया जा रहा.

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शिक्षक दिवस पर सभी शिक्षकों को ढेर सारी शुभकामनाएं...
भविष्य में अगर कोई रोबोट क्लास लेने लगे तो इसमें किसी को हैरानी नहीं होनी चाहिए क्योंकि शिक्षण का यह ढांचा उसी दिशा में विकसित हो रहा है. शिक्षण का जो ढांचा ऑनलाइन माध्यमों से विकसित हो रहा है, उसमें पाठ्यक्रम खत्म करने पर ज्यादा जोर है न कि बच्चों में ज्ञान की दिशा को विस्तारित करने में. इसके जरिए विद्यार्थियों और शिक्षकों का जो रिश्ता कायम हो रहा है वह कृत्रिम सा प्रतीत होता है. क्लास रूम में जब कोई शिक्षक कक्षा लेता है तो वह सिर्फ पाठ्यक्रम नहीं पढ़ाता है बल्कि विद्यार्थियों में ज्ञान को विकसित भी करता है और उनकी अभिरुचियों का परिष्कार कर उन्हें सही दिशा या मार्ग भी दिखाता है. इसी से गुरु और शिष्य का एक रिश्ता कायम होता है. यह रिश्ता सिर्फ पढ़ाने भर का नहीं  होता है बल्कि विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास में भी सहायक होता है. एक शिक्षक  विद्यार्थियों को पढने के साथ गुनने की कला के लिए भी तैयार करता है. कबीर का एक दोहा है -गुरू कुम्हार शिष्य कुंभ है, गढि़ गढि़ काढ़ै खोट/अन्तर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट. अब यह कितना प्रासंगिक रह गया है, विचारणीय है, क्योंकि ऑनलाइन के दौर में वह रिश्ता ही क्षीण हो गया है जो इस परम्परा के निर्माण में महत्वपूर्ण था. इसे वापस कायम करना कम चुनौती का काम नहीं है.

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एक विद्यार्थी के जीवन में शिक्षक के साथ-साथ शैक्षणिक वातावरण का भी गहरा प्रभाव पड़ता है. वह स्वयं के साथ- साथ उस वातावरण से भी बहुत कुछ सीखता है जो उसे स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय में मिलता है. यही  वातावरण उसकी प्रतिभा को उड़ान देने में सहायक होता है. विद्यार्थी, शिक्षा ग्रहण करने के साथ-साथ सांस्कृतिक रूप से स्वयं को समृद्ध करता है. उसकी इस समृद्धि में परिवेश, संस्थान और शिक्षक की महत्वपूर्ण भूमिका होती है. यह भूमिका दिनों-दिन सीमित होती जा रही है. खासकर ऑनलाइन शिक्षण के दौर में तो शिक्षक और परिवेश नेपथ्य में चले गए हैं. महात्मा गांधी का कहना था कि ‘शिक्षा, बच्चों और इंसानों के शरीर, मन और आत्मा के सर्वोत्तम की अभिव्यक्ति है.’ इस सर्वोत्तम अभिव्यक्ति से उनका तात्पर्य जीवन के सर्वांगीण विकास से था. यह सर्वोत्तम, लैपटॉप की खिड़की से संभव नहीं है. जहाँ आप विद्यार्थियों को देख भी नहीं पा रहे हैं. उनको कितना समझ आ रहा है और कितना नहीं इसका भी अंदाजा नहीं है. ऐसे में कैसे उनका सर्वांगीण विकास संभव हो पाएगा!
भारत में 5 सितंबर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है.
भारत में 5 सितंबर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है.


विद्यार्थियों के जीवन में शिक्षक की भूमिका सिर्फ क्लास रूम तक नहीं होती है. न ही पाठ्यक्रम तक सीमित होती है बल्कि जीवनपर्यन्त बनी रहती है. शिक्षण के माध्यम से शिक्षक, विद्यार्थियों के रचनात्मक एवं आलोचनात्मक कौशल को निखारता है और उसे आकार देने की कोशिश करता है. यह प्रक्रिया क्लास रूम से आरम्भ जरुर होती है लेकिन इसका विस्तार उस स्पेस के जरिए होता है जो इस दौर में खत्म हो गया है. अब केवल विद्यार्थियों का होना और शिक्षक का क्लास में नियत पाठ्यक्रम को पढ़ा देना ही शिक्षण है. यह एक तरह से शिक्षा की मूल आत्मा के साथ खिलवाड़ करने जैसा है. इस विकल्प ने शिक्षा को ही विकल्प बना दिया है. बहुत से विद्यार्थी इस कारण शिक्षा से भी वंचित हो रहे हैं.

भारत जैसे देश में ऑनलाइन शिक्षा को विकल्प के रूप में देखना, कहीं न कहीं ग्रामीण भारत के बच्चों की अनदेखी करना भी है. तकनीक, शिक्षण में कुछ हद तक सहायक हो सकती है लेकिन यह शिक्षण का विकल्प नहीं हो सकती. इसलिए शिक्षक दिवस के मौके पर सिर्फ कसीदे गढ़ देने से काम नहीं चलेगा, न ही परम्परा का बखान कर देने से ही. मौजूदा हालात के  हिसाब से शिक्षा और शिक्षक पर बात करते हुए विद्यार्थियों की अनदेखी नहीं की जा सकती है क्योंकि वर्तमान व्यवस्था में विद्यार्थी ही पिस रहे हैं. उनके लिए विकल्प भी विकल्पहीन है. आर्थिक, शैक्षणिक और पारिवारिक संदर्भों से भी देखा जाए तो विद्यार्थियों के लिए ऑनलाइन शिक्षा तनाव पैदा करने वाली है. यह पद्धति उनमें सीखने के बजाए रटने और नोट्स पर निर्भरता की प्रवृत्ति को विकसित कर रही है. ऐसे में विद्यार्थियों के बारे में कही यह बात- काक चेष्टा, बको ध्यानं, स्वान निद्रा तथैव च /अल्पहारी, गृहत्यागी,विद्यार्थी पंच लक्षणं. आज के समय में बेमानी सी लगती है. अब इन लक्षणों की उपयोगिता मानो खत्म सी हो गई है. मोबाइल और लैपटॉप पर एक टच से सबकुछ मिल जाने और वहीं शिक्षक से पढ़ लेने के दौर में इन गुणों की किसे जरूरत है! अब यह गुजरे ज़माने की बात हो गई है.

शिक्षक दिवस के दिन इन सब बातों को याद करना भी श्राद्ध कर्म के सरीखे ही है. हर साल कुछ दोहे, सूक्तियों और कथनों के साथ हम अपने-अपने शिक्षकों को याद करते हैं लेकिन उसमें उन स्थितियों को नजरअंदाज कर देते हैं जो दिनों-दिन शिक्षा, शिक्षक, शिक्षण और विद्यार्थियों के बीच एक खाई पैदा कर रहे हैं. अब शिक्षकों की भूमिका भी सीमित होती जा रही है. शिक्षण के नए-नए टूल्स विकसित हो रहे हैं, विद्यार्थी तकनीक के माध्यम से सूचनाओं के वाहक में तब्दील हो रहे हैं. ज्ञान के नए संदर्भ सीमित होते जा रहे हैं. वर्तमान परिस्थितियां चुनौती भरी हैं. इस संक्रमण काल में शिक्षा के मूलभूत ढांचे के साथ परम्परागत रूप से चले आ रहे शिक्षक और विद्यार्थियों के रिश्तों को भी  कमजोर किया है. यह बात सही है कि इस दौर में शिक्षा पर गहरा संकट है. इसलिए जो उपलब्ध विकल्प हैं उन्हीं से ही काम लिया जा रहा है. परन्तु यह विकल्प भी पर्याप्त नहीं है. ऐसे में ‘टीचिंग लर्निंग मोड़’ में अन्य विकल्पों पर काम करना चाहिए. उन विकल्पों में विद्यार्थियों का हित सर्वोपरी हो तभी शिक्षक और शिक्षा का अर्थ है. नहीं तो चीजें चल ही रही हैं. आज भी हजारों शिक्षकों के पद खाली हैं  और बड़ी संख्या में तदर्थ, गेस्ट और कॉन्ट्रैक्ट पर शिक्षक पढ़ा रहे हैं. ऐसे में शिक्षकों के भीतर भी एक असुरक्षा बोध है. आज वो पढ़ा रहे हैं, कल पढ़ा पाएंगे कि नहीं! इस असुरक्षा बोध के कारण भी शिक्षण प्रभावित होता है. आज वो यहां कल कहीं और पढ़ा रहे हैं. ऐसे में कैसे वह गुरु- शिष्य का रिश्ता कायम होगा जिसकी अपेक्षा की जाती है. इन संदर्भों को भी देखना जरुरी है क्योंकि ज्ञान निर्माण में इन संदर्भों की बड़ी अहम् भूमिका है. अब इन परिस्थितियों में शिक्षक दिवस पर बधाई किसे दी जाए और बतौर शिक्षक कैसे ली जाए! (डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
प्रकाश उप्रेती

प्रकाश उप्रेती

उत्तराखंड के खोपड़ा गाँव में जन्म। पहाड़, दिल्ली होते हुए वर्धा से पढ़ाई-लिखाई। हिंदी की महत्वपूर्ण पत्रिकाओं व अखबारों में लेखन। पहाड़ों में विशेष रुचि। मिजाज़ से घुमक्कड़, पेशे से अध्यापक। वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज में तदर्थ अध्यापक के तौर पर अध्यापन कार्य।

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First published: September 5, 2020, 7:22 AM IST
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