उत्तराखंड स्थापना दिवस : मैं बे-पनाह अंधेरों को सुबह कैसे कहूं

इन 20 वर्षों में राज्य के सैकड़ों गांवों खाली हो चुके हैं. पृथक राज्य बनने के बाद तकरीबन 32 लाख लोग पलायन कर चुके हैं. सरकारी पलायन आयोग की रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखंड के 1702 गांव भुतहा हो चुके हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: November 9, 2020, 10:18 AM IST
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उत्तराखंड स्थापना दिवस : मैं बे-पनाह अंधेरों को सुबह कैसे कहूं
उत्तराखंड का आज 20वां स्थापना दिवस है.
एक राज्य के हिस्से में 20 वर्ष का समय क्या वाकई में वयस्क और परिपक्व होने का पर्याप्त समय है! विकास के पंचवर्षीय वादों पर वोट लुटा देने वाले नागरिक समाज के लिए 20 वर्ष के क्या मायने हैं. इन वर्षों में उन सपनों का क्या हुआ जिनके लिए संघर्ष किया गया था. इन 20 वर्षों में साल-दर-साल पोस्टर से तस्वीर, दीवार से पट्टी ही बदली या जनता की तक़दीर भी बदली है! पृथक और पहाड़ी राज्य का वह सपना इन 20 वर्षों में पूरा हुआ या वर्ष-दर-वर्ष धूमिल होता चला गया! ये सारे प्रश्न, शंकाएं उस राज्य को लेकर हैं जिसका आज स्थापना दिवस है. वह राज्य उत्तराखंड है.

अलग उत्तराखंड राज्य की मांग को लेकर कई वर्षों तक चले आंदोलन के बाद 9 नवंबर 2000 को उत्तराखंड को 27वें राज्य के रूप में स्वीकृति मिली वह भी अथक संघर्ष और बलिदान के बाद. पहाड़ के लोगों की आकांक्षाओं व सपनों का यह राज्य राजनीतिक दृष्टि से बदलावकारी तो रहा लेकिन जन उम्मीदों पर बहुत खरा नहीं उतरा.
हांफते हुए जवानी की दहलीज तक पहुंचा यह राज्य 20 वर्षों में 11 मुख्यमंत्रियों को देख चुका है. यहां सदन में पहुंचा हर नेता एक ही दौड़ में होता है, वह दौड़ होती है- मुख्यमंत्री की कुर्सी की दौड़. वैसे भी देश के किसी अन्य राज्य को 20 वर्षों में11 मुख्यमंत्री देखने का सौभाग्य तो नहीं ही मिला होगा. इस मामले में उत्तराखंड और वहां की जनता स्वयं पर गर्व कर सकती है.

दो- दो अस्थाई राजधानियों का बोझ भी यही राज्य उठा रहा है. स्थाई राजधानी का प्रश्न आज भी जस का तस बना हुआ है. कुछ समय पहले सरकार ने गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित किया है जबकि पृथक उत्तराखंड राज्य आंदोलन के साथ ही गैरसैंण को स्थाई राजधानी बनाने की मांग भी उठी थी लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि यह राज्य आज भी स्थाई राजधानी के सवाल पर उलझा हुआ है.
वैसे भी जब नेताओं की दीठ दिल्ली और पीठ पहाड़ की तरफ होगी तो राजधानी पहाड़ों में कैसे हो सकती है. हर सरकार जब विपक्ष में होती है तभी राजधानी का सवाल उठाती है. यह सवाल 20 वर्षों के बाद भी सवाल ही है. बेरोजगारी, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य और प्राकृतिक संसाधनों को लेकर सरकारों की नीतियों पर किए गए सवाल भी 20 वर्षों में गाढ़े ही हुए हैं. सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (CMIE) के आंकड़ों के मुताबिक, उत्तराखंड में बेरोजगारी दर 22.3% है. पलायन का एक बड़ा कारण भी बेरोजगारी ही है.

इन 20 वर्षों में राज्य के सैकड़ों गांवों खाली हो चुके हैं. पृथक राज्य बनने के बाद तकरीबन 32 लाख लोग पलायन कर चुके हैं. सरकारी पलायन आयोग की रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखंड के 1702 गांव भुतहा हो चुके हैं. मतलब एकदम खाली हो चुके हैं और तक़रीबन 1000 गांव ऐसे हैं जहां 100 से कम लोग बचे हैं.पलायन आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक 50% लोग रोजगार के कारण, 15% शिक्षा के चलते और 8% लचर स्वास्थ्य सुविधा की वजह से पलायन करने को मजबूर हुए. शिक्षा का हाल यह है कि कई गांवों में तो 20- 20 किलोमीटर तक कोई स्कूल ही नहीं है. कहीं स्कूल है तो शिक्षक नहीं हैं. पिछले वर्षों में सरकार ने कई सारे स्कूल बंद भी किए.

शिक्षा की स्थिति आज भी 20 वर्ष पुरानी जैसी ही है. चिकित्सा सुविधाओं के मामले में तो राज्य का हाल ही खस्ता है. एक तरफ जहां 30 से 40 किलोमीटर तक कोई सरकारी हॉस्पिटल नहीं है तो वहीं सुविधा के लिहाज से तहसील तक में बने सरकारी हॉस्पिटल में अल्ट्रासाउंड की मशीन और अन्य जांच के उपकरण तक नहीं हैं. अल्मोड़ा जिले के ही 83 गांवों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र नहीं है.आज भी इलाज के लिए दिल्ली ही आना पड़ता है. प्राकृतिक संसाधनों की लूट के मामले में तो इस राज्य का कोई मुकाबला है ही नहीं. सरकारी तंत्र और भू-माफिया के गठजोड़ ने पूरे पहाड़ को फोड़ डाला है.सड़कों की माया में लाखों पेड़ काट डाले गए हैं. खनन माफियाओं ने नदियों को खत्म कर दिया है. यह सब 20वर्षों की अदला-बदली की सरकारों की देन ही है. यह 20 वर्षों की वह तस्वीर है जो स्थापना दिवस की चकाचौंध में कहीं नजर नहीं आएगी. वहां नजर आएगी तो बस फाइलों में दर्ज विकास की इबारतें जो कभी जनता तक पहुंच ही नहीं पाई. अदम गोंडवी ने लिखा-“तुम्‍हारी फाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है/ मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है” वास्तविकता भी यही है.

20 वर्षों में राज्य की स्थिति एक ढर्रे पर रही. सरकार अदली-बदली लेकिन जनता की हालत वैसी ही रही. पहाड़ अपने ही दुखों तले खिसकता रहा. इन वर्षों में पहाड़ का कद घटा और नेताओं का कद बढ़ता गया. जनता के सपने धुंधले होते गए लेकिन नेताओं के सपने पूरे हुए.


एक तरफ जहां पहाड़ के गाड, गध्यर, नौले सूखे और गांव के गांव उजड़े तो वहीं दूसरी तरफ बड़े-बड़े महल बने, पानी पर बांध बने और विधायक- मंत्री व मुख्यमंत्री बने. इसलिए उत्तराखंड को जब देखना व समझना हो तो उसे देहरादून और ऋषिकेश से न देखा और न समझा जा सकता है. उसकी इन 20 वर्षों की यात्रा को भी पहाड़ की उन महिलाओं की नजर से देखना होगा जो, चिपको आंदोलन में जंगल को अपना मायका बताती हैं और कुल्हाड़े के आगे आ खड़ी होती हैं. शराब के खिलाफ आंदोलन में बाजार के बाजार बंद करा देती हैं और शराब माफियाओं के सामने दरांती ताने निडर खड़ी हो जाती हैं. पृथक राज्य आंदोलन में गोठ-गुठ्यार छोड़ दिल्ली तक हुंकारा भरने के लिए चल पड़ती हैं. उनकी आंखों से भी इसे देखना होगा. तभी उन सपनों को भी समझा जा सकता है जो अलग राज्य की मांग और संकल्पना के साथ जुड़े हुए थे लेकिन वह सपने अब धुंधले हो चुके हैं. वह आंखें आशावान तो हैं लेकिन उम्मीद हारती जा रही हैं.अऐसे में GDP, बजट, सडक आदि से पहाड़ को कैसे समझा जा सकता है.

विकास का यह रेडीमेड मॉडल जिसमें सड़क, शहर और सीमेंट है वह कैसे पहाड़ों में फिट हो सकता है ? क्या यही पहाड़ की जरूरतें हैं? या फिर इन 20 वर्षों में हमारे नीति निर्माता पहाड़ की जरूरतों को समझ ही नहीं पाए. पर्यटन की असीम संभावनाओं के बावजूद इस दिशा में सरकारों की अकर्मण्यता तारीफे-काबिल है. ऐसी स्थिति में कैसे जश्न मनाया जा सकता है. आखिर इन 20 वर्षों में सिवाय सरकारों के क्या बदला है ! फिर भी राज्य स्थापना दिवस की बधाई देते हुए दुष्यंत कुमार की ये पंक्तियां मुझे मौजू लगती हैं- मैं बे-पनाह अंधेरों को सुबह कैसे कहूं / मैं इन नज़ारों का अंधा तमाशबीन नहीं.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
प्रकाश उप्रेती

प्रकाश उप्रेती

उत्तराखंड के खोपड़ा गाँव में जन्म। पहाड़, दिल्ली होते हुए वर्धा से पढ़ाई-लिखाई। हिंदी की महत्वपूर्ण पत्रिकाओं व अखबारों में लेखन। पहाड़ों में विशेष रुचि। मिजाज़ से घुमक्कड़, पेशे से अध्यापक। वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज में तदर्थ अध्यापक के तौर पर अध्यापन कार्य।

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First published: November 9, 2020, 10:18 AM IST
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