लॉकडाउन में हिंदी के प्रकाशकों की वर्चुअल पहल

हर रोज ऑनलाइन (Online) वेबगोष्ठी या वेबनार हो रहे हैं, जिनमें दर्शकों (Audience) और श्रोताओं की ठीक-ठाक आमद देखी जा रही है. अनेक विश्वविद्यालय और संस्थाएं लगातार इसमें सक्रिय हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: June 26, 2020, 4:43 PM IST
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लॉकडाउन में हिंदी के प्रकाशकों की वर्चुअल पहल
लाइव शृंखला के जरिये नई किताबों और अलग-अलग विषयों पर व्याख्यान की एक परिपाटी सी चल पड़ी.
कोविड-19 के दौर में दुनिया कैद सी हो गई है. रफ़्तार पर अचानक ब्रेक लग गया. कभी न रुकने वाले शहर खामोश हो गए. रोजी-रोटी के सवाल से लेकर पठन-पाठन तक के सवालों पर नए तरीके से विमर्श होने लगा. हर विकल्प के तौर पर दुनिया की नजर वर्चुअल माध्यमों पर ही टिकी रही. इनके जरिये ही संवाद-विवाद हो रहा है. ऑनलाइन माध्यम के जरिए दुनियाभर में पठन-पाठन के नए-नए तरीके इजाद किए गए हैं. शिक्षा का लगभग पूरा तंत्र इसी माध्यम से चल रहा है. भारत जैसे देश में इसकी पहुंच और संसाधनों की कमी के कारण ऑनलाइन शिक्षण और परीक्षण को लेकर एक संशय की स्थिति बनी हुई है. इसके बावजूद लोगों ने इस तालाबंदी के दौर में संवाद -संगोष्ठी और पठन- पाठन के नए तरीके खोज निकाले. हर रोज ऑनलाइन वेबगोष्ठी या वेबनार हो रहे हैं, जिनमें दर्शकों और श्रोताओं की ठीक-ठाक आमद देखी जा रही है. अनेक विश्वविद्यालय और संस्थाएं लगातार इसमें सक्रिय हैं. यह अपनी सीमित पहुंंच के बावजूद लोगों में रुचि पैदा कर रहा है. नए-पुराने लेखकों से लेकर समाजविज्ञानी और इतिहासकार भी अलग-अलग मुद्दों को लेकर ऑनलाइन माध्यम के जरिये गंभीर चर्चा और सवाल पैदा कर रहे हैं.

हिंदी के कुछ महत्वपूर्ण प्रकाशकों ने इस दौर में पाठकों के साथ जुड़े रहने के लिए नए प्रयोग किए.
हिंदी के कुछ महत्वपूर्ण प्रकाशकों ने इस दौर में पाठकों के साथ जुड़े रहने के लिए नए प्रयोग किए.


हाल में प्रो. शेखर पाठक ने ‘डरी सहमी मानवता और प्रकृति का मिजाज’ पर जब अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन के पेज से ऑनलाइन माध्यम का प्रयोग करते हुए बोलना शुरू किया तो देखते-देखते सैकड़ों लोग जुड़ गए. यह इस माध्यम का एक उजला पक्ष भी है. इसलिए इस माध्यम का बहुधा प्रयोग होने लगा है. अब जब इस दौर में किताबें ऑनलाइन पढ़ी जा रहीं हैं, क्लास ऑनलाइन हो रही हैं, संगोष्ठी भी ऑनलाइन और व्याख्यान, वर्कशॉप सब ऑनलाइन हो रहे हैं तो ऐसे में जिनका जिम्मा किताबों को छापने और संवारने का है, वह भला क्या कर रहे हैं? उनका पाठकों और लेखकों से कैसे रिश्ता कायम है? किताबों को ऑनलाइन पढ़ने वाली जमात भी बहुत नहीं हैं, ऐसे में हिंदी के प्रकाशक क्या रहे हैं? इस ओर भी नजर डालकर देखना चाहिए.

हिंदी के कुछ महत्वपूर्ण प्रकाशकों ने इस दौर में पाठकों के साथ जुड़े रहने के लिए नए-नए प्रयोग किए. अमूमन तो लाइव शृंखला के जरिये नई किताबों और अलग-अलग विषयों पर व्याख्यान की एक परिपाटी सी चल पड़ी थी, लेकिन कुछ प्रकाशकों ने इससे अलग भी करने की कोशिश की है. इसी कोशिश में राजकमल प्रकाशन समूह का ‘पाठ- पुन:पाठ’ और यश पब्लिकेशन का ‘किताबों की कहानी, लेखक की जुबानी’ एक नई तरह की कोशिश प्रतीत होती है. तालाबंदी के दौर में पाठकों से जुड़े रहने के लिए वर्चुअल माध्यम का भरपूर उपयोग किया है. किसी भी नई किताब के छपने की संभावना भले न हो लेकिन पाठकों से जुड़े रहने की उनकी कोशिश बराबर दिखाई देती है. राजकमल प्रकाशन समूह ने ‘पाठ- पुन:पाठ’ नाम से एक शृंखला आरम्भ की. साहित्य और समाजविज्ञानी से संबंधित विभिन्न लेख, कविता, कहानी, उपन्यास का अंश, सोशल मीडिया की महत्वपूर्ण हलचल आदि को पीडीएफ में रूप में बुकलेट के तौर पर तैयार करके, व्हाट्सएप के जरिये पाठकों तक पहुंचाया. इस तालाबंदी के दौर में जब पुस्तकालय से लेकर प्रकाशन तक बंद थे. लोग अपने घरों में कैद थे. ऐसे में उनके लिए इस तरह का ‘पाठाहार’ तैयार कर उनके सामने परोस देना एक महत्वपूर्ण और सार्थक पहल है. एक तरह से यह प्रयास पढ़ने की संस्कृति को बनाए रखने के लिए भी महत्वपूर्ण है. अब तक इसकी 64 किश्तें पाठकों तक पहुंच चुकी हैं. प्रकाशकों की तरफ से यह एक नवीन और अपने तरह की अलहदा पहल है. इसके जरिये आप साहित्य में जो भी नया लिखा जा रहा उससे जुड़ सकते हैं. साथ ही आप भले ही किताब से दूर हों, लेकिन किताब आपके पास होगी.
इस तरह की एक नई पहल यश पब्लिकेशन ने भी आरम्भ की है. यह नए और स्थापित लेखकों और अध्येताओं के लिए खिड़की नहीं द्वार खोल देने जैसा है. 'किताबों की कहानी, लेखक की जुबानी’ नाम से आरम्भ हुई यह शृंखला निर्बाध गति से चलती रही. इस शृंखला से 35 लेखक और साहित्य के अध्येता जुड़ चुके हैं. इसकी ख़ासियत यह है कि लेखक ने जिन पुस्तकों का अध्ययन इस तालाबंदी के दौरान किया उन्हें यश पब्लिकेशन के पेज पर लाइव आकर बड़े पाठक समूह के साथ साझा किया जाता है. किताबें यश पब्लिकेशन्स की हों ऐसा जरूरी नहीं, वो किसी भी प्रकाशक और विधा से संबंधित हो सकती हैं. एक तरह से यश पब्लिकेशन व्यापक दृष्टिकोण के साथ एक माध्यम उपलब्ध करा रहा है, ताकि महत्वपूर्ण पुस्तकें कहीं से भी छपी हों उनकी जानकारी पाठकों तक पहुंच जाए. प्रकाशन की दुनिया में यह एक उदारमना पहल कही जा सकती है. इस पहल को लेकर यश पब्लिकेशन के निदेशक जतिन भारद्वाज कहते हैं कि ‘इस शृंखला को आरम्भ करने का ख्याल भी पाठकों से संवाद के जरिये ही आया था. हमने कोशिश की कि इस वर्चुअल माध्यम के जरिए पाठकों तक किसी भी प्रकाशन से प्रकाशित महत्वपूर्ण पुस्तकों की जानकारी पहुंच जाए ताकि पाठकों की पुस्तकों को लेकर जिज्ञासा बनी रहे. साथ ही इसमें यह भाव भी निहित था कि जिनको वे पढ़ते हैं वो क्या पढ़ रहे हैं.’ पाठकों की दृष्टि से यह संकल्पना ज्ञानवर्धक ही है. आप तमाम उन किताबों से रू-ब-रू हो सकते हैं जो आप पढ़ना चाहते हैं या पढ़ भी चुके हैं. यह पहल किताबों की दुनिया का नया द्वार खोलती है. जहां से आप अपनी रुचि की किताबों के बारे जान सकते हैं.

हिंदी की साहित्यिक बिरादरी में ‘लाइव’ का एक नया दौर शुरू हुआ है. ऐसे में प्रकाशकों द्वारा भी ‘लाइव वार्ता’ के जरिये वर्चुअल स्पेस का खूब इस्तेमाल हो रहा है. वह भी पाठकों से रिश्ता कायम रखना चाहते हैं.  यह एक तरह से आने वाले दिनों में वर्चुअल स्पेस पर अधिक निर्भरता का संकेत भी देता है. अब किताबें ऑनलाइन पढ़ी और खरीदी जा रही हैं. किताबों की समीक्षा भी ऑडियो-वीडियो रूप में आने लगी है. प्रकाशक भी अपने आप को इस नए दौर के हिसाब से ढाल चुके हैं. प्रकाशकों की वर्चुअल स्पेस पर निर्भरता और उसका उपयोग इन परिस्थितियों के हिसाब से तो महत्वपूर्ण है. आगे करवट लेती दुनिया इसका मार्ग तय करेगी.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
प्रकाश उप्रेती

प्रकाश उप्रेती

उत्तराखंड के खोपड़ा गाँव में जन्म। पहाड़, दिल्ली होते हुए वर्धा से पढ़ाई-लिखाई। हिंदी की महत्वपूर्ण पत्रिकाओं व अखबारों में लेखन। पहाड़ों में विशेष रुचि। मिजाज़ से घुमक्कड़, पेशे से अध्यापक। वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज में तदर्थ अध्यापक के तौर पर अध्यापन कार्य।

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First published: June 26, 2020, 4:43 PM IST
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