OPINION: पर्यावरण को सिर्फ 'पर्यावरण' शब्द से नहीं समझा जा सकता

भारत में पर्यावरणीय चेतना के विकास में स्थानीयता का बड़ा महत्व है. इसलिए जिस चिपको आंदोलन से पर्यावरण को लेकर एक बहस और आंदोलन शुरू हुआ, उसके पीछे भी स्थानीयता के संदर्भों की बड़ी भूमिका है.

Source: News18Hindi Last updated on: June 5, 2020, 4:14 PM IST
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OPINION: पर्यावरण को सिर्फ 'पर्यावरण' शब्द से नहीं समझा जा सकता
भारत में पर्यावरणीय चेतना के विकास में स्थानीयता का बड़ा महत्व है.
'पर्यावरण' पर गंभीर और अ-गंभीर बहसें कई दशकों से चल रही हैं. उसका वितान राष्ट्रीय से लेकर अंतर्राष्ट्रीय तक फैला है. इन बहसों में कारण, परिणाम, भविष्य की आशंका, वर्तमान की स्थिति सब कुछ है लेकिन वो मुद्दे नहीं हैं जिनसे यह स्थिति उत्पन होते-होते विकराल रूप ले चुकी है. 'पर्यावरण' शब्द को सरकारी तौर पर बहुत ही ‘ग्लोरिफाई’ किया गया. इसी शब्द ने जंगलात, मिट्टी, जमीन, नदी, पत्थर आदि सबको एक साथ ‘कॉप्ट’ कर लिया और पर्यावरण के नाम पर ही इन्हीं निगला लिया. भारत में जितने भी पहाड़ी इलाके हैं वहां जंगल, जमीन, जल, और मिट्टी को बचाए व बनाए रखने के आंदोलन ‘पर्यावरण’ के आंदोलन नहीं हैं बल्कि जीवन जीने और हक़, हकूक के आंदोलन हैं.

उन्हें ‘पर्यावरण’ आंदोलन के तौर पर देखना कहीं न कहीं उन्हें सीमित करना है और एक तरह से गलत रीडिंग भी है. इसलिए ‘पर्यावरण’ को भी सरकारी और स्थानीय दो स्तरों पर देखने की जरूरत है. इसके साथ ही अकादमिक हलकों में इसको लेकर होने वाली बहसों को जानना और समझना भी जरुरी है. इन बहसों का एक सिरा रामचंद्र गुहा के पर्यावरणीय अध्ययन से भी जुड़ता है. अनेक असहमतियों के बावजूद पर्यावरण से संबंधित उनके चिंतन को अनदेखा नहीं किया जा सकता है.

भारत में पर्यावरणीय चेतना के विकास में स्थानीयता का बड़ा महत्व है. इसलिए जिस चिपको आंदोलन से पर्यावरण को लेकर एक बहस और आंदोलन शुरू हुआ, उसके पीछे भी स्थानीयता के संदर्भों की बड़ी भूमिका है. यह स्थानीयता अपने संसाधनों और जीवन को बचाने के साथ जुड़ती है. मनुष्य पहले या पर्यावरण पहले जैसी बहसों के बावजूद यह तो एक आम सहमति है कि प्रकृति और मनुष्य का संबंध एक दूसरे पर निर्भरता का है और जब-जब मनुष्य ने प्रकृति के साथ छेड़छाड़ की है तब-तब उसके भयंकर परिणाम हमारे सामने आए हैं. लेकिन आधुनिक विकास ने पर्यावरण को ताक़ पर रखकर सभ्यता के विकास को तरज़िह दी है जिसका परिणाम ही है कि आज पूरे विश्व में पर्यावरण को लेकर आंदोलन भी हो रहे हैं और इस पर गहन चिंतन भी हो रहा है. इस चिंतन धारा को भी समझना जरुरी है. इसकी एक कड़ी रामचन्द्र गुहा से भी जुड़ती है.

भारत में पहले पर्यावरण पर एक खास ढर्रे से चिंतन हो रहा था और उसके बाद मिथ और संस्कृति के कई आयामों से भी पर्यावरण को देखने की कोशिश लगातार की जा रही थी. धर्म और पर्यावरण के रिश्तों को भी बराबर टटोला गया. जंगल को नष्ट करने की कई पुराण गाथाओं को खंगाला गया तो वहीं उनके बरक्स पर्यावरण के संरक्षण की भी कई गाथाओं को पेश किया गया. इनसे यह साबित करने की कोशिश की गई कि भारतीय या आर्य तो हमेशा से प्रकृति प्रेमी रहे हैं लेकिन रामचन्द्र गुहा कहते हैं कि 'पर्यावरणीय विनाश (और संरक्षण) की असली जड़ें प्राचीन धर्मों में नहीं बल्कि आधुनिक दुनिया के धर्मनिरपेक्ष व्यवहारों में निहित है'.
इसके साथ ही वह पर्यावरण की बहस को अपने अनुभवों और अध्ययन के साथ-साथ पश्चिम में चली बहसों के साथ जोड़ते हैं, और भारत के प्राचीन पर्यावरणीय भाव को भी प्रश्नांकित करते हैं. पर्यावरण के सांस्कृतिक और भौतिक आयामों के साथ-साथ इसके धार्मिक व्यवहार पर भी बहस करते हुए लिखते हैं. 'कहते हैं वेद पुराण, बिना वृक्ष के नहीं कल्याण, जहां पश्चिमी दुनिया ईश्वरविहीनता और भौतिकवाद के अधीन हो गई है और अपनी जड़ों से कटे भारतीय बुद्धिजीवी भी उसी प्रदूषित रास्ते का पालन कर रहे हैं, हिंदुओं का पर्यावरणीय विवेक अब भी देहातों के किसानों के रोज़मर्रा के व्यवहारों में गहराई से रचा-बसा हुआ है.'

एकतरफ जहां वह इस बहस को वेदों तक ले जाते हैं तो वहीं आगे इसके आधुनिक स्वरूप पर भी बात करते हैं. एक अटकल या शंका के रूप में वह लिखते हैं कि '1967 में एक पश्चिमी विद्वान द्वारा लिखे लेख की वजह से तो हिंदुओं ने खुद को पर्यावरणवादी मानना शुरू नहीं किया है: बेशक मेरा इशारा लिन व्हाइट जूनियर के लेख 'द हिस्टोरिकल रुट्स ऑफ अवर इकोलोजिकल क्राइसिस' की ओर है. लिन ने अपनी थीसिस में ईसाइयत (क्रिश्चियानिटी) को केंद्र में रखकर उसके पर्यावरण विरोधी संदर्भों को रेखांकित किया था. उन्होंने बाइबल के कुछ अंशों के प्रकृति विरोधी स्वरूप की आलोचना की जिसमें से 'मनुष्य प्रकृति पर हवी रहेगा' जैसे संदर्भों की पहचान कर उसकी आलोचना की. इसके बाद बहुत से आलेख इसके पक्ष और विपक्ष में लिखे गए, जिसके साथ ही अकादमिक स्तर पर पर्यावरण को लेकर विचार और चिंतन शुरू हुआ. इस पूरी बहस ने तीसरी दुनिया के देशों में भी पर्यावरण को लेकर नए सिरे से बहस को जन्म दिया.

पर्यावरण इतिहासकारों की चिंता का विषय औद्योगिक क्रान्ति के बाद बना. औद्योगिककरण के पश्चात्य छपाई खाने और रेल यातायात आदि ने धीरे-धीरे पर्यावरण का दोहन किया. आधुनिक नगर सभ्यता ने भी पर्यावरण के दोहन में बड़ी भूमिका निभाई. पहले यूरोप और बाद में उत्तरी अमेरिका का औद्योगिकीकरण मुख्यतः उपभोग के नए तरीकों की बुनियाद पर हुआ था. इस संसाधनों के उपयोग ने उत्पादन, परिवहन, संचार और भंडारण की नई तकनीकों को जन्म दिया. औद्योगिकीकरण के बाद जब उपनिवेशवाद आया तो समाजों के बीच और उनके भीतर संसाधनों के प्रवाह में भारी पैमाने पर बढ़ोतरी हुई. अट्ठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दियों में अपने भीतर नई तकनीकी की खोज और बाहर नए देशों के औपनिवेशिकरण ने भी पर्यावरणीय संकट पैदा किया. इतिहासकारों के लिए यह एक दिलचस्प विषय था क्योंकि सभ्यता के विकास के साथ पर्यावरण के बदलते संबंधों की पड़ताल वह लगातार कर रहे थे लेकिन पर्यावरण को एक ‘चिंता’ के रूप में आधुनिक अध्ययन के तौर पर ही देखा गया. उपनिवेशों के ख़त्म हो जाने और द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका के बाद भारत सहित पूरे विश्व में पर्यावरण को लेकर नए सिरे से चिंतन शुरू हुआ.भारतीय पर्यावरणवाद की पहली लहर बीसवीं सदी के आरंभिक दौर से दूसरे विश्वयुद्ध की शुरुआत तक चलती है. इसे बनाने में दो विभिन्न बुद्धिजीवी समुदाय सक्रिय थे: एक तो वे विचारक जो भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के करीब थे और दूसरे वे असहमत वैज्ञानिक जो औपनिवेशिक प्रशासन के भीतर या उसकी परिधि में काम कर रहे थे. इन दोनों तरह के विचारकों में पर्यावरण को लेकर एक समझ विकसित हो रही थी. साथ ही औद्योगिककरण के पर्यावरणीय दुष्परिणामों पर भी चिंतन हो रहा था.

भारत में पर्यावरण की दूसरी लहर को आजादी से चिपको के बीच में देख सकते हैं. इस बीच टिकाऊ विकास के साथ गांधी और नेहरू के विकास मॉडल के बीच प्राकृतिक संसाधनों की स्थिति पर बहस चल रही थी. जिसमें साहित्य से लेकर समाजविज्ञान तक के लोग सक्रिय थे. इसके बाद भारत में पर्यावरण की तीसरी लहर चिपको आंदोलन के साथ शुरू होती है. इस लहर ने पर्यावरण को राष्ट्रीय सवाल के तौर पर खड़ा किया. इस लहर के बारे में रामचन्द्र गुहा लिखते हैं 'जब 1970 के दशक में यह शुरू हुआ, भारतीय पर्यावरणवादी बहस पर वन-संबंधी विवाद हावी थे. हालांकि 1980 और 1990 के दशकों में नर्मदा बचाओ आंदोलन और केरल के मछुआरों के संघर्ष ने पानी और मछली के समुचित उपयोग के सवाल को केंद्रबिन्दु बनाया. उसी समय उड़ीसा में बॉक्साइट खनन और हिमालय में चूनापत्थर के खनन को लेकर प्रतिरोध उठ खड़े हुए, जहां बाहरी लोगों द्वारा किए जा रहे खनन की वजह से गांव और जंगल की ज़मीन बर्बाद हो गई है और कुछ मामलों में तो गांव बेदखल कर दिए गए हैं. एक साथ इन संघर्षों को देखें तो इन्होंने इस दावे की हवा निकाल दी है कि भारत जैसे विकासशील देश पर्यावरण की दृष्टि से मितव्ययी नहीं हो सकते. असल में उन्होंने साबित किया है कि इसकी उल्टी बात सही है: एक गरीब देश में पर्यावरणीय बर्बादी की बड़ी सामाजिक कीमत होती है और इससे अधिक तीखे सामाजिक संघर्ष पैदा होते हैं.'

इन बहसों ने पर्यावरण आंदोलन को और तीखा किया. साथ ही 1970 के बाद भारत में पर्यावरण को लेकर लंबे संघर्ष चले. पर्यावरण का दोहन साफ तौर पर हाशिए पर रह रहे लोगों के पेशों, जैसे आदिवासी, बंजारे, मछुआरे और कारीगरों के लिए सबसे बड़ा खतरा है, जो हमेशा से ही अपने अस्तित्व के लिए आस-पास की प्रकृति पर बहुत निर्भर रहे हैं. जैव ईंधन के स्रोतों के विनाश का सबसे बड़ा असर औरतों पर पड़ा है . ग्रामीण संस्कृतियों में औरतें, खास कर भूमिहीन गरीब और छोटे खेतिहर परिवारों की औरतें प्रभावित हुई हैं. इसलिए आधुनिक ‘पर्यावरण’ का सबसे सशक्त आंदोलन ‘चिपको’ भी महिलाओं के द्वारा ही किया गया. पर्यावरण आंदोलनों में महिलाओं की बड़ी भूमिका को कई विद्वानों ने रेखांकित किया है. 'आधुनिक भारत में पर्यावरणवादी आंदोलनों की एक असाधारण विशेषता इनमें महिलाओं द्वारा निभाई गई अहम भूमिका है. वो काटे जा रहे जंगलों, अनियंत्रित खनन, विस्थापन और बड़े पैमाने पर मछली मारने के खिलाफ सड़कों पर उतरी हैं. उन्होंने पर्यावरणीय पुनर्स्थापना के कार्यक्रम का नेतृत्व भी किया है. वे नंगी पहाड़ियों पर पौधे लगा रही हैं, जलापूर्ति के स्थानीय स्त्रोतों का संरक्षण कर रही हैं और ऊर्जा-सक्षम तकनीक का प्रोत्साहन करने में जुटी हैं.'

दूसरी तरफ भारत में पर्यावरणीय संघर्षों का उभार आजीविका और अस्तित्व से सीधे-सीधे जुड़े हुए हैं. ये संघर्ष मुख्यतः समुदाय के प्राकृतिक संसाधनों पर शहरी-औद्योगिक गठजोड़ के अतिक्रमण के खिलाफ चल रहे हैं. इसलिए अगर गौर करें तो पश्चिमी देशों के संभ्रांत पर्यावरणीय आंदोलन के बरक्स भारत में पर्यावरणवादी आंदोलन हाशिए के लोगों, जिनमें पहाड़ी किसान, आदिवासियों, मछुआरों, बांधों से विस्थापित गरीब लोगों के संघर्षों के तौर पर उभरे हैं. शायद इसीलिए रामचन्द्र गुहा भारत के पर्यावरण आंदोलनों को ‘गरीबों का पर्यावरणवाद’ संज्ञा दी है.

पर्यावरण से संबंधित इन बहसों से भारत में पर्यावरणीय चिंतन संबंधी कुछ धारणाओं और दिशाओं को समझा जा सकता है. इन बहसों का आधार पर्यावरण से संबंधी चेतना के निर्माण से जुड़ता है. गांधी भी चेतना पर बल देते थे. उनके पर्यावरण संबंधी विचार दोहन, लाचल और लोभ के खिलाफ थे. वह भी स्थानीयता से पर्यावरण को समझने की बात करते हैं. मौटे तौर पर पर्यावरण की समझ को सिर्फ ‘पर्यावरण’ से नहीं समझा जा सकता है. इसके लिए स्थानीयता और जीवन जीने के तरीकों को समझना होगा.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
प्रकाश उप्रेती

प्रकाश उप्रेती

उत्तराखंड के खोपड़ा गाँव में जन्म। पहाड़, दिल्ली होते हुए वर्धा से पढ़ाई-लिखाई। हिंदी की महत्वपूर्ण पत्रिकाओं व अखबारों में लेखन। पहाड़ों में विशेष रुचि। मिजाज़ से घुमक्कड़, पेशे से अध्यापक। वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज में तदर्थ अध्यापक के तौर पर अध्यापन कार्य।

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First published: June 5, 2020, 4:14 PM IST
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