नए कृषि कानून से किसानों को कितना फायदा और कितना नुकसान

संसद ने विपक्ष के विरोध के बीच कृषि सुधार से जुड़े तीन विधेयक पारित कर दिए हैं. प्रधानमंत्री मोदी ने इसे ऐतिहासिक करार दिया. उन्होंने कहा, ‘हम किसानों की आय 2022 तक दोगुना करेंगे. यह उसी दिशा में एक कदम है.’ पंजाब, हरियाणा और उत्तरप्रदेश के हजारों किसान इन विधेयकों का विरोध कर रहे हैं. इन्हें लेकर न्यूनतम समर्थन मूल्य और मंडियो के ख़त्म होने का डर जताया जा रहा है. कहा जा रहा है कि इससे खेती उद्योगपतियों के हाथों में चली जाएगी.’

Source: News18Hindi Last updated on: September 21, 2020, 3:41 PM IST
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नए कृषि कानून से किसानों को कितना फायदा और कितना नुकसान
संसद ने कृषि सुधार से जुड़े तीन विधेयक पास किए हैं.
भारत में कृषि सुधार की मांग वर्षों से की जा रही थी. वर्तमान की मोदी सरकार ने किसान, कृषि के सुधार हेतु संसद में तीन विधेयकों को पारित किया है. संसद में बोलते हुए भाजपा राज्यसभा सांसद भूपिंदर यादव ने कहा कि “ये तीनों विधेयक कृषि क्षेत्र के सुधार हेतु ऐतिहासिक क़दम है.” हालांकि, संसद में पास होने से पहले ही इन तीनों विधेयकों का विरोध विभिन्न किसान संगठनो के द्वारा किया गया जो अभी भी जारी है. इन विरोधों का केंद्र मुख्यत: पंजाब, हरियाणा एवं पश्चिमी उत्तरप्रदेश हैं. इस विधेयकों को लेकर विभिन्न किसान संगठनों के मन में कुछ प्रश्न है जैसे कि न्यूनतम समर्थन मूल्य, मंडियो के ख़त्म होने का भय. वहीं, खेती का उद्योगपतियों के हाथों में जाने और कृषि में उनकी दख़ल को लेकर भी डर है.

वर्तमान में किसान हितैषी का दम भरने वाली कांग्रेस पार्टी पहले इस क़ानून को देश के किसानो के लिए अमृत मान रही थी, परंतु आज सबसे ज़्यादा विरोध कांग्रेस के बंधु ही कर रहे हैं. हालांकि, विपक्ष के विरोध को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने कहा, ‘हम किसानों की आय को 2022 तक दोगुना करेंगे. यह उसी दिशा में एक कदम है, जिससे कि ओपन मार्केट में वस्तु का मूल्य बाजार आधारित नियंत्रित होगा और जो कैश क्रॉप्स फसल है उससे मार्केट में ज्यादा फायदा होगा. यह किसान के लिए मण्डी के अतिरिक्त एक विकल्प है कि वो अपनी फ़सल कहीं भी बेच सके. पूर्व की न्यूनतम समर्थन मूल्य व्यवस्था जारी रहेगी.’ इस सबके बीच हम इन तीनों विधेयकों को संक्षेप में जानने का प्रयास करते हैं.

कृषि से जुड़े तीनों विधेयक हैं. पहला, कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अध्यादेश (Farmers' Produce Trade and Commerce (Promotion and Facilitation) Act, 2020) अध्यादेश, 2020.
दूसरा, आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 में संशोधन (The Essential Commodities (Amendment) Bill).
तीसरा,  मूल्य आश्वासन पर किसान (संरक्षण एवं सशक्तिकरण) समझौता और कृषि सेवा अध्यादेश (The Farmers (Empowerment and Protection) Agreement of Price Assurance and Farm Services Bill).


इन बिल के संभावित फायदे और नुकसान पर खूब चर्चा हो रही है. अगर हम फायदों की बात करें तो सरकार ने इन बिलों के निम्नलिखित फायदे गिनाए है. पहला सरकार का कहना है कि इस अध्यादेश से किसान अपनी उपज देश में कहीं भी, किसी भी व्यक्ति या संस्था को बेच सकते हैं. इस अध्यादेश में कृषि उपज विपणन समितियों (एपीएमसी मंडियों) के बाहर भी कृषि उत्पाद बेचने और खरीदने की व्यवस्था तैयार करना है. इसके जरिये सरकार एक देश, एक बाजार की बात कर रही है.

दूसरा, प्रधानमंत्री मोदी ने किसान बिल पर बोलते हुए कहा कि सरकार किसानों से धान-गेहूं की खरीद पहले की ही तरह करती रहेगी और किसानों को एमएसपी का लाभ पहले की तरह देती रहेगी. तीसरा, इन मंडियों में व्यापारियों की संख्या कम होती जा रही है, जिससे स्वस्थ प्रतिस्पर्धा नहीं हो पाती, नतीजतन किसानों को नुकसान उठाना पड़ता है. पूर्व के नियम अनुसार किसान अपने उत्पाद बाहर खुले में नहीं बेच सकते थे, ऐसा नहीं कि यह सभी जगह हो लेकिन अधिकतर स्थान पर ऐसा ही है,  इसलिए वे मंडी के व्यापारियों के मोहताज बन जाते थे. अब किसान मंडी के साथ-साथ मंडी से बाहर भी अपनी उपज भेज सकते हैं.

चौथा जिस प्रकार 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद कयास लगाए जा रहे थे कि इससे सेवा क्षेत्र में भारी नुकसान होगा लेकिन आज हम 30 वर्षों बाद देखते हैं कि सेवा क्षेत्र में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है. देश की 20% से जनसंख्या सेवा क्षेत्र पर निर्भर है लेकिन वह जीडीपी का 60% निर्धारित करती है, वहीं कृषि में 50% से अधिक लोग जुड़े हैं लेकिन जीडीपी में इसका योगदान सिर्फ 16% है. कई विशेषज्ञों का मानना है कि यह जिस प्रकार सेवा क्षेत्र में 1991 में सुधार हुए वैसे ही 2020 में सरकार का कृषि क्षेत्र में एक क्रांतिकारी कदम है.

अब सरकार के जो भी तर्क हों लेकिन विपक्ष तो इन विधेयकों को किसान विरोधी ही मान रहा है. विपक्ष के अनुसार इन विधेयकों के निम्नलिखित संभावित नुकसान होंगे. पहला, इससे मंडी की व्यवस्था ही खत्म हो जाएगी. वे कहते हैं, ‘सरकार के इस फैसले से मंडी व्यवस्था ही खत्म हो जाएगी. इससे किसानों को नुकसान होगा और कॉरपोरेट और बिचौलियों को फायदा होगा. वे मंडी से बाहर ही किसानों से औने पौने दामों पर उनकी फसल खरीद लेंगे और एमएसपी का कोई महत्व नहीं रह जाएगा. इसके अलावा मंडी में कार्य करने वाले लाखों व्यक्तियों के जीवन- निर्वाह का क्या होगा.’

दूसरा, 2006 से बिहार में इसी प्रकार की व्यवस्था है, तब ऐसी आशंका जताई जा रही थी कि बिहार में क्रांतिकारी परिवर्तन होंगे लेकिन 14 सालों के बाद भी बिहार के किसान गेहूं या धान बेचने के लिए आज भी पंजाब या दिल्ली आते हैं, ये इस बात का उदाहरण है कि यह एक उचित  व्यवस्था नहीं है.

तीसरा 1950-60 के दशकों में अमेरिका एवं  यूरोप सहित कई देशों में इस प्रकार का कृषि मॉडल लागू किया गया लेकिन वह बुरी तरह असफल साबित हुआ. 70 सालों के बाद अमेरिका और यूरोप में किसानों की हालात बहुत बदतर है. किसानों की आत्महत्या की दर साधारण शहरों में रहने वाले व्यक्ति से 45% अधिक है. इसके अलावा वहां के किसान सरकारों के ऊपर निर्भर रहते हैं. अमेरिका और यूरोप की कृषि व्यवस्था सब्सिडी से चलती है. एक तरीके का असफल मॉडल भारत में लागू करने का प्रयास किया जा रहा है जो तर्कसंगत नहीं है. अमेरिकी कृषि विभाग के मुख्य अर्थशास्त्री का कहना है कि 1960 के दशक से किसानों की आय में गिरावट आई है. इन वर्षों में यहां पर अगर खेती बची है तो उसकी वजह बड़े पैमाने पर सब्सिडी के माध्यम से दी गई आर्थिक सहायता है.’

चौथा, एसेंशियल कमोडिटीज एक्ट 1955 के हट जाने के बाद अब व्यापारी इन फसलों की  जमाखोरी कर सकेंगे और जब चाहे महंगाई को नियंत्रित कर सकेंगे. एक तरीके से यह पूंजीपतियों के हाथ में अर्थव्यवस्था का नियंत्रित होना है. भारत में 80% से अधिक छोटे और मझोले किसान है, अर्थात इनके पास 2 हेक्टेयर से कम भूमि है. इससे उनका काफ़ी नुक़सान होगा. पांचवा,  कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग से बड़े-बड़े पूंजीपति जमीन खरीदेंगे और किसानों से कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग कराएंगे, इससे वे औने पौने दामों पर किसानों से जमीन लेंगे और अंग्रेजी के अक्षरों में समझौते कर आएंगे जो कि किसानों को समझ नहीं आता है. ऐसे उदाहरण पूरे भारतवर्ष में देखे गए हैं, जहां पर समझौते के नाम पर किसानों का शोषण किया गया है. इसके अलावा इन विधेयकों में जो भूमिहीन किसान हैं जो दलित समुदाय से आते हैं और लावणी करते हैं अर्थात किसान की जमीन की कटाई /सिंचाई करते हैं  तो उसका कुछ हिस्सा ले लेते हैं तो इससे दलितों की स्थिति पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा.

असल में इन तीनों विधेयकों को देखा जाए तो इनका लाभ किसानों को ही मिलेगा. किसान की स्वेच्छा और उसकी आत्मनिर्भरता के लिए यह ऐतिहासिक क़दम है.  यह कदम फसल की बुवाई से पहले किसान को अपनी फसल को तय मानकों और तय कीमत के अनुसार बेचने का अनुबंध करने की सुविधा प्रदान करता है.


सरकार के इन विधायकों के पीछे हमें गुजरात मॉडल का स्वरूप नजर आता है. गुजरात मॉडल द्वितीय और तृतीय क्षेत्रों में लोगों की भागीदारी बढ़ाने की बात भी करता है. अगर हम कृषि क्षेत्र में देखें तो हमारे देश की लगभग 50% जनसंख्या कृषि पर निर्भर है, लेकिन उसका जीडीपी में योगदान 16% है. वहीं, इसके विपरीत द्वितीय और तृतीय क्षेत्रों में क्षेत्रों का जीडीपी में बहुत योगदान है. सरकार अब डेमोग्राफिक स्विफ्ट के जरिए किसी की जनसंख्या को द्वितीय और तृतीय क्षेत्र में लाना चाहती है. हालांकि, सरकार की नीति बहुत सटीक है. ऐसा ही सभी विकसित देशों में होता है. चाहे अमेरिका हो या यूरोप. लेकिन यह सब तुरंत करने की बजाय व्यवस्थित तरीके से किया जाए तो इससे किसानों और भूमिहीनों पर नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा.

सरकार ने शांता कुमार समिति 2015 की सिफारिश मानते हुए किसानों की समस्या का समाधान करते हुए इन कानूनों को लागू किया है. उनका  कहना है कि उन राज्यों की मंडी व्यवस्था में किसी भी प्रकार का दखल नहीं करना चाहिए जहां यह व्यवस्था उचित है. रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर भारत के राज्य जिसमें हरियाणा, पंजाब, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश प्रमुख है, वहां पर सरकार को एमएसपी जारी रखना चाहिए और पूर्वी भारत दक्षिणी भारत के राज्यों में इन सुधारों को आगे बढ़ाना चाहिए. तीसरा यह विधेयक संसद में पारित हो क़ानून बन गया है. अब सरकार को बड़ी-बड़ी कंपनियों पर नियंत्रण भी रखना होगा ताकि वे किसानों को नुकसान ना पहुंचा सकें. इसके लिए कल्याणकारी राज्य की संकल्पना को बल मिलता है, जिसमें राज्य किसी भी व्यक्ति या समाज के हित की रक्षा करता है और किसी भी प्रभावशाली व्यक्ति या कंपनी पर नियंत्रित रखता है. अतः सरकार को पहले की तरह किसानों से  एमएसपी के रेट पर फसल खरीदते रहना चाहिए. साथ ही, सरकार को इन कंपनियों को हिदायत /निर्देश देनी चाहिए कि वह एमएसपी से अधिक रेट पर ही किसानों से उत्पाद खरीदें. (डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.)


(लेखक जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी, नई दिल्ली में सेंटर फॉर कंपैरेटिव पॉलिटिक्स एंड पॉलिटिकल थ्योरी, स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज के सहायक प्राध्यापक हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
प्रवेश कुमार

प्रवेश कुमारएसोसिएट प्रोफेसर, जेएनयू

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी, नई दिल्ली में सेंटर फॉर कंपैरेटिव पॉलिटिक्स एंड पॉलिटिकल थ्योरी, स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज के सहायक प्राध्यापक. राजनीति और समसामयिक विषयों पर लेखन.

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First published: September 21, 2020, 9:49 AM IST
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