मध्य प्रदेश: नगरीय-पंचायत चुनाव में क्या संभावनाएं तलाश रहे हैं ओवैसी-केजरीवाल

Madhya Pradesh urban and panchayat elections: मध्य प्रदेश में नगरीय और पंचायत चुनावों के दौर चल रहे हैं. इन चुनावों में वैसे तो मुख्य मुकाबला बीजेपी और कांग्रेस के बीच ही है, लेकिन एआईएमएम के नेता असदुद्दीन ओवैसी और आम आदमी पार्टी के नेता व दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी अपने-अपने दलों के लिए मौके तलाश रहे हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: July 3, 2022, 12:29 pm IST
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मध्य प्रदेश: नगरीय-पंचायत चुनाव में क्या संभावनाएं तलाश रहे हैं ओवैसी-केजरीवाल
एमपी में नगरीय और पंचायत चुनावों के दौर चल रहे हैं.

एमपी में नगरीय और पंचायत चुनावों के दौर चल रहे हैं. कुछ जगह तो मतदान भी हो चुके हैं. एमपी के इन चुनावों में प्रचार के एआईएमएम के नेता असदुद्दीन ओवैसी और आम आदमी पार्टी के नेता व दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल की आमद राजनैतिक समझ रखने वालों को भी चौंका रही है. इतने छोटे चुनाव में ये नेता आख़िर क्या संभावनाएं तलाश करने एमपी आए हैं, ये बड़ा सवाल है.


दिल्ली की आम आदमी पार्टी की एक विधायक ने भोपाल नगर निगम चुनाव में प्रचार किया. दरअसल किसी भी स्तर के चुनाव में किसी भी दल के नेता के आने की बात चौंकने वाली नहीं है लेकिन आम आदमी पार्टी की भोपाल मेयर की उम्मीदवार ने जब चुनाव से एन पहले अपना नामांकन वापस ले लिया हो तब दिल्ली की MLA सिर्फ पार्षदों के पक्ष में प्रचार के लिए आएं और केजरीवाल सिंगरौली में प्रचार के लिए आएं, ये हैरत करने वाली बात है. ओवैसी की पार्टी का तो कोई भी उम्मीदवार मैदान में नहीं है.


दरअसल केजरीवाल उत्साहित हैं दिल्ली और उसके बाद पंजाब में मिली जीत से. उन्हें लगता है कि जहां भी सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी से जनता नाराज़ है और कांग्रेस से उम्मीद कम रख रही है, वहां उनके लिए संभावनाएं हो सकती हैं. यद्यपि एमपी दिल्ली या पंजाब नहीं है. पिछले चुनावों से पहले यहां की जनता का भरोसा सिर्फ द्विदलीय राजनीति पर ही था. या तो कांग्रेस पूर्ण बहुमत से जीतती थी या भाजपा. पिछले विधानसभा चुनावों में जरूर विधानसभा में किसी भी पार्टी का बहुमत नहीं था और सहयोगियों की मदद से कांग्रेस ने सरकार बना ली थी और वो बाद में गिर भी गई थी.


केजरीवाल को शायद यही उम्मीद कि किरण दिखती होगी. एमपी केजरीवाल की उमीदों का दिल्ली या पंजाब नहीं हो सकता है, उसकी वज़ह है राज्य की भौगोलिक और सांस्कृतिक परिस्थियां. एमपी मूलतः 5 हिस्सों में न केवल इलाकाई बल्कि राजनैतिक तौर पर भी बंटा हुआ है. महाकौशल, बुंदेलखंड, मालवा, निमाड़ और ग्वालियर चंबल. बहुत रोचक बात ये है कि एमपी में कोई भी सर्वमान्य नेता आज तक नहीं उभरा जो इन सभी इलाक़ों में सिर्फ अपने बूते वोट दिलवा सके. 17-18 साल के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी दावा नहीं सकते कि इन तमाम इलाक़ों में सिर्फ उनके नाम पर वोट डल जाएंगे. दोनों ही प्रमुख दलों कांग्रेस और भाजपा में इन इलाक़ों में अलग अलग नेता हैं, जिनका उन ख़ास इलाक़ों में प्रभुत्व है. मसलन कांग्रेस से कमलनाथ महाकौशल में प्रभुत्व रखते हैं, दिग्विजय सिंह मालवा में, अरुण यादव निमाड़ में. बुंदेलखंड और चंबल में अभी तक कांग्रेस की तरफ से ज्योतिरादित्य सिंधिया के पास ये कमान थी, उनके जाने के बाद कोई बड़ा नेता ऐसा नहीं है, जिसके नाम इन इलाक़ों की वल्दियत लिखी जा सके.


यही हाल भाजपा में है. भाजपा के पास अब सबसे ज्यादा नेता ग्वालियर चंबल में हैं. बुंदेलखंड भूपेन्द्र सिंह, गोपाल भार्गव, गोविन्द राजपूत के अलावा प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा का इलाका है. मालवा में कैलाश विजयवर्गीय, सुमित्रा महाजन के अलावा सिंधिया की नई टीम के सदस्य तुलसी सिलावट सहित कई नेता हैं. भाव सिर्फ इतना कि जब दोनों प्रमुख दलों में बड़े नेताओं की फेहरिश्त है लेकिन किसी एक के बूते अभी पूरे एमपी पर कब्जे की बात नहीं सोची जा सकती तो अरविन्द केजरीवाल एकमात्र राष्ट्रीय और क्षेत्रीय नेता के तौर पर एमपी में आम आदमी पार्टी को क्या जीत दिलाएंगे.


केजरीवाल के लिए क्रिकेट की भाषा में कहा जा सकता है कि वे ‘उत्साह में ज्यादा,विश्वास में कम’ वाले नेता हैं. उन्हें लग रहा होगा कि एमपी में संभावनाएं तलाशने में हर्ज़ क्या है, तब जब कुछ लोग ये प्रचारित कर रहे हों कि जनता कांग्रेस में विपक्ष का चेहरा नहीं तलाशती, बल्कि विपक्ष के लिए भी उसे नई पार्टी चाहिए. संभव है कि ऐसा हो लेकिन एमपी में ना तो कभी व्यापक जनाधार रखने वाली बसपा ये जगह हासिल कर पाई. सपा के भी एक दो एमएलए आते जाते रहते हैं लेकिन वो भी विकल्प नहीं बन पाई, ऐसे में आम आदमी पार्टी को कितना स्पेस मिलेगा, ये कहा नहीं जा सकता. फिर भी केजरीवाल अब इतना बड़ा नाम तो हो ही गए हैं कि उनके आने पर सरकार बयानबाजी करे. सरकार के प्रवक्ता और गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा तंज करते हैं कि आने दीजिए केजरीवाल को. उन्हें ख़ुद जनता बता देगी कि एमपी में उनका वज़ूद कितना है. जब दो राज्यों में सरकार चला रहे अरविन्द केजरीवाल के लिए एमपी में संभावनाएं सीमित हैं, तो भला ओवैसी की बात ही क्या की जाए. फिर भी इन नेताओं की आमद से इतना ज़रूर हुआ है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दल छोटे चुनावों में भी पूरी ताकत झोंक रहे हैं.

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
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प्रवीण दुबे

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First published: July 3, 2022, 12:29 pm IST
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