क्या ज्योतिरादित्य सिंधिया उस नई बहू की तरह हैं, जो आते ही ससुराल वालों को धमकाती है!

ज्योतिरादित्य सिंधिया ( Jyotiraditya Scindia) चाहते हैं कि ऐसे विभाग जो सीधे जनता से जुड़े हैं मसलन: स्वास्थ्य, स्कूल, शिक्षा, महिला एवं बाल विकास, पर्यटन, परिवहन, राजस्व, सहकारिता, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी जैसे उनके ही पास रहना चाहिए. भाजपा (BJP) इस पशोपेश में है कि यदि सब कुछ उन्हें दे दिया तो फिर इनके पास क्या बचेगा?

Source: News18Hindi Last updated on: July 11, 2020, 4:34 PM IST
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क्या ज्योतिरादित्य सिंधिया उस नई बहू की तरह हैं, जो आते ही ससुराल वालों को धमकाती है!
मंत्रिमंडल विस्तार के बाद विभागों के बंटवारे में फंसा पेंच. (File)
मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) में रो-रोकर मंत्रिमंडल विस्तार तो हो गया लेकिन इन पंक्तियों के लिखे जाने तक उनके बीच विभागों का बंटवारा नहीं कर पाए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान (Shivraj Singh Chauhan). रोज की तरह उम्मीद की जा रही है कि शायद आज मंत्रियों के बीच विभागों का बंटवारा हो जाए. मैंने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के मुख्यमंत्री बनने के बाद से अब तक के पूरे कार्यकाल को बहुत क़रीब से देखा है. जब वे टेस्ट क्रिकेट की भाषा में नाइट वॉच मेन की तरह स्थानापन्न मुख्यमंत्री के तौर पर आए थे उसके बाद से सबसे ताक़तवर मुख्यमंत्री तक कभी भी वे इतने असहाय नहीं नज़र आए. ये ठीक है कि सूबे में सरकार बनी ही है ज्योतिरादित्य सिंधिया (Jyotiraditya Scindia) की वजह से लेकिन क्या वे एकमात्र ताकतवर नेता बनना चाहते हैं. पहले ही कैबिनेट विस्तार में जिसे मिनी कैबिनेट कह सकते हैं, 5 में से 2 मंत्री सिंधिया के थे. यानी लगभग आधा आधा उसके बाद के विस्तार में कितने उनके लोग शामिल किए जाएं, इसकी खींचतान चलती रही. उनके समर्थक 12 ऐसे लोग मंत्री बना दिए गए जो विधायक ही नहीं हैं. इसके लिए भी दिल्ली (Delhi) को पसीने आ गए नाम चुनने और काटने में. फिर पेंच फंसा विभागों के बंटवारे में.

ज्योतिरादित्य सिंधिया चाहते हैं कि ऐसे विभाग जो सीधे जनता से जुड़े हैं मसलन: स्वास्थ्य, स्कूल, शिक्षा, महिला एवं बाल विकास, पर्यटन, परिवहन, राजस्व, सहकारिता, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी जैसे उनके ही पास रहना चाहिए. भाजपा इस पशोपेश में है कि यदि सब कुछ उन्हें दे दिया तो फिर इनके पास क्या बचेगा? इनके वरिष्ठ नेता, इनका काडर कहीं बैचेन तो न हो जाए. वैसे कितनी भी राजनैतिक शुचिता का मुलम्मा इसके ऊपर चढ़ाया जाए लेकिन एमपी में सरकार बनी तो सौदेबाज़ी से ही है. पहले ही तय कर लिया गया था कि जो आ रहे हैं उनका राहत एवं पुनर्वास कैसे होगा? फिर पेंच इतना क्यूं फंस गया?  एक बात और.. भाजपा के पास 107 विधायक हैं और सिंधिया के पास 22 जिनमें से सिर्फ 16 उनके हैं बाकी के तो चलती बस में सवार होकर सिर्फ मंत्री बनने की मलाई लूटने साथ हो लिए. खैर, किसी व्यापारिक सौदेबाज़ी से इस राजनैतिक सौदेबाज़ी की तुलना करें तो भाजपा का हिस्सा ज्यादा होना चाहिए, क्यूंकि उसके विधायक ज्यादा हैं. फिर भी धमका सिंधिया ज्यादा रहे हैं. भाजपा धमकी में आ रही है, उसकी लाचारी दिख रही है. कांग्रेस मजे ले रही है और ईश्वर के सामने शायद जोड़ा नारियल रखकर मना भी रही है कि ये झगड़ा और और चलता रहे ताकि दोनों एक्सपोज हों.

mp-CM Shivraj told the vendor - I will come to eat samosa on your shop
भाजपा इस पशोपेश में है कि यदि सब कुछ उन्हें दे दिया तो फिर इनके पास क्या बचेगा? (फाइल फोटो)


अब बात एक्सपोज़ होने की कर लेते हैं...
भाजपा को इस विवाद से नुकसान भी होगा और फायदा भी. नुकसान ये कि जनता के बीच उनकी इमेज ख़राब हो रही है. शिवराज सिंह की इमेज भी लाचार मुख्यमंत्री जैसी बन सकती है. फायदा ये कि सिंधिया का धमकाने वाला चेहरा एक्सपोज यदि जल्दी होगा, तो उन्हें उन्हीं के ग्वालियर चंबल इलाके में नुक्सान होगा. 107 सीटों वाली भाजपा को बहुमत के लिए चाहिए सिर्फ 9 वोट और चुनाव हैं 24 सीटों पर. यानी भाजपा कोशिश करेगी कि वो ग्वालियर चंबल में हार भी जाए और सरकार भी बची रहे. इससे फायदा ये होगा कि सिंधिया का प्रभुत्व भी घट जाएगा और भाजपा वैसी ताकतवर फिर से हो जाएगी. सिंधिया किसी कॉर्पोरेट सेक्टर की तरह “टार्गेट ओरिएंटेड टास्क” पर भाजपा के साथ हैं. यदि टार्गेट से ज्यादा रिजल्ट दिया तो प्रमोशन और इन्क्रीमेंट और यदि नहीं दे पाए तो नौकरी का संकट.

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उमा भारती तो खुलकर बोल भी चुकी हैं कि 24 के बजाय पूरी सीटों पर भाजपा को चुनाव करवाना चाहिए. (फाइल फोटो)


ये भी पढ़ें: Vikas Dubey Encounter: पिता बोले- जो हुआ अच्छा हुआ, सही किया कि पापी मारा गया! दूसरी तरफ किसी भरे पूरे परिवार की तरह कई बड़े-बड़े नेताओं के समुच्चय से भरी भाजपा इस खींचातानी से बैचेन तो है, लेकिन अभे उतनी मुखर नहीं है. नरेंद्र सिंह तोमर, प्रहलाद पटेल, उमा भारती, प्रभात झा, जयभान सिंह पवैया, ये ऐसे नाम हैं, जो बड़े नामों में शुमार हैं. उमा भारती तो खुलकर बोल भी चुकी हैं कि 24 के बजाय पूरी सीटों पर भाजपा को चुनाव करवाना चाहिए. इन्हें भी लग रहा है कि सिंधिया तो उस नई बहू की तरह हो गए हैं,जो ससुराल में कदम रखते ही सभी बड़े बुजुर्गों को धमकाना शुरू कर देती है. जब तक परिवार की इज्जत का सवाल होता है, बड़े बुजुर्ग मौन रहते हैं, उसके बाद फिर वो कोई बड़ा कदम उठाते हैं. एमपी में ये कब होगा, ये वक़्त बताएगा, लेकिन सिंधिया भाजपा को असहज कर रहे हैं, इसमें कोई दो राय नहीं है.

लेखक प्रवीण दुबे न्यूज 18 मध्य प्रदेश के एडिटर हैं.
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First published: July 11, 2020, 3:55 PM IST
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