चुनावी मैथमैटिक्स में हर बार उलझ जाती है बिहारी वोटरों की पॉलिटिक्स!

“आयं हो, चिराग पासमान को एतना भोट है जी, चार परसेंट जात का भोट से नीतीश जी का क्या कबाड़ लेगा. भूलिये मत, नीतीश जी भी चाणक्य हैं पोलटिक्स के.”

Source: News18Hindi Last updated on: October 8, 2020, 12:43 PM IST
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चुनावी मैथमैटिक्स में हर बार उलझ जाती है बिहारी वोटरों की पॉलिटिक्स!
बिहार चुनाव
पिछली शाम सब्जी खरीदने गया था तो हमारी बिल्डिंग के सब्जी वाले के पास मजमा लगा था. सब्जी वाला 60 रुपये किलो परवल तोलते हुए बता रहा था कि “चुनौवा में तो अबले मजा आया है. चिराग पासमान नीतीश बाबू का लंका लगा दिया है. बताइये, ई पलटू बाबा कभी लालू के कंधा पर और कभी मोदी जी के कंधा पर सवार होकर मुख्यमंत्री बन जाते थे और काम-धंधा कुच्छ नहीं. अबले मजा आयेगा.”

“आयं हो, चिराग पासमान को एतना भोट है जी, चार परसेंट जात का भोट से नीतीश जी का क्या कबाड़ लेगा. भूलिये मत, नीतीश जी भी चाणक्य हैं पोलटिक्स के.”

“हां-हां, जानते हैं, सुसासन बाबू के पेट में दांत है. लेकिन ऐबरी दांत उखाड़ने वाला से पाला पर गया है. इलेक्सन का समीकरण चेंज हो गया है, बूझ जाइये.”

सब्जी वाले को चहकते देखकर मुझे खुशी ही हुई. पिछले चार महीने से उसका लटका हुआ चेहरा देखकर मन उदास हो जाता था. कोरोना से पहले उसकी अपनी दो फोरव्हीलर कार थी, छोटा-मोटा ट्रांसपोर्ट का धंधा था. बेटा दिल्ली में लेबर सप्लायर था. कोरोना की वजह से लगे लॉक डाउन में दोनों का धंधा चौपट हो गया. लंबे-चौड़े परिवार को खिलाने-पिलाने और दूसरे जरूरी काम के चक्कर में दोनों गाड़ियां बिक गयीं. पिता ने सब्जी की दुकान खोल ली, बेटा बेली रोड पर मास्क और सेनीटाइजर बेचने लगा. यह कहानी सब्जी वाले ने खुद मुझे मई महीने में सुनायी थी. अचानक पूरे परिवार की जिंदगी बदल गयी थी. सब्जी बेचना उसके पसंद का काम नहीं था, मजबूरी थी. इसलिए उदास रहता था. मगर आज वह बिहार की राजनीति के उलझे समीकरण को सुलझाते हुए खिलखिला रहा था.
जिंदगी ऐसी ही है, इंसान अपने हर गम को भूल जाता है और मौजूदा हालात से समझौता कर लेता है. खास कर बिहार के लोगों के साथ ऐसा अक्सर होता है. इन दिनों राजनीतिक रूप से जागरूक माना जाने वाला तकरीबन हर बिहारी चुनावी राजनीति के समीकरणों पर गॉसिप कर रहा है. वह चिराग पासवान के पॉलिटिकल मूव, भाजपा की चतुराई और नीतीश कुमार के अगले दाव की कयासबाजी कर रहा है. वीआरएस लेकर राजनीति में उतरे पूर्व डीजीपी गुप्तेश्वर पांडेय को टिकट न मिलने पर हंसी-मजाक कर रहा है. अनंत सिंह और मंजू वर्मा और दूसरे कई रेपिस्टों की पत्नियों को टिकट मिलने के मीम्स शेयर कर रहा है. वह भूल चुका है कि महज तीन-चार महीने पहले इसी बिहार में 30 लाख से अधिक प्रवासी मजदूरों का रेला आया था, कोई पैदल चलकर आया था, कोई साइकिल पर तो कोई ट्रक पर. महीने-दो महीने के लॉक डाउन को झेलने की उनकी ताकत नहीं थी.


वह भूल चुका है कि इस बीच न जाने कितने लोग बेरोजगार हो गये और उनमें से कई लोगों ने खुदकुशी कर ली. वह भूल चुका है कि जब कोरोना से जंग लड़ने की बात हो रही थी तो बिहार सरकार ने पटना हाईकोर्ट को बताया था कि उसके पास सिर्फ 2877 डॉक्टर हैं, तीन चौथाई पोस्ट खाली हैं. वह भूल चुका है कि इन्हीं दिनों पिछले साल पूरा पटना पंद्रह दिन तक बारिश के पानी में डूबा था और खुद राज्य के डिप्टी सीएम को एनडीआरएफ की टुकड़ी ने बचाया था.

पिछले साल चमकी बुखार में पौने दो सौ से अधिक बच्चे मर गये थे और सरकार असहाय नजर आ रही थी. वह भूल गया है कि इस साल आयी बाढ़ में पांच लाख से अधिक लोग बेघर थे और सरकार सिर्फ छह हजार लोगों के लिए राहत शिविरों की व्यवस्था कर पायी थी. अभी भी लगभग पूरे उत्तर बिहार में शहरों, कस्बों और गांवों में बाढ़ का और बारिश का पानी जमा है. अमूमन ऐसा होता नहीं था.
अपने दर्द से उबर जाना अच्छा है, मगर अपने दर्द की वजहों को भूल जाना और हालात से समझौता कर लेना कतई अच्छी बात नहीं है. मगर यह बीमारी बिहार के लोगों में खास तौर पर पायी जा रही है. इसी का नतीजा है कि जब पांच साल बाद नसीब बदलने का मौका बिहारी वोटरों के पास आया है तो वह अपने मुद्दों के बदले, चुनावी समीकरणों की बात कर रहा है. चुनावी वोटरों के लिए सत्ता बदलने का अवसर नहीं बल्कि मनोरंजन का अवसर बन जाता है.




पता नहीं समाजशास्त्री और राजनीतिशास्त्री इस सिंड्रोम को कौन सा नाम देते हैं और मनोवैज्ञानिक इसकी व्याख्या कैसे करते हैं, मगर यह अजीब है. जिस राज्य में हर साल बाढ़ आती है और लाखों लोग बेघर हो जाते हैं. जिस राज्य में हर दूसरे परिवार का सदस्य रोजी-रोटी के लिए, दो-चार हजार की नौकरी के लिए पलायन करने पर मजबूर है. जिस राज्य में बेरोजगारी की दर शीर्ष पर है, सरकारी नौकरियों के चार लाख के अधिक पोस्ट खाली हैं. जिस राज्य की 65 फीसदी आबादी भूमिहीन है. जहां के युवा बीए-एमए की पढ़ाई के लिए और छोटी-मोटी बीमारियों के इलाज के लिए भी राज्य से बाहर जाने के लिए बेबस हैं. वहां के चुनाव में कोई मुद्दा नहीं है. बिहार मुद्दाविहीन चुनाव की कगार पर खड़ा है.



बाहर से चुनावी रिपोर्टिंग करने के लिए आने वाले पत्रकार अवाक हैं. वे जहां जा रहे हैं, पब्लिक उन्हें समीकरण समझा रही है. वह यह नहीं बता रही कि इस साल हमें मक्के की फसल आधी कीमत पर बेचनी पड़ी. वह यह नहीं बता रही कि इस लॉक डाउन में लगभग 75 फीसदी परिवारों को कर्ज लेना पड़ा और यह कर्ज कब चुकेगा, मालूम नहीं. वह यह जरूर बता रही है कि फलनमा पांच करोड़ में टिकट खरीदा है. चिलनमा का सेटिंग गड़बड़ा गया, नहीं तो इस बार टिकट उसी को मिलता.



अपने विधानसभा का जातीय गणित लोगों की जुबान पर है. इतना परसेंट यादव, इतना भूमिहार, इतना पचपनिया. मगर उसे अपने परिवार की आय के गड़बड़ाये गणित के बारे में होश नहीं है. यह बेहोशी, अजीब किस्म की है. ऐसा लगता है कि मुद्दों से, सवालों से और अपने स्थायी दुखों से पलायन की यह मनोवृत्ति ही इस राज्य के लगातार पिछड़े रहने की सबसे बड़ी वजह है. पलायन ही बिहार का नसीब है. वे हर दुख से पलायन कर जाते हैं, हालात को बदलने की बिल्कुल कोशिश नहीं करते. (डिस्क्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं)
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First published: October 8, 2020, 12:37 PM IST
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