क्या बिहार के लिए गैरजरूरी है ‘जब तक दवाई नहीं, तब तक ढिलाई नहीं’ का स्लोगन

Bihar assembly elections 2020: ऐसा लग रहा है कि “जब तक दवाई नहीं, तब तक ढिलाई नहीं” के स्लोगन की बिहार के लिए कोई जरूरत नहीं. यह स्लोगन फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन की आवाज में आजकल आप अपने मोबाइल फोन के कॉलर ट्यून में सुन ही रहे होंगे. मगर ऐसा लग रहा है कि बिहार में यह स्लोगन बिल्कुल गैर जरूरी है. इसे एक कान से सुनना है और दूसरे कान से निकाल देना है.

Source: News18Hindi Last updated on: October 15, 2020, 9:17 PM IST
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क्या बिहार के लिए गैरजरूरी है ‘जब तक दवाई नहीं, तब तक ढिलाई नहीं’ का स्लोगन
चुनावी अभियान किस तरह कोरोना के खतरे को बढ़ा रही है, इसका नमूना अभी तीन-चार रोज पहले बिहार के गया शहर में हुई राज्य की पहली चुनावी रैली में हम देख चुके हैं.
बुधवार, 14 अक्तूबर को बिहार की राजधानी पटना में एक साथ 34 चनावी प्रत्याशियों ने नामांकन किया. अमूमन हर प्रत्याशी अपने साथ इतनी भीड़ लेकर आया था कि नामांकन स्थल के पास भीषण मेला लग गया. न मास्क, न सोशल डिस्टेंसिंग. ऐसा लगा कि लोग भूल गये हों कि अभी इस देश में कोरोना का दौर चल रहा है. भारत सरकार ने पिछले ही हफ्ते कोरोना के खिलाफ जन आंदोलन की शुरुआत की है. बुधवार को राजधानी पटना में एक साथ 301 कोरोना मरीजों की पहचान हुई. बिहार राज्य में कुल 1326 कोरोना मरीज मिले. जो कि पिछले कुछ दिनों में मिलने वाले मरीजों के मुकाबले काफी अधिक थी. मगर इस वक्त पूरा बिहार चुनावी बुखार में डूबा हुआ है और वह कोरोना के बुखार को इग्नोर कर रहा है.

पहले यह तय हुआ था कि कोरोना काल में बिहार में होने वाले विधानसभा चुनाव में रैलियां डिजिटल होंगी, नोमिनेशन भी ऑनलाइन ही किये जायेंगे. प्रत्याशियों को अपने चार-पांच समर्थकों के साथ डोर-टू-डोर संपर्क करने की इजाजत होगी. मगर चुनाव का वक्त आते-आते खुद चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों और प्रत्याशियों को हर तरह की छूट दे दी है. अब रैलियां भी हो रही हैं, नोमिनेशन में भीड़ भी उमड़ रही है और बैठकें भी हो रही हैं. पिछले चुनावों और इस चुनाव में कोई खास फर्क नहीं रह गया.

ऐसा लग रहा है कि “जब तक दवाई नहीं, तब तक ढिलाई नहीं” के स्लोगन की बिहार के लिए कोई जरूरत नहीं. यह स्लोगन फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन की आवाज में आजकल आप अपने मोबाइल फोन के कॉलर ट्यून में सुन ही रहे होंगे. मगर ऐसा लग रहा है कि बिहार में यह स्लोगन बिल्कुल गैर जरूरी है. इसे एक कान से सुनना है और दूसरे कान से निकाल देना है. ऐसा लग रहा है कि बिहार में कोरोना खत्म हो चुका है और इससे डरने की कोई जरूरत नहीं. मगर क्या सचमुच ऐसा है?

इन दिनों मिल रहे कोरोना से संबंधित आंकड़े कम से कम ऐसा नहीं कहते. पिछले कुछ दिनों से बिहार में रोज नौ सौ से एक हजार के बीच मरीज मिल रहे थे, बुधवार को मिलने वाले कोरोना मरीजों की संख्या 1326 हो गयी. सबसे खतरनाक स्थित राजधानी पटना की है, जहां बुधवार को 301 मरीज मिले, जबकि पिछले कुछ दिनों से दो सौ से ढाई सौ के बीच मरीज मिल रहे थे. बहुत जल्द बिहार में कोरोना मरीजों की संख्या दो लाख के पार पहुंचने वाली है. अब तक 1,99,549 मरीज मिल चुके हैं. हालांकि रिकवरी रेट ठीक है और अभी कुल 10,583 मरीज ही सक्रिय हैं. मगर यह संख्या भी कम नहीं है. अब तक कुल 967 लोगों की इस रोग से मौत हो चुकी है. यह आंकड़ा भी एक हजार के पार जल्द जा सकता है.
मार्च और अप्रैल महीने में एक-एक कोरोना मरीज मिलने पर हमलोग भयभीत होते थे, और उस वक्त सख्त किस्म का लॉकडाउन लगा था. अब हर तरह की रियायत है. दुखद तथ्य यह है कि जिस दौर में सरकार, राजनीतिक पार्टियां और चुनाव आयोग कोरोना के खतरे को गैरजरूरी मान रहा है, उसी वक्त बिहार सरकार के एक मंत्री की मौत कोरोना से होने की खबर आयी है. तीन रोज पहले मंत्री विनोद सिंह की मौत हो गयी. हालांकि उनकी मौत की वजह ब्रेन हेमरेज से हुई, मगर वे कोरोना पीड़ित रहे थे और इसके पीछे कोरोना होने की वजह से इनकार नहीं किया जा सकता.

ये आंकड़े बता रहे हैं कि राज्य में पहले भी कोरोना की स्थिति बहुत नियंत्रित नहीं थी, मगर बुधवार को तो इसमें उछाल आ गया है. बहुत मुमकिन है, इस उछाल की वजह चुनावी अभियान हो. क्योंकि इसके अलावा किसी अन्य कार्य में सोशल गैदरिंग की इजाजत सरकार ने नहीं दी है.

स्कूल, कॉलेज बंद हैं. पूजा-पाठ और धार्मिक आयोजनों पर सख्ती है. केवल चुनाव प्रचार का अभियान ही है, जिसे बिहार में हर तरह की छूट मिली हुई है. इसको लेकर बिहार के लोगों में एक अलग तरह की प्रतिक्रिया भी है. सोशल मीडिया में इस तरह की चुटीली टिप्पणियां चल रही हैं कि बिहार में चुनाव को छोड़कर हर चीज से कोरोना हो सकता है. एक तरफ चुनावी अभियान को छूट और दूसरी तरफ धार्मिक, सामाजिक आयोजनों पर रोक. इसका भी विरोध किया जा रहा है.चुनावी अभियान किस तरह कोरोना के खतरे को बढ़ा रही है, इसका नमूना अभी तीन-चार रोज पहले बिहार के गया शहर में हुई राज्य की पहली चुनावी रैली में हम देख चुके हैं. भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा की इस रैली में जुटे लोग न मास्क पहने थे, न उनके बैठने की व्यवस्था में सोशल डिस्टेंसिंग का ख्याल रखा गया था. मगर चुनाव आयोग ने इस मसले पर कोई दिशानिर्देश जारी नहीं किये. उसके बाद तो रोज चुनावी रैलियां होने लगी हैं. उससे भी बुरे हाल हैं, हर रैली के. पूरे कोरोना काल में बहुत अधिक सतर्कता बरतने वाले राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी आखिरकार चुनावी रैलियां शुरू कर दी हैं. आखिर इस चुनावी जंग में कोई कैसे पीछे रहे.

मगर इन सबका दुष्परिणाम यह है कि अपने नेताओं को कोरोना से बेखौफ देखकर जनता और बेखौफ हो गयी है. वह हर नियम-कायदे को गैरजरूरी मान रही है. ऐसा माहौल बन गया है कि कोरोना खत्म हो चुका है. या कभी था ही नहीं. ऐसे में कोरोना को जन-आंदोलन बनाने का अभियान या जब तक दवाई नहीं, तब तक ढिलाई नहीं का स्लोगन बिहार में बेमतलब है. खुद पीएम मोदी जिन्होंने इस अभियान की शुरुआत की थी, वे बिहार में तीन चुनावी रैलियां करने वाले हैं.

सच तो यह है कि इन तमाम गड़बड़ियों के पीछे चुनाव आयोग नामक उस जिम्मेदार संस्था की गैर-जिम्मेदारी नजर आ रही है, जिस पर न सिर्फ निष्पक्ष बल्कि इस कोरोना काल में सुरक्षित चुनाव कराने की जिम्मेदारी थी. मगर न जाने किस दबाव में अपने ही पुराने फैसलों को पलटती रही और अब बिल्कुल उसी ढर्रे पर आ गयी है, जैसे पहले चुनाव हुआ करते थे.
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First published: October 15, 2020, 9:14 PM IST
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