बिहार चुनाव 2020: आखिर नौकरी देने के नाम पर सरकार को क्यों आती है खजाने की याद?

सरकारी नौकरियां (Government jobs) देने का वादा सिर्फ चुनावी घोषणा नहीं है. इसके पीछे बिहार के बेरोजगार युवकों का भारी दबाव है. राज्य में इस वक्त बेरोजगारी की दर 46.6 फीसदी तक पहुंच गयी है. इन्हीं, बेरोजगार युवकों की वजह से एनडीएन के खिलाफ जबरदस्त एंटी इंकंबेंसी का माहौल है. अगर सरकार इन लोगों को नौकरियां देती हैं तो इससे सिर्फ इन लोगों का कैरियर नहीं संवरेगा, कई तरीके से बिहार को लाभ होगा.

Source: News18Hindi Last updated on: October 24, 2020, 5:38 PM IST
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बिहार चुनाव 2020: आखिर नौकरी देने के नाम पर सरकार को क्यों आती है खजाने की याद?
सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि बिहार सरकार की अपनी वर्क इफिसियेंशी बढ़ेगी और राज्य खुद बखुद प्रगति की राह पर चल पड़ेगा. (सांकेतिक फोटो)
पटना. “दस लाख नौकरी दने की डपोरशंखी घोषणाओं के लिए अतिरिक्त 58 हजार करोड़ कहां से लायेगा विपक्ष?” यह सवाल गुरुवार 22 अक्तूबर को बिहार के डिप्टी सीएम सुशील कुमार मोदी (Sushil Kumar Modi) ने ट्विटर पर पूछा था. उस सवाल के साथ उन्होंने वह हिसाब भी पेश किया था, जिसके तहत अगर बिहार सरकार (Bihar Government) 10 लाख नये लोगों को नौकरियां देती है तो उसके खजाने पर 58,415.06 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ जायेगा. यह कह कर सुशील मोदी ने तेजस्वी यादव के वायदे पर सवाल खड़ा किया था. राजद नेता तेजस्वी यादव (Tejashwi Yadav) आजकल अपनी चुनावी सभा में यह दावा जोर-शोर से कर रहे हैं कि वे अपनी पहली कैबिनेट बैठक में दस लाख लोगों को नौकरी देने का फैसला करेंगे और यह दावा इन दिनों बिहार चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा बन गया है.

अपने इस ट्वीट के जरिये सुशील मोदी तेजस्वी द्वारा खड़े किये गये इसी मुद्दे का काउंटर करने की कोशिश कर रहे थे. हालांकि उनके इस ट्वीट के थोड़ी ही देर बाद भाजपा की तरफ से वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पार्टी का बिहार चुनाव संकल्प पत्र घोषित किया और उसमें उन्होंने 4 लाख सरकारी नौकरियों समेत कुल 19 लाख लोगों के रोजगार की बात की. तेजस्वी के 10 लाख नौकरियों के दावों पर सवाल उठाने के लिए सुशील मोदी पहले भी सोशल मीडिया पर सवालों के घेरे में थे और अपनी ही पार्टी के घोषणापत्र की वजह से वे बाद में भी सवालों के घेरे में रहे. लोग लगातार उनसे सवाल करते रहे हैं.





बिहार में कुल 3,44,201 सरकारी कर्मी ही कार्यरत हैं
दरअसल अपने उस ट्वीट में सुशील मोदी ने जो जानकारी उजागर की थी, वह उनकी सरकार की कमजोर अर्थव्यवस्था की पोल खोल रही थी, जो उनके डबल डिजिट ग्रोथ के दावों से मैच हीं कर रहा था. सबसे पहले तो उन्होंने बताया कि बिहार में कुल 3,44,201 सरकारी कर्मी ही कार्यरत हैं. इससे साफ उजागर हो रहा था कि 13 करोड़ की आबादी वाले राज्य बिहार में सरकार के पास कर्मियों की घोर कमी है. जिन 10 लाख कर्मियों की नियुक्ति की बात कही गयी, उसमें उन्होंने 1.25 लाख चिकित्सकों की बात कही थी, जबकि इस वक्त बिहार में सिर्फ 2877 चिकित्सक हैं. इससे भी यह जाहिर होता है कि बिहार में सरकारी सेवाओं की स्थिति कितनी लचर है.

अपने इस ट्वीट में उन्होंने इस बात को खास तौर पर इस बात का उल्लेख किया कि इतने लोगों को नौकरियां देने की वजह से सरकार पर 58 हजार करोड़ के खजाने का बोझ पड़ेगा. इसलिए विपक्ष का यह दावा अव्यवहारिक है. उनके इस तर्क पर सोशल मीडिया में बिहार के लोगों ने सवाल पूछना शुरू कर दिया कि अगर सरकार के पास लोगों को नौकरी देने के लिए पैसे नहीं हैं, तो वह क्यों म्यूजियम, सभ्यता द्वार, म्यूजियम के लिए टनल जैसी परियोजनाओं पर हजारों करोड़ खर्च करती हैं. एक व्यक्ति ने तो यह सवाल भी पूछ लिया कि अगर सचमुच बिहार की अर्थव्यवस्था इतनी लचर है तो राज्य विधान परिषद जैसे गैरजरूरी संस्थान को क्यों बंद नहीं कर देता. हालांकि बाद में बीजेपी ने खुद अपने संकल्प पत्र में चार लाख लोगों को सरकारी नौकरी देने का वादा किया है, जिसके बारे में मैं न्यूज 18 नेटवर्क के अपने ब्लॉग में पहले ही लिख चुका हूं. चार सितंबर का यह आलेख यहां पढ़ सकते हैं.

 एक लाख स्वास्थ्य सेवा के पदों का वायदा किया हैबिहार भाजपा कह रही है कि उसने अपने घोषणा पत्र में सिर्फ तीन लाख शिक्षकों के पद और एक लाख स्वास्थ्य सेवा के पदों का वायदा किया है. जबकि सुशील मोदी ने 10 लाख सरकारी नौकरियों का जो ब्रेकअप पेश किया है, उसमें 1.25 लाख चिकित्सक, 2.50 लाख पारामेडिकल स्टाफ, 2.50 लाख शिक्षक, 50 हजार कालेज शिक्षक, 95 हजार पुलिसकर्मी, 75 हजार इंजीनियर और दो लाख अनुसेवकों का जिक्र है.

अगर बिहार भाजपा के दावों को ही मानें तो यह जाहिर है कि बिहार में सरकारी नौकरियों में चार लाख पद खाली हैं, ऐसे में यह सवाल पूछा ही जाना चाहिए कि ये पद क्यों खाली हैं. 15 साल की एनडीए सरकार में लगातार रिक्तियां बढ़ती गयीं और सरकार ने उन्हें भरना जरूरी नहीं समझा. हमेशा कोशिश की गयी कि इनके बिना ही काम चला लिया जाये. सरकारी कर्मियों के इस अभाव का असर बिहार सरकार के अपने परफार्मेंस पर भी पड़ा, तभी 15 साल के शासन के बावजूद सरकार उस स्तर का काम नहीं कर पायी जो उससे अपेक्षित था.

सरकारी नौकरियां देने का वादा सिर्फ चुनावी घोषणा नहीं है
सरकारी नौकरियां देने का वादा सिर्फ चुनावी घोषणा नहीं है. इसके पीछे बिहार के बेरोजगार युवकों का भारी दबाव है. राज्य में इस वक्त बेरोजगारी की दर 46.6 फीसदी तक पहुंच गयी है. इन्हीं, बेरोजगार युवकों की वजह से एनडीएन के खिलाफ जबरदस्त एंटी इंकंबेंसी का माहौल है. अगर सरकार इन लोगों को नौकरियां देती हैं तो इससे सिर्फ इन लोगों का कैरियर नहीं संवरेगा, कई तरीके से बिहार को लाभ होगा.

सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि बिहार सरकार की अपनी वर्क इफिसियेंशी बढ़ेगी और राज्य खुद बखुद प्रगति की राह पर चल पड़ेगा. दूसरा लाभ यह होगा कि अगर शिक्षा औऱ स्वास्थ्य विभाग के सभी पद भर दिये गये तो यहां के लोगों को पढ़ाई और इलाज के लिए बाहर जाने की जरूरत नहीं होगी और बिहार के लोग इन दोनों काम में हर साल जो हजारों करोड़ की राशि बाहर जाकर खर्च करते हैं, वे बिहार में खर्च होंगे और राज्य की आमदनी बढ़ेगी. तीसरा लाभ यह होगा राज्य सरकार जिन युवाओं को नौकरी देगी, वे अपनी आमदनी बिहार में ही खर्च करेंगे औऱ इससे राज्य की अंदरूनी अर्थव्यवस्था भी सुधरेगी. अभी तो लोग रोजी रोटी के लिए पलायन करते हैं और अपनी प्रतिभा, श्रमशक्ति दूसरे राज्य के विकास में लगाते हैं, जो कमाते हैं उसका बड़ा हिस्सा उस राज्य में खर्च करते हैं. अभी भले ही यह कदम खर्चीला मालूम हो रहा है, मगर बाद में इसके कई लाभ होंगे.

सरकारें नौकरियों में बहाली को अर्थव्यवस्था विरोधी कदम मानती हैं
मगर दुर्भाग्यवश हमारी सरकारें नौकरियों में बहाली को अर्थव्यवस्था विरोधी कदम मानती हैं. इसलिए पिछले कुछ दशकों से लगातार सरकारी नौकरियों के पदों को घटाने की कोशिश चल रही है. सरकारी सेवकों को सैलरी देना बोझ माना जाता है, ऐसी धारणा बन गयी है कि सरकारी सेवक वेतन के अनुपात में योगदान नहीं करते. पर अगर सरकार चाहे तो यह कर सकती है. मगर सरकार अपनी तमाम जिम्मेदारियां निजी क्षेत्र पर डाल कर मुक्त होने की कोशिश में है. और इसका नुकसान जनता को भोगना पड़ता है. बिहार के ये अनुभव देश को इस मसले पर फिर से सोचने की राह देते हैं.  सरकारी नौकरियां सिर्फ खजाने का बोझ नहीं, प्रगति की राह भी है.
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First published: October 24, 2020, 2:23 PM IST
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