OPINION: बिहार चुनाव में चाहकर भी पसंदीदा उम्मीदवार को वोट नहीं दे पा रहे लोग!

Bihar Chunav 2020: ऐसे दर्जनों उम्मीदवार हैं, जिनके पीछे काम करने का बेहतरीन अनुभव है. इनके क्षेत्र के मतदाता (Voter) इनके काम की सराहना भी कर रहे हैं. मगर दो ध्रुवीय होती राजनीति में मतदाता इनके बदले उस गठबंधन के प्रत्याशी को वोट देने का मन बना चुके हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: October 31, 2020, 1:48 PM IST
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OPINION: बिहार चुनाव में चाहकर भी पसंदीदा उम्मीदवार को वोट नहीं दे पा रहे लोग!
इसलिए अगर राजनीति को बदलना है तो वोटरों को ही पहल करना पड़ेगा. (सांकेतिक फोटो)
पटना. बिहार का चुनाव (Bihar election 2020) परवान पर है, पहला चरण बीत चुका है, अब बमुश्किल हफ्ते भर का समय बच गया है. बेरोजगारी के मुद्दे से शुरू हुआ यह चुनाव अब पूरी तरह से दो ध्रुवीय हो चुका है. पहला ध्रुव उन लोगों का है, जो मानते हैं कि बिहार में अब हर हाल में सत्ता बदलनी चाहिए. उनके सामने महागठबंधन (Grand Alliance) एक मजबूत विकल्प के रूप में है और वे उसके पाले में एकजुट हो रहे हैं. दूसरा विकल्प जो मानता है कि मौजूदा सरकार को अभी बने रहना चाहिए, महागठबंधन की राजनीति का अतीत बेहतर नहीं है. वे एनडीए के पाले में एकजुट हैं. हालांकि इस बीच में एक तीसरा कार्नर भी है, जो यह चाहता है कि सत्ता में भाजपा बनी रहे और नीतीश कुमार (Nitish Kumar) गद्दी से उतर जायें, वे कई सीटों पर चिराग पासवान (Chirag Paswan) की पार्टी लोजपा को वोट दे रहे हैं. मगर वह भी कमोबेश दूसरे विकल्प का ही हिस्सा है.

मगर इस दो ध्रुवीय होती बिहार की राजनीति ने उन लोगों का बड़ा नुकसान किया है, जो योग्य हैं, मगर इन दोनों दलों ने उन्हें मौका नहीं दिया. वोटर उन्हें पसंद कर रहे हैं, मगर कह रहे हैं कि आपको वोट देने का लाभ क्या है. आप जीतेंगे तो नहीं, जीतेंगे भी तो सरकार में शामिल तो नहीं हो पायेंगे. वहीं, ऐसे कई लोग चुनाव जीत की कगार पर हैं, जो अयोग्य थे, उनका चरित्र आपराधिक रहा है, मगर बड़ी पार्टियों ने उन्हें टिकट दे दिया है. दरअसल, आम मतदाता अब यह सोचकर वोट करने लगा है कि हमेशा विनिंग कैंडिडेट को वोट देना चाहिए, और खास कर ऐसे उम्मीदवार को जिसकी पार्टी की सरकार में आने की सबसे बेहतर संभावना हो. इस चक्कर में वह अपना बेहतर प्रतिनिधि चुनने में चूक जाता है.

कई ऐसे स्वतंत्र और छोटी पार्टियों के उम्मीदवार हैं
इस बार बिहार चुनाव में कई ऐसे स्वतंत्र और छोटी पार्टियों के उम्मीदवार हैं, जिनके पुराने काम और बेदाग चरित्र के कारण लोग उन्हें खूब पसंद कर रहे हैं. उनके इन्नोवेटिव आइडियाज के कारण उन्हें राष्ट्रीय मीडिया से भी सराहना मिल रही है. इनमें शिवहर से प्लूरल्स पार्टी के उम्मीदवार राकेश कुमार सिंह हैं, सीएसडीएस जैसी पब्लिक पालिसी संस्था में काम करने के बाद इन्होंने जेंडर इक्विटी के सवाल पर साइकिल से पूरे देश की यात्रा की थी. अररिया के नरपतगंज से अखिलेश कुमार हैं, जो डीएसपी की नौकरी छोड़कर समाजसेवा के काम में उतर गये थे. उन्होंने चमकी बुखार और बाढ़ के वक्त काम करने वाले युवाओं की काफी मदद की थी. लड़कियों को फुटबाल खेल से जोड़ने वाली सामाजिक कार्यकर्ता प्रतिमा कुमारी पासवान हैं, जो पटना के फुलवारी शरीफ विधानसभा से मैदान में है. पर्यावरण के मसले पर काम करने वाले शरद कुमार हैं, जो पटना के ही कुम्हरार से चुनाव लड़ रहे हैं.
ऐसे दर्जनों उम्मीदवार हैं, जिनके पीछे काम करने का बेहतरीन अनुभव है. इनके क्षेत्र के मतदाता इनके काम की सराहना भी कर रहे हैं. मगर दो ध्रुवीय होती राजनीति में मतदाता इनके बदले उस गठबंधन के प्रत्याशी को वोट देने का मन बना चुके हैं, जिन्हें वे पसंद कर रहे हैं. जो भले ही दागी क्यों न हो. भले ही वह लंबे समय से विधायक रहा है और उसने क्षेत्र के लिए कोई काम नहीं किया हो. लोग इन बेहतर प्रत्याशियों को यह कह कर मना कर रहे हैं कि आप वैसे भी नहीं जीतेंगे, और जीत भी जायेंगे तो सरकार का हिस्सा नहीं बनेंगे. फिर आपको क्यों वोट दिया जाये. ऐसे में बेहतरीन ट्रैक रिकार्ड और बेदाग छवि के बावजूद ऐसे उम्मीदवार संघर्ष कर रहे हैं.


संघर्ष कर रहे अच्छे उम्मीदवार
इसके उलट इस चुनाव में बड़ी संख्या में दागी, अपराधी, रेपिस्ट उनके परिवार के सदस्य, ऐसे लोग जिनकी एकमात्र पहचान सही-गलत तरीके से कमाया हुआ उनका पैसा है, बड़ी संख्या में चुनावी मैदान में हैं. इन्हें खूब समर्थन भी मिल रहा है, क्योंकि इनके पीछे पार्टियों की मशीनरी और उनकी आइडियोलॉजी है. पार्टियों और गठबंधनों की वजह से इनमें से कई लोगों की जीत लगभग पक्की है. लेकिन इस बिहार चुनाव में जहां जाति और धर्म के सवाल पीछे छूट रहे हैं और जनता के जरूरी सवाल असली मुद्दा बन गये हैं, और इस बात की हर तरफ सराहना हो रही है. मगर दो ध्रुवीय हो चुकी राजनीति की वजह से अच्छे उम्मीदवार संघर्ष कर रहे हैं और अयोग्य प्रत्याशी चुने जाने की स्थिति में हैं, यह दुखद सवाल अभी भी लोगों को मथ रहा है.अच्छाई की ताकत बढ़ाने को करें मतदान
यह कहा जा सकता है कि देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में यह बहुत सहज बात है, अक्सर ऐसा होता है. मगर नये जमाने के हिसाब से इसमें बदलाव भी जरूरी है. अगर लोग अच्छे प्रत्याशियों को इस आधार पर वोट नहीं देंगे कि वे जीतेंगे नहीं और जीतेंगे भी तो सरकार में शामिल नहीं होंगे तो राजनीति में अच्छे लोग कैसे आयेंगे? ऐसे में फिर यही लोग चुनाव के बाद कहेंगे कि राजनीति में अच्छे लोग नहीं आते तो यह कितना उचित होगा. अगर लोग सचमुच राजनीति को बेहतर होना देखना चाहते हैं तो उन्हें ऐसे उम्मीदवारों को वोट देना चाहिए, जिनके पीछे उनके काम का ट्रैक रिकॉर्ड है, जिनमें अच्छा काम करने की संभावना है. भले ही वे जीतें या न जीतें. सरकार में शामिल हो या न हो. अगर आप उन्हें वोट करेंगे तो उनकी राजनीतिक ताकत मजबूत होगी, अगली दफा बड़ी पार्टियां भी ऐसे उम्मीदवारों को टिकट देंगी. यह संदेश भी जायेगा कि जनता अब अच्छे उम्मीदवारों को पसंद करने लगी है. इसलिए भले ऐसे उम्मीदवारों के जीतने की बहुत कम संभावना हो, फिर भी अगर आप उन्हें पसंद करते हैं तो जरूर वोट दें. यह सोचना गलत है कि हमें हमेशा जीतने वाले उम्मीदवारों को ही वोट करना चाहिए. कई दफा अच्छे लोग अकेले भी खड़े हों तो उनके साथ खड़े होना चाहिए, ताकि अच्छाई की ताकत मजबूत हो.

मतदाताओं को ही करनी होगी पहल
इससे उलट अगर आप पार्टी के नाम पर अयोग्य, दागी, अपराधी, भ्रष्ट और धनपशु उम्मीदवारों को वोट करते रहे तो पार्टियां यही सोचेंगे कि जनता ऐसे ही लोगों को पसंद करती हैं. इसलिए अगली दफा भी वह ऐसे ही लोगों को टिकट देगी. राजनीति भी ऐसी ही बनी रहेगी. धनबल और बाहुबल का बोलबाला बरकरार रहेगा. कई लोग कहते हैं कि पार्टी विचारों के हिसाब से चलती है, इसलिए हमें उम्मीदवारों पर नहीं पार्टियों पर ध्यान देना चाहिए. मगर सवाल यह है कि अगर पार्टियां सचमुच विचारों के हिसाब से चलती हैं, तो ऐसे वह अपराधी और पैसे वाले उम्मीदवारों को टिकट क्यों देती हैं. वस्तुतः अभी मुख्यधारा की ज्यादातर पार्टियां ऐसे ही लोगों को टिकट देती हैं, जो किसी भी तरह से जीत सकें. इसलिए अगर राजनीति को बदलना है तो वोटरों को ही पहल करना पड़ेगा. वरना हम कई दशकों तक यही कहते रह जायेंगे, राजनीति में अच्छे लोग नहीं आते. (डिस्क्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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First published: October 31, 2020, 1:38 PM IST
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