नीतीश: बीजेपी से कितनी दूर, एनडीए के कितने साथ?

सत्ताधारी एनडीए का हिस्सा होने के बावजूद जदयू और उसके नेता नीतीश कुमार का केंद्र सरकार से उलट स्टैंड लोगों को चौंका रहा है. इस मसले को लेकर कई तरह के कयास लगाये जा रहे हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: August 4, 2021, 12:36 PM IST
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नीतीश: बीजेपी से कितनी दूर, एनडीए के कितने साथ?

न दिनों जब संसद में सरकार विपक्ष के चौतरफा विरोध का सामना कर रही है, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पेगासस जासूसी मामले की जांच की मांग करके एक तरह से विपक्षी दलों के पक्ष को मजबूत कर दिया है. इससे पहले, वे केंद्र सरकार से जातिगत जनगणना की मांग भी कर चुके हैं. इस मसले पर भी बिहार में जदयू विपक्षी दलों के साथ खड़ा नजर आ रहा है. सत्ताधारी एनडीए का हिस्सा होने के बावजूद जदयू और उसके नेता नीतीश कुमार का केंद्र सरकार से उलट स्टैंड लोगों को चौंका रहा है. इस मसले को लेकर कई तरह के कयास लगाये जा रहे हैं.


कुछ लोग यह कहने लगे हैं कि लगता है नीतीश एक बार फिर से भाजपा को छोड़कर राजद के साथ जाने और सरकार बनाने वाले हैं, कुछ लोगों को इसमें नीतीश की खुद को तीसरे मोर्चे के नेता के तौर पर प्रोमोट करने की कोशिश नजर आ रही है. मगर इन सबका मकसद क्या है, यह समझना इतना आसान नहीं है. क्योंकि कई दफा वे विवादित मुद्दों पर भाजपा से अलग स्टैंड लेकर भी एनडीए में बने रह जाते हैं, जैसे सीएए का मुद्दा. ऐसे में राजनीति के जानकारों के लिए यह डिकोड कर पाना बड़ा मुश्किल हो जाता है कि नीतीश बीजेपी से कितने दूर हैं और एनडीए के कितने पास.


दरअसल यह सच है कि नीतीश 2005 से ही उस भाजपा के साथ मिलकर बिहार की सत्ता की कमान संभालते रहे हैं, जिसकी अपनी छवि हिंदुत्ववादी राजनीतिक दल की रही है. जबकि नीतीश कुमार का एक राजनेता के तौर पर विकास समाजवादी और लोहियावादी पृष्ठभूमि में हुआ है. ऐसे में भाजपा और जदयू दोनों कई मुद्दों पर वैचारिक रूप से अलग नजर आते हैं. भले ऐसा करने में कई दफा सफल न हो, मगर नीतीश अक्सर कहते हैं कि वे क्राइम, करप्शन और कम्युनलिज्म से समझौता नहीं करते. खास तौर पर वे हमेशा से सांप्रदायिक राजनीति से परहेज करते रहे हैं.


अटल-आडवाणी का दौर और NDA का साझा कार्यक्रम

जब तक अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे नेता भाजपा को लीड कर रहे थे, तब तक जरूर भाजपा की छवि थोड़ी लिबरल थी और एक समय में एनडीए का गठन भी एक साझा कार्यक्रम के तहत हुआ था, तब तक अपने समाजवादी स्टैंड के साथ एनडीए के साथ बने रहना नीतीश के लिए सहज था. शुरुआत में एनडीए में जिन विवादास्पद मुद्दों से परहेज करने की बात थी, भाजपा ने इस दौर में उन तमाम मुद्दों पर खुल कर स्टैंड लेना शुरू कर दिया. ऐसे में नीतीश के लिए स्थितियां असहज होने लगीं. एक बार वे इसी वजह से एनडीए से भी अलग हो गये.



राजद के साथ भी नीतीश कुमार बहुत सहज नहीं रह पाये और वे एनडीए में लौट आए. जिसके बाद से, भाजपा विवादास्पद मुद्दों पर उनसे सहमत कराने की कोशिश करती आई है. 2020 के विधानसभा चुनाव में जिस तरह जदयू की सीटें काफी कम हो गईं और भाजपा गठबंधन में नंबर वन पार्टी बन गई, इसे भी लोग भाजपा की इसी रणनीति का हिस्सा मानते हैं. यह कयास लगाये जाते रहे हैं कि बहुत जल्द भाजपा में जदयू का विलय हो जायेगा.


मगर इन दिनों नीतीश कुमार की गतिविधियों से ऐसा लग रहा है कि वे अपने और अपनी पार्टी के इस अंत के लिए सहमत नहीं हैं. वे अपनी पार्टी को सांगठनिक रूप से मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं, विपक्षी दलों के विधायक को अपनी पार्टी में शामिल कर रहे हैं और पार्टी का आधार भी बढ़ा रहे हैं. इसके अलावा, वे खुद भी व्यक्तिगत रूप से सक्रिय हो रहे हैं. उन्होंने फिर से जनता दरबार का अपना पापुलर कार्यक्रम शुरू कर दिया है, ताकि लोगों से सीधे जुड़ सकें.


मौजूदा परिस्थितियों का शुरू हुआ आंकलन

मंगलवार को लंबे समय के बाद उन्होंने राज्य के पांच जिलों की सड़क मार्ग से यात्रा की. कहने को तो यह कोरोना जागरूकता से संबंधित यात्रा थी, मगर मकसद यह था कि वे राज्य की परिस्थितियों को सीधे अपनी आंखों से देख सकें. इस सोमवार के जनता दरबार में उन्होंने जनता की शिकायतों का निवारण नहीं करने वाले अधिकारियों को तीखी फटकार लगाई. कुल मिलाकर वे विधानसभा चुनाव में अपनी और अपने दल की घटी क्षमता को फिर से हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं.



जदयू की घटी क्षमता को फिर से हासिल करने की कोशिश में वे कई मुद्दों पर भाजपा से अलग राय भी जाहिर करते हैं, ताकि जनता के बीच उनकी पुरानी छवि फिर से मजबूत हो. इन दिनों उनके समर्थक फिर से उन्हें पीएम मटेरियल भी बताने लगे हैं. हालांकि, इन सबसे यह अंदाजा लगाना कि वे एनडीए से अलग होने वाले हैं, या वे तीसरे मोर्चे को लीड करने की ख्वाहिश रखते हैं, यह जल्दबाजी होगी.


फिलहाल तो यही लगता है कि वे पिछले साल के विधानसभा चुनाव में अपनी और अपने पार्टी की घटी हैसियत को फिर से पाने की कोशिश कर रहे हैं. इसी कोशिश में जब वे महसूस करते हैं कि सहयोगी थोड़ा कमजोर है, उससे अलग राय जाहिर कर अपनी स्थित मजबूत करने का दांव चल देते हैं. वैसे भी नीतीश कुमार के पास राजद के साथ जाकर सरकार बना लेने का विकल्प हमेशा है, क्योंकि सीटें घट जाने के बावजूद अंकगणित उनके साथ है. पिछले पांच-छह साल से इसी अंकगणित के भरोसे वे कमजोर होने पर भी बिहार की सत्ता के केंद्र में बने हुए हैं.



(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
पुष्यमित्र

पुष्यमित्रलेखक एवं पत्रकार

स्वतंत्र पत्रकार व लेखक. विभिन्न अखबारों में 15 साल काम किया है. ‘रुकतापुर’ समेत कई किताबें लिख चुके हैं. समाज, राजनीति और संस्कृति पर पढ़ने-लिखने में रुचि.

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First published: August 4, 2021, 12:36 PM IST
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