कोरोनाकाल में भी बदलने को तैयार नहीं 'भोज-खौका' समाज

हिंदू धर्म से जुड़े कर्मकांड के पुस्तकों में कहीं भी श्राद्ध के अवसर पर धूमधाम से भोज खिलाने की बात नहीं कही गई है. फिर भी बिहार के अररिया जिले का उदाहरण सामने है, जहां महिला की मौत के बाद अंतिम संस्कार में गांव के लोग भले नहीं गए, लेकिन श्राद्ध-भोज पर सैकड़ों की भीड़ जुटी. कोरोनाकाल में हमें संवेदनशील होने की जरूरत है.

Source: News18Hindi Last updated on: May 27, 2021, 11:52 AM IST
शेयर करें: Facebook Twitter Linked IN
कोरोनाकाल में भी बदलने को तैयार नहीं 'भोज-खौका' समाज
बिहार के अररिया जिले में कोरोना से मौत के बाद जिस महिला के अंतिम संस्कार में लोग संक्रमण के डर से नहीं गए, उसके श्राद्ध में 150 लोगों की भीड़ भोज खाने को जमा हुई.
“कंधा देने कोई नहीं आया, मगर भोज खाने के लिए भीड़ लग गई.” यह कहानी बिहार के अररिया जिले के एक गांव मधुलता की है और मुमकिन है आपलोगों की निगाह से भी गुजरी होगी. एक किशोरी पीपीई किट पहनकर अकेले अपनी मां का शव दफना रही थी और वह तस्वीर वायरल हो गई थी. उस बच्ची के पिता की मौत चार दिन पहले हो गई थी, बाद में मां भी गुजर गईं. कोरोना से मरने वाले 40 साल के पिता और 32 साल की मां की अब तीन संतानें, दो बेटी और एक बेटा बचे हैं. उस वक्त संक्रमण के भय से गांव और समाज का कोई व्यक्ति अंतिम संस्कार के वक्त साथ देने नहीं आया था. अब ताजा खबर है कि उसके माता-पिता के मृत्यु भोज में शामिल होने 150 लोग पहुंचे हैं.

यह अजीबोगरीब कहानी है. खासकर इस लिहाज से कि यह गांवों को लेकर हमारे मन में बसी छवि को तोड़कर रख देती है. एक जमाना था, जब गांव का समाज हर दुख में लोगों के साथ खड़े हो जाने के लिए जाना जाता था. तब गांव में कोई खुद को अकेला नहीं समझता था. एक भरोसा रहता था कि लोग मदद करेंगे ही, कोई संकट में नहीं छोड़ेगा.

मगर इस कहानी ने हमें समझाया कि हाल के कुछ वर्षों में हमारे गांवों का चरित्र बदल गया है. अब जब कोई व्यक्ति या परिवार दुख या किसी परेशानी में फंसता है तो उसका साथ देने के लिए अमूमन कोई सामने नहीं आता. लोग तरह-तरह के बहाने बनाने लगते हैं. मगर जहां अपने लाभ की बात हो तो वे हर तरह का खतरा उठाने के लिए तैयार हो जाते हैं. यह अवसरवाद की ऐसी बीमारी है जो अब गांव के समाज को धीरे-धीरे क्षरण की तरफ ले जा रही है.

इस खबर से गुजरते हुए मालूम हुआ कि उन तीन छोटे बच्चों पर मृत्यु भोज की वजह से कर्ज भी हो गया है. संभवतः गांव के लोगों को उम्मीद है कि इन बच्चों को उनके माता-पिता की मृत्यु की वजह से मिलने वाले मुआवजे के पैसों से इस कर्ज का निबटारा हो जाएगा. किसी ने यह नहीं सोचा कि मुआवजे के इन पैसों को अभी नहीं छुआ जाए, क्योंकि इन छोटे बच्चों के लिए यही पैसे आगे के जीवन का संबल बनेंगे. यह सोच कर भी हैरत होती है कि कैसे लोगों ने इन अनाथ बच्चों के माता-पिता का श्राद्ध भोज खाया होगा.

श्राद्ध के लिए संपत्ति दांव पर


हैरत होती है कि 1936 में प्रकाशित हिंदी साहित्य की मशहूर कृति 'गोदान' ऐसे ही मिलते-जुलते विषय पर लिखी गई थी. जब एक गरीब किसान को गोदान करने के लिए अपना सबकुछ दांव पर लगाना पड़ा था. हिंदी पट्टी का समाज आज भी नहीं बदला. श्राद्ध भोज के लिए आज भी गांव में गरीब लोगों को खेत बेचना औऱ अपनी संपत्ति को दांव पर लगाना पड़ता है. हाल में ही एक गांव में एक विधवा महिला को अपने हिस्से के सारे खेत बेचकर अपने पति का श्राद्ध भोज करने के लिए समाज ने मजबूर किया था. ऐसे अवसर पर समाज यह कभी नहीं कहता कि फलां व्यक्ति आर्थिक रूप से सक्षम नहीं है, उस पर श्राद्ध भोज का दवाब नहीं डाला जाए. समाज आज भी गरीब से गरीब व्यक्ति पर श्राद्ध भोज आयोजित करने का दबाव बनाता है.

यह बड़ा रोचक प्रसंग है कि हिंदू धर्म से जुड़े कर्मकांड के पुस्तकों में कहीं भी श्राद्ध के अवसर पर धूमधाम से भोज खिलाने की बात नहीं कही गई है. उन पुस्तकों में साफ-साफ कहा गया है कि श्राद्ध कर्म के उपरांत अपनी क्षमता के अनुसार 11 ब्राह्मणों को भोजन कराएं, तदुपरांत बचे भोजन को अपने परिवार और कुटुंबों के साथ ग्रहण करें. इसके बावजूद मृतक के परिजनों पर यह मानसिक दबाव बनाया जाता है कि वह धूमधाम से भोज करे और पूरे गांव को खिलाए. यह भी कहा जाता है कि अगर बड़े पैमाने पर भोज न किया जाए तो मृतक की आत्मा को शांति नहीं मिलेगी. ऐसे में अपने लोगों को खो देने के कष्ट से पीड़ित लोगों को मजबूरन भोज खिलाना पड़ता है.

मानवीय स्वभाव को फिर से पाने की जरूरत


इस कोरोना काल में जब लोग लगातार अपने परिजनों को असमय खो रहे हैं, उस वक्त भी हमारा समाज बदलने को तैयार नहीं है. वह लगातार नष्ट हो रहे अपने मानवीय स्वभाव को फिर से पाने की कोशिश नहीं कर रहा. वह अनाथ बच्चों से भी छप्पन प्रकार के व्यंजनों वाले भोज की उम्मीद रखता है. वह उन अनाथ बच्चों की मदद नहीं करता, मगर अपने भोजन के अधिकार को गंवाना नहीं चाहता.

इसी गांव में अब तक कोरोना से कुछ औऱ लोगों की मौत हो चुकी है, कुछ अस्पताल में जीवन और मृत्यु से जूझ रहे हैं. फिर भी लोग न सचेत हो रहे, न उनमें संवेदना आ रही है. खबर यह भी है कि इन अनाथ बच्चों के घर भोज खाने पहुंचने वाले कई लोग कोरोना संक्रमित भी थे, मगर भोज के नाम पर लोगों ने कोरोना के भय को भुला दिया. यह वही समाज है तो अंतिम संस्कार के वक्त महज इसलिए सामने नहीं आ रहा था, कि कहीं वह संक्रमित न हो जाए. मजबूरन उन बच्चों को अपनी मां के दाह संस्कार के बदले उसे दफन करना पड़ा था. अगर आज यह कहा जाए कि ऐसे भोज-खौका समाज के मुंह पर थू है, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी. (डिस्क्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं.)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
पुष्यमित्र

पुष्यमित्रलेखक एवं पत्रकार

स्वतंत्र पत्रकार व लेखक. विभिन्न अखबारों में 15 साल काम किया है. ‘रुकतापुर’ समेत कई किताबें लिख चुके हैं. समाज, राजनीति और संस्कृति पर पढ़ने-लिखने में रुचि.

और भी पढ़ें

facebook Twitter whatsapp
First published: May 27, 2021, 11:52 AM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर