अनुकरणीय: हिंदी के इस प्रोफेसर की जिद से मिले भागलपुर को चार पार्किंग प्लेस

डॉ. योगेंद्र (Dr. Yogendra) की इस पहल ने उसे समझाने की कोशिश की कि हर गलत फैसले का विरोध करना चाहिए और अगर कोई काम सार्वजनिक हित का हो तो उसके लिए खुद को थोड़ी व्यक्तिगत परेशानी में डालने से भी नहीं हिचकना चाहिए.

Source: News18 Bihar Last updated on: July 20, 2021, 1:07 PM IST
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अनुकरणीय: हिंदी के इस प्रोफेसर की जिद से मिले भागलपुर को चार पार्किंग प्लेस
भागलपुर जिले के डीएम सुब्रत सेन ने स्वीकार किया कि शहर में पार्किंग जोन तय नहीं है. (सांकेतिक फोटो)
पटना. डॉ. योगेंद्र बिहार के तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय (Tilkamanjhi Bhagalpur University) में हिंदी विभाग के अध्यक्ष हैं. मगर वे देश के दूसरे विश्वविद्यालय के हिंदी के प्रोफेसरों जैसे नहीं हैं, जिनका ज्यादातर वक्त अपने विभाग के संचालन और छात्रों को पीएचडी कराने में बीतता है. वे सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर भी लगातार मुखर रहते हैं. पिछले दिनों उनके पुत्र के साथ एक अजीब घटना हो गयी. उनके पुत्र सुकांत कार से सपरिवार भागलपुर बाजार में खरीदारी कर रहे थे, उनकी कार बाजार में रुकी हुई थी. पुलिस ने अवैध पार्किंग के आरोप में उनके पुत्र की कार को उठाने की कोशिश की. उनके पुत्र ने पुलिस से सवाल कर दिया कि यह जगह नो पार्किंग जोन है, इसकी सूचना कहां दर्ज है. अगर कहीं है तो इस बाजार में आपने पार्किंग (Parking) के लिए कौन सी जगह तय की है? किसी नागरिक के सवाल से चिढ़ जाने वाली पुलिस ने हाथापायी शुरू कर दी.

दूसरे लोगों के लिए यह सामान्य घटना हो सकती थी. वे पुलिस से कुछ लेनदेन कर मामले को रफा-दफा कर सकते थे. पुलिस से उलझने वाले पुत्र को उसके तजुर्बेकार पिता समझाइश दे सकते थे कि अगर सपरिवार हो तो झगड़ना ठीक नहीं. मगर डॉ योगेंद्र पहले पता किया कि शहर में कितने पार्किंग जोन हैं और नो पार्किंग का बोर्ड कहीं लगा है या नहीं. अपनी तफ्तीश में उन्हें पता चला कि पूरे भागलपुर शहर में स्थानीय प्रशासन ने एक भी जगह ऐसी तय नहीं की है, जिसे पार्किंग जोन कहा जा सके. यानी आप बाजार में आप कहीं कार नहीं लगा सकते, जहां लगायेंगे वह अवैध पार्किंग ही कहलायेगी. यानी आप कार लेकर बाजार नहीं जा सकते. दूसरी बात यह कि शहर के किसी बाजार में कहीं यह नहीं लिखा है कि यह नो पार्किंग जोन है. यह बड़ी अजीब स्थिति थी.

पार्किंग के नाम पर परेशान नहीं करने की थी
डॉ. योगेंद्र ने तय किया कि वे इस मामले का विरोध करेंगे. उन्होंने स्थानीय प्रशासन को पत्र लिखकर सूचना दी कि वे इस घटना के विरोध में और शहर में पार्किंग जोन तय करने की मांग को लेकर 10 जुलाई को धरना पर बैठेंगे. उनका इरादा अकेले धरना पर बैठने का था, मगर उनके पीछे उनके पुत्र और उनकी पत्नी भी पहुंच गये. फिर सोशल मीडिया पर इस धरने की सूचना आयी और शहर के कई बुद्धिजीवी वहां पहुंचने लगे. 10 जुलाई को आयोजित यह धरना जिसमें ज्यादातर शहर के पढ़े लिखे लोग, लेखक, प्रोफेसर, सामाजिक कार्यकर्ता और गांधीवादी शामिल थे. काफी सफल रहा. भागलपुर शहर के लिए यह बिल्कुल नयी घटना थी, जब शहर का बौद्धिक तबका वाजिब कारणों से सड़क पर उतरा था. उनकी मांग पार्किंग जोन तय करने और जब तक पार्किंग जोन तय नहीं होता, कार या बाइक सवार को नो पार्किंग के नाम पर परेशान नहीं करने की थी.
तीन दशक में गुम हो चुके नागरिक बोध को जगाने वाली थी
यह घटना पिछले दो-तीन दशक में गुम हो चुके नागरिक बोध को जगाने वाली थी. उस धरना में आमलोग भी पहुंचे और सोशल मीडिया में भी इस विषय पर खूब चर्चा हुई. इस विषय पर खुद मेरे लिखे पोस्ट को काफी लोगों ने शेयर किया. बाद में लोकल मीडिया में भी यह खबर आयी और आखिरकार प्रशासन को इस बारे में गंभीरता से सोचना पड़ा. प्रशासन ने जल्द ही घोषणा की कि शहर के चार प्रमुख स्थलों पर पार्किंग जोन बनेंगे. इसके लिए टेंडर जारी हो रहे हैं और यह काम हर हाल में सितंबर महीने तक शुरू हो जायेगा. इसके साथ ही यह भी तय हुआ कि नो पार्किंग की सूचना भी परिवहन विभाग द्वारा शहर में जगह-जगह लगायी जायेगी. शहर के बड़े दुकानदारों को पार्किंग के लिए जगह बनाने के निर्देश दिये गये और कहा गया कि जिस दुकान के पार्किंग स्पेस में कोई और दुकान लगी है, उसे खाली कराया जायेगा.

शहर में पार्किंग जोन तय नहीं हैभागलपुर जिले के डीएम सुब्रत सेन ने स्वीकार किया कि शहर में पार्किंग जोन तय नहीं है, मगर साथ ही उन्होंने यह अपील भी की कि जब तक पार्किंग जोन नहीं बन जाते लोग सहयोग करें और बीच सड़क पर कार न रोकें. प्रशासन जल्द इस मुद्दे का समाधान करने जा रहा है. इस तरह इस मुद्दे का सकारात्मक हल निकला और एक हिंदी के प्रोफेसर का जायज नागरिक विरोध सफल साबित हुआ. इस घटना ने बिहार जैसे राज्य के मध्यम वर्ग को झकझोरने का काम किया. वह मध्यम वर्ग जो पिछले तीन दशकों से यह मानकर चल रहा है कि हमें एडजस्ट करके चलना चाहिए और ऐसे मामलों में नहीं फंसना चाहिए जिसमें अपने समय, धन और प्रतिष्ठा के नुकसान की संभावना हो. अपना काम चतुराई से निकाल लेना चाहिए, सही-गलत के फंदे में नहीं फंसना चाहिए. जिसने सरकार से लेकर समाज तक के हर गलत फैसले का विरोध करना छोड़ दिया है और हमेशा बीच का सरल रास्ता निकालता रहा है, ताकि खुद को और अपने परिवार को किसी परेशानी से बचा सके. इस कोशिश में वह सुविधाभोगी, अवसरवादी और चतुर बनकर रह गया है.

दूसरे शहरों के मध्यम वर्ग के लोगों को भी इसे अपनाना चाहिए
डॉ. योगेंद्र की इस पहल ने उसे समझाने की कोशिश की कि हर गलत फैसले का विरोध करना चाहिए और अगर कोई काम सार्वजनिक हित का हो तो उसके लिए खुद को थोड़ी व्यक्तिगत परेशानी में डालने से भी नहीं हिचकना चाहिए. उन्होंने एक पूरा दिन उस धरने के लिए निकाला. शहर के कचहरी के सामने धरती पर चादर बिछाकर अकेले बैठे. पहले लोगों ने उनकी हंसी उड़ाई, फिर विरोध किया. इस विरोध को कार वालों का प्रपंच बताया गया, इसे राजनीतिक नौटंकी का नाम दिया गया. कई लोगों ने पुराने विवाद की वजह से भी उनका विरोध किया. मगर बहुत जल्द उन्हें साथ देने वाले लोग जुटने लगे. पुलिस और प्रशासन के लोग उनसे बात करने पहुंचने लगे. आखिरकार उनकी पहल का काफी सकारात्मक नतीजा निकला. इस विरोध की वजह से प्रशासन ने जो फैसले लिये वे लंबी अवधि तक भागलपुर शहर के लिए लाभदायक होंगे. इस विरोध की वजह से पुलिस आम लोगों के साथ गलत व्यवहार करने में हिचकेगी. निश्चित तौर पर यह खूबसूरत पहल है, दूसरे शहरों के मध्यम वर्ग के लोगों को भी इसे अपनाना चाहिए.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
पुष्यमित्र

पुष्यमित्रलेखक एवं पत्रकार

स्वतंत्र पत्रकार व लेखक. विभिन्न अखबारों में 15 साल काम किया है. ‘रुकतापुर’ समेत कई किताबें लिख चुके हैं. समाज, राजनीति और संस्कृति पर पढ़ने-लिखने में रुचि.

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First published: July 20, 2021, 12:59 PM IST
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