OPINION: चंपारण, गांधी और कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के अनुभव

Gandhi Jayanti: गांधी ने चंपारण में देश का पहला सत्याग्रह किया और यहां के किसानों को नील की खेती की बाध्यता से मुक्ति दिलाई. ऐसे में आज जब पूरा देश गांधी को याद कर रहा है और किसान कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग को लेकर बने नए कानून से छुटकारा पाने के लिए सड़कों पर संघर्षरत हैं. क्या हम सौ-डेढ़ सौ साल पुराने उस नील की खेती के अनुभव को याद कर सकते हैं?

Source: News18Hindi Last updated on: October 2, 2020, 3:17 PM IST
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OPINION: चंपारण, गांधी और कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के अनुभव
देश में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग को लेकर कानून बनने के बाद बिहार के लोगों को नील की खेती का दौर याद आ गया.
पिछले हफ्ते जैसे ही कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग का कानून बना, पूरे देश को पेप्सिको और आलू किसानों का विवाद याद आया तो बिहार के पुराने लोगों को नील की खेती का दौर याद आ गया. चंपारण समेत पूरे उत्तर भारत में होने वाली नील की खेती भी अपनी तरह का कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग ही थी, जिसमें यूरोपियन प्लांटर्स यहां के किसानों से जबरन नील की खेती करवाते थे. किसान इस जोर जबर्दस्ती से काफी परेशान थे, दोनों के बीच टकराव होते थे और साधन संपन्न होने की वजह से प्लांटरों का पलड़ा भारी पड़ता. किसान खूब संघर्ष करते और हार जाते. आखिर में किसानों ने अपनी लड़ाई लड़ने महात्मा गांधी को बुलाया. गांधी ने चंपारण में देश का पहला सत्याग्रह किया और यहां के किसानों को नील की खेती की बाध्यता से मुक्ति दिलाई. ऐसे में आज जब पूरा देश गांधी को याद कर रहा है और किसान इस नए कानून से छुटकारा पाने के लिए सड़कों पर संघर्षरत हैं. क्या हम सौ-डेढ़ सौ साल पुराने उस नील की खेती के अनुभव को याद कर सकते हैं?

दरअसल, ईस्ट इंडिया कंपनी का जब पुराने बंगाल यानी बंगाल, बिहार, असम और ओड़िशा के इलाकों पर राज हुआ, उसे मुगलों ने दीवानी अधिकार दिए, इस इलाके में स्थायी बंदोबस्त लागू हुआ, तभी से इस पूरे इलाके में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग का दौर शुरू हो गया. नदियों से भरा यह पूरा इलाका खेती के लिहाज से काफी उपयुक्त था. ऐसे में यहां व्यापार करने आए ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों ने अपनी नौकरियां छोड़ कर स्थानीय जमींदारों से जमीन लीज पर लेना शुरू किया. यहां उन्होंने गन्ना, नील, अफीम इत्यादि कॉमर्शियल फसलों की खेती शुरू कर दी. किसान उस वक्त रैयत होते थे, उन्हें जमींदारों को टैक्स चुकाना पड़ता था. उन्हें मजबूर होकर इन फसल की खेती करनी पड़ी. इसमें नील की खेती काफी दुखदायी थी, हर किसान को अपने हर बीस कट्ठे जमीन में से तीन कट्ठे पर नील की खेती करनी पड़ती थी, जिसे तिनकठिया प्रथा कह कर पुकारा जाता था.

इस खेती में किसानों को न के बराबर लाभ होता. नील प्लांटर्स पहले ही उपज की कीमत तय कर देते, जो बहुत कम होती. जबकि दुनियाभर में भारतीय नील की खूब मांग थी, प्लांटर्स खूब मुनाफा कमाते. किसान कंगाल के कंगाल रह जाते. उस खेती के कहर के बारे में बताते हुए 1848 में एक डिप्टी कलेक्टर ईडी लाटूर ने अपनी रिपोर्ट में एक पादरी को उद्धृत करते हुए लिखा था- 'ब्रिटेन पहुंचने वाली नील की एक भी गांठ ऐसी नहीं होती जो मानव रक्त से रंजित न हो.'


1860 में जब इन शिकायतों की वजह से बंगाल में नील आयोग का गठन किया गया तो एक अन्य डिप्टी मजिस्ट्रेट आस्ले इडेन ने बयान दिया, 'जब गोरों पर मुकदमा होता है तो न्यायालय में न्याय को भुला दिया जाता है. उसी आयोग के समक्ष किसानों ने बयान दिया कि हमारा गला भी काट दिया जाए तो भी हम खेतों में नील नहीं बोएंगे. हम उस देश में चले जाएंगे, जहां नील के पौधे न कभी बोए गए हैं और न ही देखे गए हैं. हम गोली खा लेंगे मगर नील नहीं बोएंगे.' ये तीन पंक्तियां यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि उस कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग का किस तरह का कहर किसानों को भुगतना पड़ता था और कैसे किसान गोली खाने के लिए तैयार हो गए थे.
1858 में बंगाल में नील की खेती के खिलाफ बड़ा आंदोलन हुआ और किसानों ने नील की खेती बंद करवा दी. फिर ये नील प्लांटर बिहार के इलाके में पांव पसारने लगे. खास तौर पर उत्तर बिहार में. उत्तर बिहार में भी बार-बार नील प्लांटरों को किसानों के विरोध का सामना करना पड़ा. बाद में इसके बुरे कहर को देखते हुए दरभंगा महाराज ने अपने इलाके में नील की खेती बंद करवा दी.

ऐसे में सारे प्लांटर धीरे-धीरे चंपारण के इलाके में जुट गए. तिरहुत से उजड़े प्लांटरों को सबसे मुफीद इलाका चम्पारण का लगा. वहां बेतिया राज घराना भारी कर्ज के बोझ से दबा था. उन्होंने कर्ज चुकाने की गारंटी दी और बदले में नीलहों को वहां के 2220 गांवों में से 1938 गांव के पट्टे दे दिए गए. वहां इनकी मनमानी चलने लगी. खेती के साथ-साथ वही सब शुरू हो गया, जो पहले बंगाल में हुआ था, फिर तिरहुत के इलाके में हुआ.

मगर वहां भी किसान लगातार विरोध करते रहे. उन दिनों किसानों द्वारा विरोध किए जाने की एक बड़ी वजह थी कि इस पूरे इलाके में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग की वजह से व्यावसायिक खेती बढ़ गयी और खाद्यान्नों का उत्पादन घट गए. ऐसे में बार-बार भोजन की कमी हो जाती और लोगों को अकाल का सामना करना पड़ता. यह संतुलन इतना बिगड़ गया कि नील की फसल के मुकाबले धान की खेती करना काफी अधिक फायदेमंद लगने लगता. ऐसे में किसान अधिक से अधिक धान की खेती करना चाहते थे, मगर वे शर्तों से बंधे थे.
दिलचस्प है कि उस वक्त कॉन्ट्रैक्ट खेती की ये शर्तें किसानों को गुलामी का प्रतीक लगतीं, मगर आज उसे आजादी का नाम दिया जा रहा है. चंपारण के ये अनुभव बताते हैं कि एक कंपनी और एक किसान में कभी बराबरी का अनुबंध नहीं हो सकता. हमेशा कंपनी का पलड़ा भारी रहेगा, उसे सत्ता का समर्थन मिलेगा, विरोध करने वाले किसान कुचले जाएंगे और गुलाम हो जाएंगे.


इसी गुलामी को उतार फेंकने के लिए उन्होंने लगातार आंदोलन किया. अंग्रेज सरकार अपनी ताकत के दम पर किसानों के आंदोलन को बार-बार कुचलती रही. तब जाकर किसानों ने गांधी जी को बुलाया, उन्होंने किसानों को तिनकठिया प्रथा से मुक्ति दिलायी. इस बात को बिहार के पुराने लोग भूले नहीं भूल पाते. वे शायद ही कभी इस बात को समझ पाएंगे कि कंपनियों के अनुबंध से बंधी यह खेती उनके लिए लाभदायक भी हो सकती है. उन्हें इस बात का भरोसा भी नहीं है कि इस बार वे फंसे तो कोई गांधी उन्हें बचाने आएगा. नील की खेती के उदाहरण ने तो उन्हें यही सिखाया है. (लेखक चंपारण सत्याग्रह पर किताब 'जब नील का दाग मिटा- चंपारण 1917' लिख चुके हैं. ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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First published: October 2, 2020, 3:13 PM IST
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