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बिहार के चुनावी दंगल में ताज नीतीश को, राज बीजेपी का

Bihar Election2020: इस चुनाव के नतीजों के बाद नीतीश कुमार (Nitish Kumar) और जदयू (JDU) का अपर हैंड खत्म हो गया है. उनकी पार्टी को मिली भीषण हार और बिहार में बीजेपी को अच्छी संख्या में सीटें मिलने से एनडीए (NDA) के भीतर का पावर सेंटर भी बदलेगा.

Source: News18Hindi Last updated on: November 11, 2020, 10:55 AM IST
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बिहार के चुनावी दंगल में ताज नीतीश को, राज बीजेपी का
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (न्यूज 18 ग्राफिक्स)
कांटे की टक्कर में पल-पल रोमांच लाने वाले बिहार चुनाव (Bihar Election) के नतीजे देर रात आ चुके हैं. एनडीए (NDA) को बहुमत से सिर्फ तीन सीटें अधिक मिली हैं, मगर अब तक इस गठबंधन को लीड करने वाली मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जदयू को बड़ा नुकसान हुआ है. उसकी सीटें 71 से घटकर सिर्फ 43 रह गयी हैं. इतने भारी नुकसान के बावजूद बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व ने तय किया है कि बिहार में एनडीए के मुखिया नीतीश ही रहेंगे और वही सीएम बनेंगे. मगर सवाल यह उठ रहे हैं कि सीटों की संख्या में बीजेपी से लगभग आधी रह जाने के बावजूद क्या नीतीश अब भी वैसे खुल कर राज कर पायेंगे, जिस तरह अब तक वे करते रहे हैं. कहीं ऐसा तो नहीं होगा कि बिहार में ताज तो नीतीश कुमार के सिर पर रहेगा और राज बीजेपी करेगी.

दरअसल इस चुनाव से पहले तक बिहार में जदयू की सीटें 71 थीं तो भाजपा की 53 इस वजह से जदयू स्वाभाविक रूप से बिहार में बड़े भाई की भूमिका में थी. सरकार में उनके मंत्रियों की संख्या भी अधिक थी और इस वजह से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी मजबूत स्थिति में थे. वे अक्सर अपनी बातें भाजपा से मनवा लेते थे. बीजेपी के सहयोग से लगभग 13 साल बिहार में सरकार चलाने के बावजूद नीतीश कुमार ने कभी संघ या बीजेपी के एजेंडे को खुल कर बिहार में लागू होने नहीं दिया. 2014 के लोकसभा चुनाव के पहले तक तो उनका इस गठबंधन में इतना दबदबा था कि वे कहते थे, हमारे पास अपने मोदी हैं, हमें नरेंद्र मोदी की जरूरत नहीं.

मगर इस चुनाव के नतीजों के बाद नीतीश कुमार और जदयू का अपर हैंड खत्म हो गया है. उनकी पार्टी को मिली भीषण हार और बिहार में बीजेपी को अच्छी संख्या में सीटें मिलने से जाहिर सी बात है, एनडीए के भीतर का पावर सेंटर भी बदलेगा. अभी भले बीजेपी नीतीश कुमार को सीएम बनाने के लिए तैयार दिखती है, मगर जैसे ही कुछ वक्त बीतेगा वह उन पर दबाव बनाना शुरू करेगी. उन्हें अपने एजेंडे पर काम करने कहेगी. यह बीजेपी के लिए भी मुफीद होगा कि उनके अपने एजेंडे को कोई गैर भाजपाई पार्टी लागू करे, जिससे विरोध उसे झेलना पड़े. जाहिर सी बात है, ऐसे में अब तक करप्शन, कम्यूनलिज्म और क्राइम से समझौता नहीं करने वाले नीतीश कुमार के लिए आने वाले दिन असहज साबित होंगे.

यह सर्वविवित है कि बिहार बीजेपी का एक बड़ा धड़ा जिसमें अश्विनी चौबे, गिरिराज सिंह और संजय पासवान जैसे नेता हैं, वे नीतीश कुमार को पसंद नहीं करते. इस नतीजे के बाद उनकी दिली इच्छा थी कि नीतीश कुमार सत्ता छोड़ दें और बिहार में बीजेपी का कोई नेता सीएम बने. बिहार में बीजेपी समर्थकों की भी लंबे समय से यह दिली इच्छा थी कि नीतीश कुमार को हमने काफी देख लिया, अब सीएम की कुर्सी पर उनकी पार्टी का आदमी होना चाहिए. मगर केंद्रीय नेतृत्व कई वजहों से नीतीश कुमार के पक्ष में ही खड़ा रहा. इस वक्त भी वह उनके पक्ष में ही भरोसा जता रहा है.
इसकी कुछ वजहें साफ हैं, पहली वजह यह है कि इन दिनों शिवसेना और अकाली दल के एनडीए छोड़ने के बाद नीतीश कुमार की जदयू ही ऐसी इकलौती बड़ी पार्टी रह गयी है, जिनकी वजह से एनडीए का अस्तित्व कायम है. वह इसलिए उन्हें खोना नहीं चाहती है. इसके अलावा खतरा यह भी है कि अगर इस वक्त बीजेपी अपने सीएम की बात करती है तो नीतीश कुमार महागठबंधन की तरफ रुख कर सकते हैं और 2015 के पैटर्न पर सरकार बन सकती है. बीजेपी पर अक्सर इस बात के आरोप भी लगते रहते हैं कि वह अपने सहयोगियों को कमजोर करने का प्रयास करती है. इस बिहार चुनाव में तो उन पर ये आरोप काफी गंभीर हैं, वह इस आरोप का दाग भी मिटाना चाहती है, नहीं तो आने वाले वक्त में उनके पास सहयोगियों का टोटा हो सकता है. इन्हीं मजबूरियों में उसने फिलहाल नीतीश कुमार को आगे रखने का फैसला किया है.

हालांकि अब यह निर्विवाद रूप से स्थापित हो चुका है कि इस चुनाव में बीजेपी ने जदयू को काफी कंट्रोल तरीके से नुकसान पहुंचाया. उसने जदयू के खिलाफ न सिर्फ चिराग पासवान की लोजपा को आगे बढ़ाया बल्कि बीजेपी के कोर वोटरों ने भी जदयू के उम्मीदवारों को वोट नहीं दिये. इसी वजह से बीजेपी की अपनी 21 सीटें तो बढ़ी, मगर जदयू की 28 सीटें घट गयीं. अगर नीतीश कुमार मजबूत होते तो वे इसे भितरघात मानते और इसके खिलाफ रिएक्ट करते, बीच में ऐसे संकेत भी मिल रहे थे कि शायद नीतीश सीएम पद के लिए यह कहते हुए मना कर दें कि बड़ी पार्टी न होने की वजह से उनका इस पद पर नैतिक हक नहीं है. मगर उनकी तरफ से ऐसी कोई प्रतिक्रिया नहीं आयी है, इससे ऐसा लगता है कि शायद उन्होंने बीजेपी का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया है.

वैसे भी हाल के दिनों में नीतीश कुमार बीजेपी और नरेंद्र मोदी के सामने नतमस्तक होते नजर आये हैं. नरेंद्र मोदी पहले नीतीश कुमार को मान्य हुए, फिर उन्होंने मोदी की सरपरस्ती भी स्वीकार कर ली. एनडीए में रहते हुए जिस धारा 371, तीन तलाक और राम मंदिर जैसे मुद्दों का वे विरोध करते थे, वे धीरे-धीरे उन्हें मान्य हो गये. सीएए-एनआरसी के मुद्दे पर भी उनका रवैया काफी ढुलमुल नजर आया. पिछले तीन-चार साल में लोगों ने उन्हें एक सेकुलर नेता से बीजेपी की विचारधारा वाले नेता में बदलते देखा है. ऐसे में उनसे किसी तरह के प्रतिरोध की उम्मीद भी जायज नहीं लगती. इसी वजह से जानकार इस मेंडेट को इस रुप में देख रहे हैं कि ताज भले अभी नीतीश के सिर पर है, मगर बिहार में बीजेपी का राज आ गया है. (डिस्क्लेमर: यह लेखक के निजी विचार हैं.)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
पुष्यमित्र

पुष्यमित्रलेखक एवं पत्रकार

स्वतंत्र पत्रकार व लेखक. विभिन्न अखबारों में 15 साल काम किया है. ‘रुकतापुर’ समेत कई किताबें लिख चुके हैं. समाज, राजनीति और संस्कृति पर पढ़ने-लिखने में रुचि.

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First published: November 11, 2020, 10:52 AM IST
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