कश्मीर से कन्याकुमारी तक बिहारियों की मौत इतनी सस्ती क्यों?

कश्मीर के हमलों पर ही बात की जाये तो आतंकवादियों के लिए सबसे आसान लक्ष्य बिहारी कामगार ही था. जो खबरें आ रही हैं, उससे मालूम होता है कि उनकी नयी रणनीति बाहरी लोगों पर हमला करने की थी और वे अमूमन पहचान पत्र देखकर बाहरी लोगों पर हमला कर रहे थे. मगर बिहारी मजदूरों की हत्या करने के लिए उन्हें किसी पहचान पत्र की जरूरत नहीं थी.

Source: News18Hindi Last updated on: October 21, 2021, 11:55 AM IST
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कश्मीर से कन्याकुमारी तक बिहारियों की मौत इतनी सस्ती क्यों?

भी कश्मीर में ठेला लगाकर रोजगार करने वाले चार बिहारी कामगारों की हत्या का दुख कम हुआ नहीं था कि दो और बुरी खबरें आ गयीं. पहली खबर गुजरात से आयी, जहां एक पैकेजिंग कंपनी में हुए हादसे में बिहार के दो श्रमिकों की मौत हो गयी, कई घायल हो गये. वहीं अगली खबर उत्तराखंड के नैनीताल से आयी, जहां एक निर्मानाधीन दीवार के गिरने से तीन बिहारी मजदूरों की मौत हो गयी. इस तरह देखें तो हाल के दिनों में नौ बिहारी मजदूरों की विपरीत परिस्थितियों में मौत हो गयी.


इन सभी मौतों में एक बात कॉमन थी, सभी मजदूर मौत के आसान शिकार थे. आतंकी हमलों का भी पहला असर इन गरीब मजदूरों पर पड़ा और आपदाओं-हादसों के शिकार भी बिहारी मजदूर ही हुए. वजह यह थी कि थोड़े से पैसों के लिए अपने घर से हजारों किमी दूर मजदूरी करने वाले ये बिहारी हर जगह सबसे अधिक असुरक्षित थे और उनके दूसरे लाखों साथी भी अलग-अलग राज्यों में इन्हीं असुरक्षाओं के बीच में जीने को विवश हैं.


अगर कश्मीर के हमलों पर ही बात की जाये तो आतंकवादियों के लिए सबसे आसान लक्ष्य बिहारी कामगार ही था. जो खबरें आ रही हैं, उससे मालूम होता है कि उनकी नयी रणनीति बाहरी लोगों पर हमला करने की थी और वे अमूमन पहचान पत्र देखकर बाहरी लोगों पर हमला कर रहे थे. मगर बिहारी मजदूरों की हत्या करने के लिए उन्हें किसी पहचान पत्र की जरूरत नहीं थी. उन्हें मालूम था कि सड़कों के किनारे ठेला लगाकर रोजी रोटी कमाने वाले जो भी लोग हैं, वे कश्मीरी नहीं हैं.


वे बाहरी मजदूर ही होंगे. कुसंयोग से उसमें सारे बिहारी मजदूर ही थे, क्योंकि थोड़े से पैसों के लिए इतनी लंबी दूरी तय करने वाले लोग बिहार-यूपी के ही होते हैं.


सूरत और नैनीताल के हादसों में भी यही बात साबित हुए कि थोड़ी सी मजदूरी के लिए बिहार के लोग काफी असुरक्षित हालात में काम कर रहे थे. दोनों जगहों पर अगर सुरक्षा के मानक उपाय अपनाये गये होते तो इनकी मौत शायद ही होती. मगर दोनों जगह इनसे काम लेने वाले लोगों ने सोचा होगा कि जो मजदूर पैसों के लिए इतने मजबूर हैं, वे किसी हालात में काम कर लेंगे. पहले कहा जाता था कि गरीबों की जान सस्ती होती है, अब उसमें बिहारी शब्द भी जुड़ गया है.


ये अलग बात है कि राजनीतिक मसला बनने की वजह से कश्मीर में मारे गये मजदूरों के परिजनों को मुआवजा भी मिला और बाद में उन पर हमला करने वालों को मारे जाने की खबर भी आयी. मगर सूरत और नैनीताल में मरे मजदूरों के परिजनों के हाथ शायद ही कुछ आया होगा. कश्मीर की घटनाओं के बाद बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पत्रकारों से कहा, यह देश एक है. कोई भी कहीं जाकर काम करने के लिए स्वतंत्र है.


हमारी कोशिश है कि कोई मजबूरी में काम करने के लिए बाहर न जाये. इसके लिए राज्य में कई तरह के रोजगार उपलब्ध कराये गये हैं. मगर सच है और ये मामले भी बताते हैं कि बिहार के लोग महज पांच से दस हजार रुपये के लिये जान-जोखिम में डालकर कश्मीर जैसे आतंकग्रस्त इलाके में काम कर रहे थे. मतलब साफ है कि राज्य में इन लोगों के लिए पांच हजार रुपये प्रतिमाह के रोजगार का भी अवसर नहीं है. पिछले 15-16 साल से राज्य में एक ही पार्टी सत्ता में है, उसके लिए यह शर्मनाक बात है.


पिछले साल जब कोरोना फैला था तब देश के अलग-अलग इलाके से 25 से 30 लाख मजदूर बिहार लौटे थे. सरकार ने तब आकलन किया था कि इनमें से ज्यादातर मजदूर निर्माण क्षेत्र में अकुशल श्रमिक के रूप में काम करते हैं. जिनका मेहनताना बहुत कम होता है. साथ ही उनके रहने और काम करने की परिस्थितियां भी काफी असुरक्षित होती हैं. नीतीश कुमार ने कहा कि वे इन मजदूरों की सुरक्षा का इंतजाम करायेंगे, मगर सवाल यह है कि वे यह काम कैसे करेंगे?


बिहार के मजदूर सिर्फ ऐसे मामलों में ही नहीं मरते या हिंसा का शिकार होते. असम समेत पूर्वोत्तर के राज्य और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में भी वे क्षेत्रीय हिंसा का शिकार होते रहे हैं. उनके साथ अस्मितावादी संगठन मारपीट करते हैं. बहुत कम पैसों में काम करने के लिए तैयार इन मजदूरों से स्थानीय लोगों को भी परेशानी रहती है. उन्हें लगता है कि ये मजदूर आकर उनके रोजगार का संकट बढ़ा रहे हैं. बिहार के युवक कई राज्यों में सरकारी नौकरी की प्रवेश परीक्षा देने के लिए जाते रहे हैं.


वहां पर भी उन पर हमले होते हैं. बिहार में डेढ़-दो दशक पहले तक बिहारी शब्द एक गाली की तरह इस्तेमाल होता था. मगर पिछले कुछ वर्षों से लोगों ने यह समझना शुरू किया है कि ये मजदूर उनकी राज्य की अर्थव्यवस्था के लिए भी जरूरी हैं. कोरोना के बाद जब बिहार के मजदूर लौटे, तबसे लक्जरी बसों पर उन्हें फिर से मान-सम्मान के साथ काम के लिए ले जाने का सिलसिला शुरू हुआ. मगर यह सब उनकी सुरक्षा के लिए काफी नहीं है.


राज्य से बाहर इन विपरीत परिस्थितियों में जीवन गुजारने के लिए मजबूर इन बिहार वासियों का सबसे बड़ा कसूरवार तो इनकी अपनी सरकार ही है, जो इनके लिए बेहतर शिक्षा, प्रशिक्षण और अपने राज्य में रोजगार का इंतजाम नहीं कर पा रही है. इसलिए वे लाखों की संख्या में पलायन के लिए मजबूर हैं. केंद्र और दूसरे राज्यों की सरकार भी दिल से इनकी सुरक्षा और सम्मान का प्रयास नहीं करतीं. जब कोई बड़ा मुद्दा बनता है तो वे काम चलाऊ औपचारिकता निभा देती हैं.


अगर बिहार के मजदूरों को इस संकट से उबरना है तो उन्हें सबसे पहले दो काम करना होगा. पहला वे जहां हैं, वहां संगठित होकर रहना होगा. संकट में फंसे अपने साथियों की मदद करना होगा. दूसरा उन्हें मजदूरी और रहने के सुरक्षित माहौल की मांग करनी होगी, अपने रोजगार प्रदाताओं से. उन्हें अपनी सरकार पर भी दबाव बनाना होगा कि वे उनकी सुरक्षा और कौशल विकास का काम करे और उन्हें उन तमाम सरकारी योजनाओं का लाभ दे, वे जिनके पात्र हैं.


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
पुष्यमित्र

पुष्यमित्रलेखक एवं पत्रकार

स्वतंत्र पत्रकार व लेखक. विभिन्न अखबारों में 15 साल काम किया है. ‘रुकतापुर’ समेत कई किताबें लिख चुके हैं. समाज, राजनीति और संस्कृति पर पढ़ने-लिखने में रुचि.

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First published: October 21, 2021, 11:55 AM IST
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