लोजपा प्रकरण- हमारी पार्टियों के भीतर कब आयेगा लोकतंत्र?

भारत भले लोकतांत्रिक देश है, मगर यहां की पार्टियां खालिस लोकतांत्रिक तरीकों से नहीं चल सकती. पहले तो कुछ राजनीतिक दल के शीर्ष नेता इस बात को लेकर चिंतित भी रहते है, अब क्या कोई इसकी फ्रिक करने वाला बचा भी है?

Source: News18Hindi Last updated on: June 17, 2021, 1:15 PM IST
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लोजपा प्रकरण- हमारी पार्टियों के भीतर कब आयेगा लोकतंत्र?
लोजपा की तरह पहले भी कई राजनैतिक दलों में चाचा-भतीजे के बीच विवाद हो चुका है.

पार्टी मां होती है. आप मेरे चाचा थे. पिता के गुजर जाने के बाद आप ही घर (और पार्टी) के अभिभावक थे. चाचा के गुजर जाने के बाद भाई को मैंने अपनाया और सहारा दिया. मां को आपसे बहुत उम्मीदें थीं, मगर पिता के गुजर जाने के बाद आपने मुंह फेर लिया. जबकि पिता ने अपने भाईयों को अपना बना कर रखा. हमेशा सहारा दिया और आगे बढ़ाया. काश आप रिश्तों की इस कीमत को समझ पाते.“


ये पंक्तियां वैसे तो किसी पारिवारिक विवाद से जुड़ी लगती हैं. जिसमें भतीजा अपने चाचा पर बेदिली के आरोप लगाता दिख रहा है और कह रहा है कि पिता के न रहने पर आपने हमें सहारा नहीं दिया. जबकि पिता ने आपको अपने पैरों पर खड़ा किया था, आगे बढ़ाया था. अगर यह पत्र व्यक्तिगत होता तो इसमें सहज ही हम किसी परिवार के आंतरिक कलह की छवियां देख पाते. मगर दुर्भाग्यवश यह पत्र व्यक्तिगत या पारिवारिक नहीं है.


यह पत्र भारत सरकार के अंतर्गत निबंधित एक बड़े राजनीतिक दल के लेटर हेड पर लिखा गया था और लिखना वाला उस दल का सर्वेसर्वा था, उसने अपनी ही पार्टी के एक सांसद और बड़े नेता को इसी साल मार्च महीने में यह पत्र लिखा था, जिसे उसने इन दिनों जारी किया है. जब उसकी पार्टी के पांच सांसदों ने अलग गुट बना लिया है और उसे अकेला छोड़ दिया है. कहानी उस लोजपा नामक दल की है, जिसकी स्थापना स्व. रामविलास पासवान ने की थी. बिहार के दलितों को न्याय दिलाने के नाम पर.


 

इन दिनों जब लोजपा अपने इतिहास के सबसे बड़े विवाद से होकर गुजर रही है. जब पार्टी के सबसे बड़े नेता के गुजर जाने के बाद वहां दो धड़ों में पार्टी पर काबिज होने का संघर्ष चल रहा है, तो दुर्भाग्य से यह संघर्ष राजनीतिक कम और पारिवारिक अधिक लग रहा है. इस मसले को लेकर भी लोगों की प्रतिक्रिया भी कुछ ऐसी ही है. चाचा ने भतीजे को धोखा दिया टाइप.

और भी हैं चचा-भतीजा टाइप विवाद
राजनीतिक दलों में ऐसे चचा-भतीजा टाइप विवाद हाल के दिनों में कुछ और हो चुके हैं. एक तो समाजवादी पार्टी का वह विवाद है, जब चचा शिवपाल यादव ने भतीजे अखिलेश यादव के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था, दूसरा राकांपा का विवाद जब चचा शरद पंवार के खिलाफ उनके भतीजे अजित पंवार की असहमतियां सामने आयी थीं. हालांकि राजनीतिक दल के अंदरूनी विवाद कैसे पारिवारिक कलह में बदल जाते हैं, इसका सबसे बड़ा नमूना द्रमुक का विवाद रहा है, तेलुगू देशम पार्टी में भी पार्टी पर काबिज होने के लिए सास और दामाद के बीच विवाद चल चुका है.


चचा-भतीजा, भाई-बहन और सास-दामाद के विवाद अगर पारिवारिक हो तो चलता है, मगर जब वे किसी राजनीतिक दल के अंदरूनी विवाद बन जाते हैं तो बहुत अखरता है. क्योंकि राजनीतिक दल पारिवारिक नियमों और भावनाओं से नहीं चलते, नियमानुसार उनका एक संविधान होता है और उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे उस संविधान के हिसाब से चलें.

जिस तरह हम सरकारों से अपेक्षा रखते हैं कि वे लोकतांत्रिक तरीके से चलें, वैसी अपेक्षा हमें राजनीतिक दलों से भी करनी चाहिए कि वे अपनी व्यवस्था लोकतांत्रिक तरीके से संपादित करें. मगर दुर्भाग्यवश दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र कहे जाने वाले अपने देश भारत में संविधान लागू होने के सत्तर साल बाद भी राजनीतिक दलों में लोकतंत्र नहीं आया है.


आज की तारीख में भी देश में शायद ही कोई ऐसा राजनीतिक दल होगा, जो अपने अंदर की प्रक्रियाओं को संचालित करने के लिए लोकतांत्रिक विधियों का पालन करता होगा.


फैमली प्राइवेट लिमिटेड बन कर रही पार्टियां
सवाल सिर्फ लोजपा जैसी पार्टियों का नहीं है, जो सामाजिक न्याय के नाम पर बने मगर समय के साथ फैमिली प्राइवेट लिमिटेड बनकर रह गये. सवाल उन दलों का भी है, जहां आज की तारीख में कोई परिवार काबिज नहीं है, वहां भी प्रक्रियाएं किसी एक या दो व्यक्ति की मोनोपॉली के हिसाब से ही चलती है. चाहे फिर वह नीतीश कुमार की जदयू हो, मायावती की बसपा या ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस.


और खुद को कैडर बेस्ड कहने वाली राष्ट्रीय पार्टियों भाजपा, कांग्रेस और वाम दलों के भीतर कितना लोकतंत्र बचा है, इसकी असल गवाही उसके कार्यकर्ता ही दे सकते हैं. भाजपा हो या कांग्रेस, हर जगह हाईकमान की ही चलती है और कार्यकर्ताओं के लिए दरी बिछाने भर का काम तय हो चुका है. लगभग सभी दलों में ज्यादातर फैसले कोई परिवार, एक या दो व्यक्ति और उसका किचेन कैबिनेट या उस दल का परामर्शी संगठन किसी बंद कमरे में गुप्त तरीके से करता है और सभी लोगों को उस फैसले को स्वीकार करना और सहमति देना होता है.


आप याद कीजिये कि हाल के वर्षों में आपने कब किसी दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव खुली वोटिंग के आधार पर होते देखा है. हालात तो यह हैं कि इस बात को अच्छा नहीं माना जाता कि उसका अध्यक्ष सर्वसम्मति से नहीं चुना गया, इसलिए चुनाव या मनोनयन जैसे भी हुआ हो, सर्वसम्मति का नाटक पूरी इमानदारी से किया जाता है.


राष्ट्रीय अध्यक्ष को छोड़ दें, पार्टी के लोकसभा या विधानसभा चुनाव के प्रत्याशियों का चयन क्या लोकतांत्रिक प्रक्रिया से होता है, उसे टिकट बंटते हैं और उसके लिए पार्टी के शीर्ष नेताओं के दरवाजे पर चुनाव के वक्त भीड़ उमड़ती है. लोजपा नेता चिराग पासवान के जिस पत्र का जिक्र ऊपर किया गया है, उसी में उन्होंने लिखा है कि आपने विधानसभा में पांच टिकट मांगे थे, हमने पांच टिकट दे दिये. क्या यह पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र का नमूना है?


यह दरअसल इस बात का उदाहरण है कि हमारी पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र तो कभी बना नहीं, यह क्या होता है इसके बारे में बातें करने वाली पीढ़ी भी खत्म हो गयी. नयी पीढ़ी के लोग चाहे वे राष्ट्रीय अध्यक्ष ही क्यों न हो, इस बात को नहीं समझते.


आखिर में मैं उस प्रकरण को याद करना चाहूंगा जो 2011 के अन्ना आंदोलन के बाद घटा था. जब उस आंदोलन की उपज से बनी आम आदमी पार्टी ने पार्टी और प्रत्याशियों के चयन में लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को शामिल करने की कोशिश की थी. टिकट बांटने से पहले वोटरों से उसकी राय मांगी गयी थी. मगर वह प्रक्रिया भी बहुत जल्द खत्म हो गयी. पार्टी के लोगों ने मान लिया कि इसके भरोसे आगे का काम चलने वाला नहीं. अब वह भी एक या दो आदमी की पार्टी बनकर रह गयी है.


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
पुष्यमित्र

पुष्यमित्रलेखक एवं पत्रकार

स्वतंत्र पत्रकार व लेखक. विभिन्न अखबारों में 15 साल काम किया है. ‘रुकतापुर’ समेत कई किताबें लिख चुके हैं. समाज, राजनीति और संस्कृति पर पढ़ने-लिखने में रुचि.

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First published: June 17, 2021, 1:15 PM IST
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