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डबल डिजिट ग्रोथ के भरमाने वाले आंकड़ों ने बिहार का बड़ा नुकसान किया है!

पूर्व जल संसाधन मंत्री संजय कुमार झा ने अपने आलेख में बताया है कि 2011-12 से 2018-19 के बीच बिहार की औसत विकास दर 13.3 फीसदी रही, जो देश की औसत विकास दर 7.5 फीसदी से काफी अधिक थी. मगर यह लिखते वक्त उन्होंने खुद से यह सवाल नहीं किया कि लगातार आठ साल तक डबल डिजिट ग्रोथ रेट हासिल करने के बावजूद बिहार में विकास क्यों नहीं हुआ. बिहार के लोग प्रति व्यक्ति आय से लेकर मानव विकास सूचकांक तक के लगभग हर समेकित विकास के आंकड़ों में राज्यों की सूची में सबसे नीचे नजर क्यों आ रहा है. आखिर इस डबल डिजिट ग्रोथ का हासिल क्या है?

Source: News18Hindi Last updated on: December 10, 2020, 10:27 AM IST
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डबल डिजिट ग्रोथ के भरमाने वाले आंकड़ों ने बिहार का बड़ा नुकसान किया है!
(फाइल फोटो)
'खेती और आर्थिक सुधारों के जरिये बिहार ने देश और दुनिया को नयी राह दिखलायी है. विकास दर के मामले में तो बिहार ने पंजाब को काफी पीछे छोड़ दिया है. इस सच को स्वीकार करने के बदले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का अंधविरोध करने वाले कुछ लोग बिहार के भी खिलाफ हो गये हैं. राज्य की सराहनीय उपलब्धियों को स्वीकारने के बदले वे झूठ फैला रहे हैं और बिहार को बदनाम कर रहे हैं.'

इन पंक्तियों के लेखक बिहार के पूर्व जलसंसाधन मंत्री संजय कुमार झा हैं, जो वर्तमान में जदयू के महासचिव हैं. उन्होंने इस विषय पर कई आंकड़ों के साथ एक आलेख लिखा है, जो बुधवार को बिहार के एक बड़े अखबार में छपा है. लगभग ऐसी ही बातें बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने मंगलवार को बीजेपी के एक कार्यक्रम के दौरान कही- उन्होंने कहा कि बिहार की विकास दर पंजाब से दोगुनी है. उन्होंने इस उपलब्धि का श्रेय उस 2006 में बिहार सरकार द्वारा एपीएमसी एक्ट को खत्म करने के फैसले को दिया और दावा किया कि इस फैसले के बाद बिहार की विकास दर में तेजी से इजाफा हुआ है.

शायद इन दोनों नेताओं को इस बात का अहसास नहीं है कि बिहार का कोई नासमझ बच्चा भी अब उनके डबल डिजिट ग्रोथ के दावों पर भरोसा करता. यह अच्छा है कि ये दोनों नेता इस वक्त बिहार की सत्ता से दूर हैं. सच यही है कि ऐसे भरमाने वाले आंकड़ों ने ही बिहार को ठीक से विकसित होने नहीं दिया. अर्थशास्त्र के कुछ फर्जी आंकड़ों की चादर से वे लोग अब तक बिहार की लचर आर्थिक स्थिति को ढकने की कोशिश करते रहे हैं. मगर अब ऐसी बातों को कोई गंभीरता से नहीं लेता.

सच तो यह है कि वे जिस पंजाब को बिहार से ग्रोथ रेट में पिछड़ा बता रहे हैं, नेशनल सैंपल सर्वे के आंकड़ों के मुताबिक वहां के किसानों की मासिक आय 16020 रुपये हैं, जबकि बिहार के किसानों की मासिक आमदनी सिर्फ 3558 रुपये. यानी हमारे किसानों की आय पंजाब के किसानों के मुकाबले एक चौथाई से भी कम है. अगर एपीएमसी एक्ट खत्म कर देने से बिहार के किसानों की आय बढ़ी है तो वह आंकड़ों में क्यों नजर नहीं आ रहा? उस पंजाब के मुकाबले जहां एपीएमसी एक्ट सबसे बेहतर तरीके से लागू है. अगर एपीएमसी एक्ट की वजह से किसान दलालों के चंगुल में फंसा है और उसकी आय प्रभावित हो रही है तो पंजाब के किसानों को तो कंगाल हो जाना चाहिए था, जहां का लगभग सारा अनाज सरकारी मंडी में एमएसपी पर बिकता है. मगर उस पंजाब का किसान अभी भी आमदनी के मामले में देश में पहले नंबर पर है.
यह वही पंजाब का किसान है, जो बिहार के हजारों खेतिहर मजदूरों को लगभग पूरे साल मजदूरी उपलब्ध कराता है. उत्तर बिहार के कई जिलों से बड़ी संख्या में मजदूर धान की बुआई और कटनी, गेहूं की बुआई औऱ कटनी के मौसम में पंजाब और हरियाणा का रुख करते हैं. यहां से कई ट्रेनें सीधे पंजाब जाती हैं और वह इन मौसमों में भरी रहती हैं. ये मजदूर अपने इलाके की खेती को छोड़कर पंजाब जाना पसंद करते हैं, क्योंकि वहां अच्छी मजदूरी मिलती है. यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि वहां के किसान बिहार के किसानों के मुकाबले काफी संपन्न हैं. मगर बिहार की सरकार या तो यह सब देखना-समझना पसंद नहीं करती या इस तथ्य को इग्नोर कर झूठे आंकड़ों से अपने लोगों को भरमाने की कोशिश करती है.


पिछले कुछ सालों से बिहार की सरकार ने यही किया है, उन्होंने बाढ़, पलायन, बेरोजगारी जैसे गंभीर सवालों को इन झूठे और भरमाने वाले आंकड़ों से ढकने और लोगों को बहलाने की कोशिश की है. कई सालों से सरकार यह दावा कर रही है कि बिहार देश में सबसे तेज गति से विकास कर रहा है. पूर्व जल संसाधन मंत्री संजय कुमार झा ने भी अपने आलेख में बताया है कि 2011-12 से 2018-19 के बीच बिहार की औसत विकास दर 13.3 फीसदी रही, जो देश की औसत विकास दर 7.5 फीसदी से काफी अधिक थी. मगर यह लिखते वक्त उन्होंने खुद से यह सवाल नहीं किया कि लगातार आठ साल तक डबल डिजिट ग्रोथ रेट हासिल करने के बावजूद बिहार में विकास क्यों नहीं हुआ. बिहार के लोग प्रति व्यक्ति आय से लेकर मानव विकास सूचकांक तक के लगभग हर समेकित विकास के आंकड़ों में राज्यों की सूची में सबसे नीचे नजर क्यों आ रहा है. आखिर इस डबल डिजिट ग्रोथ का हासिल क्या है?

संजय कुमार झा लिखते हैं कि बिहार को देश का ग्रोथ इंजन कहा जाने लगा है, मगर यह ग्रोथ इंजन अभी भी ट्रेन के सबसे पीछे लगा हुआ है, गार्ड की बोगी के भी पीछे. यह कैसे ग्रोथ इंजन है? जिस पंजाब के ग्रोथ रेट को बिहार के आधे से भी कम बताया जा रहा है, 2018-19 में वहां का पर कैपिटा जीडीपी 1,70,431 रुपये है, जबकि बिहार का पर कैपिटा जीडीपी सिर्फ 47,541 रुपये है, देश में सबसे कम. पर कैपिटा जीडीपी के मामले में देश का औसत भी 1,42,719 रुपये है. बिहार इसका भी लगभग एक तिहाई है. ये आंकड़े जाहिर करते हैं कि बिहार के डबल डिजिट ग्रोथ के आंकड़े झांसेबाजी के सिवा कुछ भी नहीं हैं.
अगर आंकड़ों को छोड़ भी दिया जाये तो बिहार से दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, गुजरात और महाराष्ट्र जाने वाली ट्रेनों में पलायन करने वाले मजदूरों की भारी भीड़ यह जाहिर करती है कि बिहार को अभी विकास के मामले में काफी काम करने की जरूरत है. अभी बिहार अपने लोगों को 5000-10 हजार रुपये मासिक नौकरी देने लायक राज्य भी नहीं बन पाया है. कोरोना काल में लॉक डाउन के वक्त देश के हर कोने से लौटने वाली बिहारी मजदूरों की भीड़ ने भी इसी सच्चाई को उजागर किया था.

अगर इसके बावजूद अगर बिहार सरकार नहीं चेत रही, सत्ताधारी दलों के नेता अभी भी झूठे आंकड़ों की कालीन के नीचे राज्य की असली समस्याओं को छिपाने की जालसाजी कर रहे हैं तो जाहिर है कि इनकी मंशा बिहार की स्थिति में बदलाव लाने की नहीं है. ऐसे ही लोगों ने झूठे आंकड़े और झूठी जानकारियां देकर अब तक बिहार के सीएम नीतीश कुमार को भी भरमाये रखा और बिहार की जनता को भी. अगर सरकार सचमुच बिहार को विकास के पायदान पर दूसरे राज्यों के मुकाबले बेहतर स्थिति में लाना चाहती है. अगर वह राज्य को देश के औसत के करीब भी रखना चाहती है तो उसे ऐसे भरमाने वाले आंकड़ों के जाल से बचना होगा. वरना राज्य हमेशा सबसे पीछे रहेगा और इसे देश पर बोझ ही माना जाता रहेगा.
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First published: December 10, 2020, 10:12 AM IST
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