'डीजे वाले बाबू जरा कोरोना भगा दे'

तमाम खबरें और सूचनाएं बार-बार यह बता रही हैं कि किसी भी व्यक्ति का कोरोना पॉजिटिव पाये जाने का यह अर्थ नहीं है कि सबकुछ खत्म हो चुका है. भारत में इस वक्त डेढ़ लाख से अधिक कोरोना संक्रमित मरीज हैं, इनमें से सिर्फ 4337 मरीजों की ही मौत हुई है.

Source: News18Hindi Last updated on: May 27, 2020, 5:45 PM IST
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'डीजे वाले बाबू जरा कोरोना भगा दे'
दुनिया में कोरोना संक्रमितों की संख्या 60 लाख के आंकड़े को पार कर चुकी है.
“मौत तो एक पल है बाबू मोशाय, आने वाले छह महीने में जो लाखों पल जीने वाला हूं, उसका क्या होगा...” आनंद फिल्म का यह मशहूर डायलॉग पिछले 50 साल से बीमार लोगों में जीने की उम्मीद जगाता रहा है और जब तक जिंदा हैं, तब तक खुश रहने के लिए प्रेरित करता रहा है. अगर आप डीजे की धुन पर बिहार के वैशाली जिले के इस कोरोना आइसोलेशन वार्ड (Corona Isolation Ward) में मरीजों को नाचते-गाते देखेंगे तो आपको आनंद फिल्म के उस किरदार की याद आयेगी जो कहा करता है, अगर जिंदा रहना जरूरी है तो आदमी को वहीं रहना चाहिए जहां वह हंस कर जिंदा रहे.

अगर आप कोरोना की वजह से खौफजदा हैं. आपके मन में हर वक्त यह भय रहता है कि कहीं मुझे कोरोना तो नहीं हो जायेगा, आप अक्सर यह सोचते हैं कि अगर मुझे कोरोना हो गया तो मैं क्या करूंगा, मेरा परिवार कैसे संभलेगा. मुझे किन किन मुसीबतों का सामना करना होगा. अगर आप पिछले दो-तीन महीनों से इस डिप्रेसिव ख्याल की गिरफ्त में हैं, तो यह वीडियो जरूर देखिये. मैं खास तौर पर यह वीडियो आपको सजेस्ट कर रहा हूं.आपने दूसरे मुल्कों के इस तरह के वीडियो जरूर देखे होंगे, मगर यह वीडिया खास आपके इलाके का है, इसमें शामिल लोग बिल्कुल हम जैसे हैं. जो कोरोना के खौफ को मात दे रहे हैं.

जरा देखिये कि कैसे एक बड़े से कमरे में कोरोना के 25 मरीज अपने अपने बिस्तरों पर बैठ कर ताली बजा रहे हैं और डीजे की धुन पर एक व्यक्ति नाच रहा है. गाना बज रहा है, सबसे आगे होंगे हिंदुस्तानी. क्या मस्ती है, क्या शोर है. न रोग का खौफ है, न मौत की कोई छाया. सिर्फ मस्ती है, जो न सिर्फ उनकी बल्कि हम सबों की जीने की उम्मीद बढ़ाती है.
यह जो डांस आप देख रहे हैं, वह किसी सरकारी योजना का हिस्सा नहीं है. इन मरीजों ने खुद आग्रह करके उस आइसोलेशन सेंटर के संचालकों से डीजे सिस्टम मंगवाया है, ताकि झूमें, नाचें गायें और कोरोना के नाम पर मन में घुसपैठ करने वाले भय को दूर रखें. क्योंकि वे जानते हैं कि कई दफा लोग मौत से पहले मौत के भय से, जीवन के असंभव होने की आशंका से मर जाते हैं.

पिछले हफ्ते इसी हाजीपुर शहर में एक 30 साल के प्रवासी मजदूर ने इस आशंका से खुदकुशी कर ली कि उसे अगर कोरोना हो गया तो उसका क्या होगा. क्वारंटाइन सेंटर में रह रहे उस मजदूर को इस बात का पक्का भरोसा नहीं था कि उसे कोरोना है ही. हालांकि उसकी मौत के बाद उसका टेस्ट हुआ और वह कोरोना पॉजिटिव पाया गया. मगर मौत से पहले उसे मालूम नहीं था कि वह कोरोना का मरीज है. वह सिर्फ आशंकित था, उसमें कोरोना संक्रमित होकर जीने की हिम्मत नहीं थी, इस बीमारी को झेल पाने की हिम्मत नहीं थी, इसलिए उसने मौत का विकल्प चुन लिया.

जबकि तमाम खबरें और सूचनाएं बार-बार यह बता रही हैं कि किसी भी व्यक्ति का कोरोना पॉजिटिव पाये जाने का यह अर्थ नहीं है कि सबकुछ खत्म हो चुका है. भारत में इस वक्त डेढ़ लाख से अधिक कोरोना संक्रमित मरीज हैं, इनमें से सिर्फ 4337 मरीजों की ही मौत हुई है. यानी कि हर सौ में से 2.8 मरीज की ही मौत हो रही है, शेष मरीज स्वस्थ हो रहे हैं. देश में साठ हजार से अधिक मरीज स्वस्थ हो चुके हैं.
अगर बिहार के ही आंकड़े देखे जायें तो यहां अब तक 2968 मरीज मिले हैं, जिनमें मरने वालों की संख्या सिर्फ 14 है. अब तक 800 मरीजों ने कोरोना का मात दे दी है. एक आंकड़ा यह भी है कि कोरोना संक्रमित लोगों में से 80 फीसदी से अधिक बिना लक्षण वाले हैं, इसका मतलब यह है कि उन्हें कोई परेशानी नहीं है और वे छोटी-मोटी दवाओं से ही स्वस्थ हो जा रहे हैं.


बिहार में कोरोना संक्रमण से मरने वाले ज्यादातर लोग ऐसे हैं जिन्हें पहले से ही कैंसर, टीवी, किडनी या लीवर के संक्रमण जैसी कोई गंभीर बीमारी है. ये मरीज कोरोना का संक्रमण झेल नहीं पाते. मगर जो लोग अमूमन स्वस्थ हैं, अब तक के उदाहरण बताते हैं कि उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कोरोना का आसानी से मुकाबला कर सकती है. ये तमाम उदाहरण बताते हैं कि कोरोना से बचना तो जरूरी है, मगर कोरोना की वजह से खौफजदा होना बहुत जरूरी नहीं.

मगर दुखद तथ्य यह है कि आज लोग कोरोना रोग से उतने परेशान नहीं हैं, जितने कोरोना होने की आशंका से. ज्यादातर लोग कोरोना को एक जानलेवा रोग की तरह देख रहे हैं. वे पहले से सतर्क हैं, भयभीत हैं, आशंकित हैं. ऐसे में अगर खुदा न खास्ता किसी वजह से कोरोना उनके दरवाजे पर दस्तक दे देता है, तो वे उसका सामना करने लायक नहीं रहते. उनके टूटने, घबरा जाने की काफी संभावना रहती है.

ऐसे उदाहरण लगातार देश भर से सामने आ रहे हैं. उन्हें समझ में नहीं आता कि अगर उन्हें या उनके परिवार के किसी व्यक्ति को कोरोना हो जाये तो उनके साथ क्या होगा. सरकार के लोग उन्हें कहां ले जायेंगे, कैसे रखेंगे.जहां उन्हें रखा जायेगा, वहां कैसी सुविधा होगी. उनका ठीक से इलाज होगा या नहीं. वे बच कर वापस लौट पायेंगे या नहीं.

लोगों के इस भय को बढ़ाने में कोरोना को लेकर बरती जा रही गुप्त प्रक्रियाओं का भी बड़ा हाथ है. हममें से बहुत कम लोगों को मालूम है कि कोरोना मरीजों के साथ अस्पतालों में क्या किया जा रहा है, वहां की व्यवस्थाएं कैसी हैं. वहां लोगों का दिन कैसे कटता है, किस तरह इलाज हो रहा है. वेंटीलेटर की कमी के आंकड़ों के साथ, हमें यह भी तो बताया जाना चाहिए कि वाकई अब तक कितने लोगों को वेंटीलेटर की जरूरत पड़ी है. कितने मरीज ऐसे हैं, जिन्हें इंजेक्शन तक नहीं लगा. कभी आईसीयू में भी नहीं भेजा गया. कितने ऐसे मरीज हैं, जिनमें कोरोना वायरस उनकी छाती तक भी नहीं पहुंच पाया.

हम सब यही मानकर चलते हैं कि कोरोना वायरस अगर शरीर में आ गया तो वह हमारे फेफड़े को संक्रमित करना शुरू कर देगा और एक दिन हमें वेंटीलेटर पर लिटा दिया जायेगा, फिर राम नाम सत्य हो जायेगा. इस भयभीत करने वाली सूचनाओं ने वेंटीलेटर का कारोबार तो बढ़ा दिया है, मगर हमारे मन को इसने कमजोर कर दिया है.


अगर हमें कोरोना का सामना ठीक से करना है, तो शरीर के बचाव और उपचार के साथ-साथ मन के बचाव और उपचार पर भी उतना ही ध्यान देने की जरूरत है. अस्पतालों में उन्हें सिर्फ दवाओं की जरूरत नहीं, आनंदित रहने की भी उतनी ही जरूरत है. यही संदेश हाजीपुर का यह वीडियो दे रहा है. इस मॉडल को हर जगह उन मरीजों के बीच लागू करने की जरूरत है, जो बगैर लक्षण वाले मरीज हैं और सामान्य और न के बराबर उपचार से स्वस्थ होने का इंतजार कर रहे हैं.

(नोटः यह लेखक के निजी विचार हैं)

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First published: May 27, 2020, 5:35 PM IST
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