बिहार में ‘लव-कुश’ का साथ आना और ‘राम राज’ का सपना

Bihar Politics: बिहार में लव-कुश की जोड़ी के साथ आने का जदयू को क्या लाभ होगा? क्या उपेंद्र कुशवाहा जदयू को राजनीतिक रूप से मजबूत विकल्प बना पायेंगे, जिससे कि पार्टी लंबे समय तक भाजपा सत्ता में नंबर दो की भूमिका में रहने के लिए मजबूर कर सके?

Source: News18 Bihar Last updated on: March 16, 2021, 10:50 AM IST
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बिहार में ‘लव-कुश’ का साथ आना और ‘राम राज’ का सपना
रालोसपा के उपेंद्र कुशवाहा दूसरी बार नीतीश कुमार के साथ आए हैं. इससे पहले 2009 में उन्होंने अपनी पार्टी का जेडीयू में विलय कराया था.
धार्मिक और सांस्कृतिक नजरिये से देखें तो बिहार का मिथिला कई मायनों में देश से अलग है. सीता की जन्मभूमि माने जाने वाले इस क्षेत्र में राम की पूजा अमूमन बहुत उत्साह से नहीं होती, क्योंकि यहां के लोग यह मानते हैं कि राम से ब्याह कर यहां की बेटी सीता को दुख के सिवा कुछ नहीं मिला. वे राम के साथ तो वनवास गयी हीं, खुद राम की वजह से भी जीवन के आखिर में उन्हें तब वनवास भोगना पड़ा, जब राम अयोध्या का राज्य संभाल रहे थे. तो राम को लेकर यहां के लोगों के मन में कई शिकायतें रहती हैं.

इसके उलट इस इलाके में सीता और राम के पुत्र लव-कुश को लेकर बड़ा स्नेह है. लवहरि-कुशहरि नाम की एक लोकगाथा है, जो यहां काफी प्रचलित है. जाहिर सी बात है कि इस लोकगाथा में लव और कुश द्वारा अश्वमेघ के घोड़े को रोकने, अयोध्या की सेना को पराजित करने और अपनी मां सीता के साथ हुए अन्याय का बदला लेने के वर्णन है. जो कथा उत्तर रामायण में भी है और हम सब जानते हैं.

दो प्रभावशाली जातियों का समीकरण


इन दिनों एक बार फिर से बिहार में ‘लव-कुश’ शब्द की बड़ी चर्चा है. मगर इस चर्चा का केंद्र मिथिला की संस्कृति और वहां का समाज नहीं, बिहार की राजधानी पटना है और इस राज्य की राजनीति है. इस चर्चा में 'लव' खुद बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हैं और 'कुश' बिहार के एक बड़े राजनेता उपेंद्र सिंह कुशवाहा. हालांकि ये दोनों खुद लव और कुश नहीं हैं, ये बिहार की उन दो बड़ी पिछड़ी जातियों के प्रतिनिधि हैं, जिन कृषक जातियों को लव और कुश का नाम दिया गया है. ये जातियां हैं कुर्मी और कोइरी. बिहार की पिछड़ी जातियों में से ये दो जातियां आर्थिक, शैक्षणिक और राजनीतिक रूप से काफी प्रभावशाली हैं.
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1930 के दशक में इन दोनों जातियों ने एक अन्य प्रभावशाली जाति यादवों के साथ मिलकर बिहार में त्रिवेणी संघ की स्थापना की थी. तब से ये जातियां बिहार की राजनीति में लगातार मजबूत होती गयीं. लंबे समय तक इन जातियों ने बिहार में सोशलिस्ट और कम्यूनिस्ट विचारधारा को मजबूत किया और उन्हें अपना पैठ बनाने में मददगार साबित हुईं. और फिर पहले लालू यादव के सहारे यादव राज्य की सत्ता पर काबिज हुए और नीतीश कुमार के सत्तासीन होने के बाद ये लव-कुश जातियां सत्ता के केंद्र में पहुंचीं.

जब नीतीश सत्ता में आए तो उपेंद्र कुशवाहा उनके साथ थे. वे 1994 से ही नीतीश के साथ रहे हैं और कोइरी जाति के बड़े नेता के रूप में नीतीश ने उन्हें हमेशा महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दीं. मगर 2007 में उन्हें जदयू से हटा दिया गया. उन्होंने अपनी पार्टी बनाई और उसका नाम राष्ट्रीय समता पार्टी रखा. मगर कुछ ही महीने बाद नवंबर, 2009 में उनकी पार्टी जदयू में मिल गई. उनका नीतीश के साथ मेल और अलग होने का रिश्ता आगे भी चलता रहा. जनवरी, 2013 में एक बार फिर उन्होंने जदयू को छोड़ दिया और राष्ट्रीय लोक समता पार्टी का गठन किया. इस बार वह पार्टी लंबे समय तक चली. मगर अमूमन वे नीतीश के खिलाफ ही रहे. अब आठ साल पुरानी उनकी पार्टी एक बार फिर से जदयू में शामिल हो गयी है.
मगर सवाल यह है कि लव और कुश के नाम से मशहूर इन दोनों पावरफुल राजनीतिक जातियों के बिहार में साथ आने का मैसेज क्या है, खास तौर पर बिहार की सत्ता में शामिल उस राष्ट्रीय दल भाजपा के लिए जो राम के नाम की राजनीति करती रही है.

बीजेपी के सामने नहीं डाले हथियार


हालांकि तकनीकी तौर पर बिहार में भाजपा और जदयू का गठबंधन है और दोनों मिलकर सरकार चला रहे हैं. इस चुनाव में भाजपा को काफी अधिक सीटें मिलने के बावजूद सत्ता की कमान जदयू के नेता नीतीश कुमार के हाथों है. मंत्रिमंडल में भी जदयू की स्थिति मजबूत ही है. मगर हाल के कुछ वर्षों में जिस तरह भाजपा ने लगातार जदयू को कमजोर करने की कोशिश की है और नीतीश कुमार भाजपा की शर्तों को एक-एक कर मानते चले गये हैं, उससे यह लगने लगा था कि देर-सवेर जदयू का भाजपा में विलय हो जाना है और बिहार में भाजपा का अकेले सरकार बनाने का बहुत पुराना सपना पूरा हो जायेगा.

मगर नीतीश कुमार ने जिस करीने से रालोसपा का अपनी पार्टी में विलय करा लिया और आते ही उपेंद्र कुशवाहा को संसदीय बोर्ड का अध्यक्ष पद जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दे दी, वह यह संकेत जरूर देता है कि नीतीश अपनी हार नहीं मानने वाले हैं. भाजपा की बढ़ती पकड़ के बीच वह अपने तरीके से अपनी पार्टी को मजबूत बनाने की कोशिश कर रहे हैं. उन्होंने अभी हथियार नहीं डाले हैं. खास तौर पर रालोसपा के जदयू में विलय के दिन जदयू कार्यकर्ताओं ने जो नारेबाजी की वह भी गौरतलब है.

दिलचस्प है कि जब यह राजनीतिक घटना घट रही थी, तब जदयू कार्यकर्ता नारे लगा रहे थे, देश का पीएम कैसा हो, नीतीश कुमार जैसा हो. ऐसे नारे जदयू में 2014-15 के दौर में लगते थे, जब नीतीश कुमार राजनीतिक रूप से काफी मजबूत थे और उन्होंने देश के पीएम पद का दावेदार और नरेंद्र मोदी का प्रतिद्वंद्वी माना जाता था. जब उन्होंने बिहार में लालू यादव के साथ मिलकर असल लव कुश की जोड़ी तैयार की थी और 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा के मोदी और शाह की जोड़ी को मात दी थी और उनका बिहार में अकेले सरकार बनाने का सपना ध्वस्त कर दिया था.


मगर फिर उन्हें भाजपा की शरण में आना पड़ा और अब भाजपा लगातार उनके भीतर ही भीतर कमजोर करने में जुटी है. जिसका नतीजा हमने 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में देखा, जब नीतीश की सीटें काफी घट गयीं और भाजपा बड़े भाई की भूमिका में आ गयी. तब से ऐसा माना जा रहा था कि अब नीतीश के दिन गिने-चुने ही रह गये हैं. लोग जदयू के भाजपा में विलय की तारीख का अनुमान लगा रहे थे, मगर इस बीच जदयू ने उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी का खुद में विलय करवा कर लिया और यह संदेश दिया है कि उनकी पार्टी इतनी आसानी से खत्म नहीं होगा.

लव-कुश के साथ से जेडीयू को कितना लाभ
मगर सवाल यह है कि बिहार में लव-कुश की जोड़ी के साथ आने का जदयू को क्या लाभ होगा? क्या उपेंद्र कुशवाहा जदयू को राजनीतिक रूप से मजबूत विकल्प बना पायेंगे, जिससे कि पार्टी लंबे समय तक भाजपा सत्ता में नंबर दो की भूमिका में रहने के लिए मजबूर कर सके? अगर वे इतना भी कर सके तो यह बड़ी बात होगी, क्योंकि जदयू अपने सबसे सुनहरे दौर में भी अकेले बिहार पर राज करने का सपना नहीं देख पायी है. पार्टी की सफलता ही इस बात में है कि वह राजद औऱ भाजपा जैसी दो मजबूत कैडरबेस पार्टियों के बीच इस तरह डट कर खड़ी हो कि दोनों उसे अपने साथ रखने और सत्ता की कमान देने के लिए मजबूर हो. अगर कोई एक आंखें दिखाये तो जदयू दूसरे को अपने साथ मिला ले. यही बारगेनिंग पावर नीतीश और जदयू की असली ताकत है. इसी वजह से वे 2005 से ही बिहार की सत्ता में बने हैं. मगर 2017 के बाद, जब से जदयू को भाजपा के साथ आने के लिए मजबूर होना पड़ा, उनका यह बारगेनिंग पावर लगातार कमजोर हो रहा है.

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इसकी वजह शरद यादव जैसे किसी मजबूत राजनीति नेता का पार्टी में न होना माना जा रहा है. जब से शरद ने जदयू को छोड़ा है, पार्टी लगातार कमजोर हुई है. क्या उपेंद्र कुशवाहा उस खाली जगह को भर पायेंगे और जदयू को फिर से 2005 से 2010 के बीच के दौर की मजबूत पार्टी बनाने में सफल हो पायेंगे, यह देखने वाली बात होगी. देखने वाली बात तो यह भी होगी कि राम नाम की राजनीति करने वाली भाजपा, बिहार में लव-कुश के एक होने की घटना पर किस तरह की राजनीतिक प्रतिक्रिया देती है. (डिस्क्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं.)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
पुष्यमित्र

पुष्यमित्रलेखक एवं पत्रकार

स्वतंत्र पत्रकार व लेखक. विभिन्न अखबारों में 15 साल काम किया है. ‘रुकतापुर’ समेत कई किताबें लिख चुके हैं. समाज, राजनीति और संस्कृति पर पढ़ने-लिखने में रुचि.

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First published: March 16, 2021, 10:50 AM IST
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