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चांद पर नहीं, बिहार में नौकरी चाहिए

राज्य सरकार अपने लोगों को अपने राज्य में नौकरी देने में विफल रहती है, इसलिए बिहारियों को नौकरी और रोजगार के लिए बाहर जाना पड़ता है. यह कोई तारीफ की बात नहीं, हमारे लिए शर्मिंदगी की बात है.

Source: News18India Last updated on: March 3, 2020, 6:38 PM IST
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चांद पर नहीं, बिहार में नौकरी चाहिए
कर्मचारी चयन बोर्ड ने एक हजार से ज्यादा पदों के लिए आवेदन मांगे हैं.
बीते हफ्ते प्रवासी बिहारियों के एक कार्यक्रम में बिहार के उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने अपने संबोधन में कह दिया कि चांद पर नौकरी निकले तो बिहारी वहां भी सबसे पहले जाएंगे. ऐसा उन्होंने बिहारियों की प्रतिभा की तारीफ करते हुए कहा था, मगर सोशल मीडिया में उनकी इस टिप्पणी पर काफी विवाद हुआ. खासकर बिहार के लोगों ने उन्हें उनके इस बयान के लिए आड़े हाथ लिया और कहा कि राज्य सरकार अपने लोगों को अपने राज्य में नौकरी देने में विफल रहती है, इसलिए बिहारियों को नौकरी और रोजगार के लिए बाहर जाना पड़ता है. यह कोई तारीफ की बात नहीं, हमारे लिए शर्मिंदगी की बात है. हमें चांद पर नहीं, बिहार में नौकरी चाहिए.

दरअसल, ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि पिछले कुछ दिनों से बिहार की सरकार यहां के लोगों द्वारा नौकरी और रोजगार के लिए किए जाने वाले पलायन को उचित ठहराने की कोशिश में है. इसी समारोह में सुशील मोदी ने अपने संबोधन में कहा था, यहां के लोगों के बाहर जाने का यह मतलब नहीं है कि हमारा राज्य पिछड़ा हुआ है. गुजरात और पंजाब जैसे राज्यों से भी लोग बाहर जाते हैं. आज के जमाने में पलायन को बुरा नहीं माना जाता. इससे पहले हाल ही में बिहार विधानमंडल में एक सवाल के जवाब में राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी पलायन को उचित ठहराया था. उन्होंने कहा था कि बिहारी अपने हुनर की वजह से बाहर रोजगार पाते हैं, यह शर्म नहीं गर्व का विषय है.

मगर खुद बिहार के वे लोग जो रोजी-रोजगार के लिए दूसरे राज्यों में रह रहे हैं, बिहार सरकार के पलायन के मसले पर लिए गए इस स्टैंड से बहुत सहमत नहीं हैं. सुशील मोदी के बयान पर सोशल मीडिया में आपत्ति करने वालों में सबसे बड़ी संख्या उन्हीं बिहारियों की है, जो बाहर रह कर नौकरी या रोजगार करते हैं. उनका मानना है कि अगर बिहार में रोजगार की बेहतर संभावना होती और उन्हें उनके हुनर या विशेषज्ञता की वजह से दूसरे राज्यों में आमंत्रित किया जाता तो निश्चित तौर पर गर्व की बात होती. मगर चूंकि हमारे पास अपने राज्य में नौकरी या रोजगार करने का कोई ऑप्शन ही नहीं है, ऐसे में पलायन करना हमारे लिए चॉइस नहीं, लाचारी है. और जब कोई व्यक्ति लाचारी में पलायन करता है तो उसे जहां वह रह रहा है, वहां उचित सम्मान नहीं मिलता. ऐसे में वह पलायन उसके लिए गर्व नहीं शर्म का ही विषय हो सकता है.

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डिप्टी सीएम सुशील कुमार मोदी. (फाइल फोटो)
बिहार सरकार के इन दोनों शीर्ष व्यक्तियों का यह बयान राज्य में पलायन और बेरोजगारी की भीषण होती समस्या से मुंह मोड़ने जैसा प्रतीत होता है. इसी वर्ष फरवरी माह में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पॉपुलेशन साइंस, मुंबई ने बिहार और उत्तर प्रदेश में पलायन की समस्या पर शोध किया था. उस शोध के मुताबिक राज्य के कुल परिवारों में से आधे परिवारों का कोई न कोई सदस्य रोजी-रोटी के लिए राज्य से बाहर पलायन करता है. इस अध्ययन के मुताबिक बिहार से पलायन करने वाले लोगों में से 80 फीसदी लोग या तो भूमिहीन होते हैं या उनके पास एक एकड़ से कम जमीन होती है. 85 फीसदी लोगों ने 10वीं तक की पढ़ाई भी नहीं की होती है. 90 फीसदी लोगों को अकुशल मजदूर का काम मिलता है. इन लोगों की पलायन करने से सालाना औसत आमदनी 26020 रुपए की ही होती है. यानी दो हजार रुपए प्रति माह से कुछ अधिक. ये आंकड़े इस बात की तस्दीक करते हैं कि बिहार में लोग किन परिस्थितियों में पलायन करते हैं. ऐसे में बिहार के मुख्यमंत्री का वह दावा कि बिहार के लोगों को उनके हुनर की वजह से दूसरे राज्यों में रोजगार मिलता है, झूठा साबित हो जाता है.

ये आंकड़े इस बात की भी तस्दीक करते हैं कि बिहार में लोगों के पास दो-ढाई हजार रुपए प्रति माह कमाने लायक अवसर की भी भारी कमी है. तभी वे इतनी आमदनी के लिए भी पलायन कर जाते हैं. दरअसल, बिहार के सीवान और गोपालगंज जिले से कुछ वेल्डर और फिटर लोगों के गल्फ कंट्रीज में रोजगार के लिए जाने को भी पलायन की असली तसवीर मान ली जाती है. जबकि उत्तर बिहार के बाढ़ प्रभावित इलाकों में पिछले चार-पांच दशकों में पंजाब और हरियाणा के इलाके में खेतिहर मजदूरी के लिए जाने वाले लोगों की संख्या बहुत बड़ी है. बिहार से रोजगार के लिए पलायन करने वाले लोगों में इनकी संख्या सर्वाधिक है. राज्य पलायन करने वालों में सिर्फ तीन फीसदी लोग ही देश से बाहर जाते हैं. शेष देश के दूसरे इलाकों में भी जाते हैं. आंकड़े यह भी बताते हैं कि भूमिहीनता और खेती के लायक कम जमीन होना भी रोजी-रोटी के लिए पलायन करने की एक बड़ी वजह है.

दरअसल सच यही है कि बिहार में नीतीश कुमार और सुशील कुमार मोदी की जोड़ी के लगभग 15 साल राज करने के बावजूद रोजगार की संभावनाओं का समुचित विकास नहीं हुआ है. बिहार सरकार द्वारा इस वर्ष जारी किए गए आर्थिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट भी इस तरफ इशारा करती है. इस रिपोर्ट के मुताबिक राज्य में नियमित रोजगार पाने वाले लोगों की संख्या रोजगार पाने वालों की कुल संख्या का सिर्फ 11.9 फीसदी है. अनियमित रोजगार पाने वाले श्रमिकों की संख्या, यानी जिन्हें कभी रोजगार मिलता है, कभी नहीं, 32.1 फीसदी है, जो राष्ट्रीय औसत 24.3 फीसदी से काफी अधिक है. इन आंकड़ों में 45 फीसदी लोगों की जीविका का आधार खेती बताया गया है. बिहार में ज्यादातर किसान के पास बहुत कम कृषि योग्य भूमि है, ऐसे में खेती पर आश्रित लोगों के रोजगार की स्थिति जगजाहिर है.
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मुख्यमंत्री नीतीश कुमार. (फाइल फोटो)


बिहार में उद्योग-धंधों की स्थिति भी कमोबेश वैसी ही है. आर्थिक सर्वेक्षण 2019-20 के आंकड़ों के मुताबिक राज्य में संचालित होने वाले कुल उद्योगों की संख्या सिर्फ 2908 है, ये सभी कारखाने मिल कर राज्य के एक लाख से कुछ अधिक लोगों को ही रोजगार दे पाते हैं. वह भी सिर्फ औसतन दस हजार रुपए मासिक वेतन के रोजगार. ये कारखाने भी मझोले और निम्न श्रेणी के हैं, इनकी औसत पूंजी छह करोड़ के लगभग है और इनमें बड़ी संख्या कृषि आधारित उद्योग की है. जाहिर है, इन परिस्थितियों में बिहार के लोगों को बिहार में ही रोजगार मिलना बहुत मुश्किल काम है, इन्हीं वजहों से ज्यादातर बिहार के लोग नौकरी और रोजगार के लिए पलायन करते हैं. जैसा कि पहले के आंकड़ों से भी जाहिर है कि रोजगार और नौकरी के लिए पलायन करने वाले ज्यादातर लोग कम पढ़े लिखे और अप्रशिक्षित हैं, इसलिए उन्हें बाहर कोई ढंग का रोजगार भी नहीं मिलता. बहुत कम मेहनताने पर ज्यादातर लोग अकुशल मजदूर के रूप में काम करते हैं. इसलिए ऐसा कहना लोगों को हास्यास्पद लगता है कि बिहार के लोग अपने हुनर की वजह से देश भर में नौकरी और रोजगार के लिए जाते हैं. सच्चाई यही है कि यहां के लोगों की पहचान सस्ते और अकुशल मजदूर के रूप में है.

चूंकि राज्य के युवाओं और मजदूरों के प्रशिक्षण की भी कोई बेहतर व्यवस्था राज्य में नहीं है. इसलिए यह स्थिति स्वाभाविक है. लेकिन दुखद स्थिति यह है कि राज्य में प्रशिक्षित और शिक्षित युवाओं के लिए भी कोई बेहतर रोजगार उपलब्ध नहीं है. अभी पिछले ही साल राज्य के प्लस टू स्कूलों में अतिथि शिक्षकों के लिए बहुत कम मानदेय वाली बहाली निकली थी, जिसमें आवेदन करने वालों में सबसे बड़ी संख्या बीटेक पास युवाओं की थी. पिछले दिनों बिहार विधान सभा के चतुर्थ श्रेणी के पदों के लिए निकली कुछ सौ सीटों की नियुक्ति में भी हजारों बीटेक डिग्रीधारियों ने आवेदन किया. मतलब यह कि पलायन के बावजूद इन युवाओं के पास शिक्षा के अनुरूप बेहतर रोजगार की स्थिति नहीं है. ऐसे में लोगों का बिहार के डिप्टी सीएम सुशील कुमार मोदी के इस बयान पर भड़कना स्वाभाविक है कि बिहार के युवा चांद पर भी नौकरी हासिल कर सकते हैं. इन युवाओं की नाराजगी राज्य सरकार से यही अनुरोध करती है कि कृपया हमारे लिए अपने राज्य बिहार में ही नौकरी की व्यवस्था कराएं. हम नौकरी के लिए चांद और सूरज पर भटकना नहीं चाहते.

डिस्क्लेमरः लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं.

 

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First published: March 3, 2020, 6:38 PM IST
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