बेकदरी ऐसी कि हर साल बाढ़ में डूब जाती हैं बिहार की ऐतिहासिक धरोहरें

इन दिनों एक दफा फिर से उत्तर बिहार बाढ़ (Bihar Flood) के पानी में डूब रहा है. साल 2017 में ऐसी ही एक बाढ़ आई थी जिसमें चंपारण का भितिहरवा आश्रम (Bhitiharwa Ashram) डूबा गया था. इसकी वजह से उस ऐतिहासिक आश्रम के खपरैल भवन की दीवारें क्षतिग्रस्त हो गयीं.

Source: News18Hindi Last updated on: September 28, 2020, 11:45 AM IST
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बेकदरी ऐसी कि हर साल बाढ़ में डूब जाती हैं बिहार की ऐतिहासिक धरोहरें
दुखद तथ्य तो यह भी है कि बिहार की ज्यादातर धरोहरें जो अमूमन बुद्धकालीन हैं, उनकी सुरक्षा के लिए सुरक्षा प्रभारी की तैनाती भी नहीं की गयी है.
पटना. इन दिनों एक दफा फिर से उत्तर बिहार बाढ़ (Bihar Flood) के पानी में डूब रहा है. हिमालय के तराई इलाके में हुई भारी बारिश की वजह से सभी नदियां उफनाई हैं और उनका पानी बिहार के पश्चिमी और पूर्वी कोने में तेजी से फैल रहा है. मगर इस जल प्रलय (Deluge) के बीच जो एक बड़ी त्रासद तस्वीर सामने आ रही वह है इस इलाके के ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण धरोहरों का डूबना.  चंपारण स्थित लौरिया (Lauria) का अशोक स्तंभ (Ashoka pillar) डेढ़ से दो फीट पानी में डूबा हुआ है और उसे देखने वाला कोई नहीं है. यह वही अशोक स्तंभ है, जिसे दुनिया के सबसे महान सम्राटों में से एक सम्राट अशोक ने आज से 2250 साल पहले वहां खुदवाया था और वहां भगवान बुद्ध के परिनिर्वाण की कथा उत्कीर्ण करवायी थी.

हमसब जानते हैं कि अशोक स्तंभ ही देश का राजकीय प्रतीक चिह्न भी है. यह इतना पुराना और महत्वपूर्ण प्रतीक चिह्न है कि महज इस एक चिह्न को सजा संवार कर रखने से और ठीक से प्रचारित करने से यहां पर्यटकों का हुजूम पहुंचने लगता है और इससे लौरिया और आसपास के लोगों को रोजी-रोटी के लिए किसी अन्य काम की जरूरत नहीं होती. मगर यह चिह्न वीराने में किसी उपेक्षित वस्तु की तरह अकेला खड़ा है. लिहाजा हर तरह के मौसम के प्रकोप को झेलना इसकी नियति है. यह उसकी मजबूती का ही कमाल है कि वह अब तक इस तरह खड़ा है.

म्यूजियम प्रभारी ने अपने वेतन के पैसे से उसे ठीक कराया
2017 में ऐसी ही एक बाढ़ में चंपारण का भितिहरवा आश्रम डूबा रहा और इसकी वजह से उस ऐतिहासिक आश्रम के खपरैल भवन की दीवारें क्षतिग्रस्त हो गयीं. चंपारण सत्याग्रह के दौरान महात्मा गांधी ने वहां आसपास के गांवों में शिक्षा, स्वच्छता और स्वास्थ्य संबंधी अभियान चलाने के लिए इसकी स्थापना करवाई थी. उस खपरैल भवन का निर्माण कस्तूरबा और महात्मा गांधी के सहयोगी डॉ देव की अगुआयी में हुआ था. कस्तूरबा वहां अगले छह माह तक रही थीं. मगर बाढ़ ने उस ऐतिहासिक भवन की दीवारों को भी क्षतिग्रस्त कर दिया. दुखद तथ्य तो यह है कि सरकार ने उस क्षतिग्रस्त भवन की मरम्मत में भी दिलचस्पी नहीं ली. अंत में वहां के म्यूजियम प्रभारी ने अपने वेतन के पैसे से उसे ठीक कराया.
इस साल वैशाली में उस निर्माण स्थल पर भी भीषण जलजमाव की खबरें हैं, जहां बुद्ध के अस्थि अवशेषों को रखा जाना है. इसके अलावा जहां से ये अस्थियां मिली थीं, वहां भी जलजमाव हो जाने की खबरें हैं. ये तमाम कहानियां कहती हैं कि राज्य के इतने महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थलों के प्रति भारत सरकार के पुरातत्व सर्वेक्षण, बिहार की सरकार, स्थानीय प्रशासन और वहां के आमलोगों का नजरिया क्या है? हम इन अति महत्वपूर्ण धरोहरों की सुरक्षा को लेकर कितने गंभीर हैं.

धरोहरें घोर उपेक्षा का शिकार भी हैं
पड़ोसी जिला सीतामढ़ी के सामाजिक कार्यकर्ता रामशरण अग्रवाल जो स्थानीय नदियों और ऐतिहासिक धरोहरों को लेकर लगातार चिंतित रहते हैं, कहते हैं- क्या अभी जो हो रहा है, उसे एएसआई (पुरातत्व सर्वेक्षण) को नहीं देखना चाहिए. क्या यह दीवार पर लिखी इबारत जैसी नहीं है. काश एएसआई ने कभी इस बारे में ठीक से योजना बनायी होती कि बाढ़ प्रभावित इलाकों के महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहरों की सुरक्षा कैसे की जाये तो यह दिन नहीं देखना पड़ता.  क्योंकि बाढ़ तो उत्तर बिहार के इलाके में अमूमन हर साल आती ही है. वे कहते हैं, हम बिहार के लोग न सिर्फ इस वजह से एएसआई से दुखी हैं, बल्कि उसकी घोर उपेक्षा का शिकार भी हैं.इस बारे में उमेश चंद्र द्विवेदी, पूर्व निदेशक म्यूजियम बिहार कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि इन धरोहरों को बाढ़ के पानी या प्रकृति के प्रकोप से बचाने का कोई तरीका नहीं है. दुनिया भर में ऐसे धरोहरों को बहुत अच्छे तरीकों से संरक्षित किया जाता है. खास तौर पर पुरातत्व सर्वेक्षण, भारत सरकार के पास संसाधनों की कमी नहीं है, वह चाहे तो इस काम को बखूबी कर सकता है. कई धरोहर तो सिर्फ ठीक ढंग से घेराबंदी कर देने से सुरक्षित हो सकते हैं. मगर हर स्तर पर गंभीरता और इच्छाशक्ति की कमी है. लिहाजा, हर कोई इन धरोहरों को महत्वहीन समझता है.

कुम्हरार से मिले अवशेष भी हर साल डूब जाते थे
वे कहते हैं कि इसी तरह राजधानी पटना के कुम्हरार से मिले अवशेष गहराई में होने की वजह से हर साल डूब जाते थे. उन्हें संरक्षित करने के लिए उपाय किये गये और उन्हें बचा लिया गया. हालांकि वे उपाय अच्छे नहीं कहे जा सकते, क्यों उन अवशेषों की ऐसी घेराबंदी कर दी गयी है कि वे अब आम दर्शकों की निगाह से ओझल हो गये हैं. इन धरोहरों को बचाने के साथ-साथ ऐसे उपाय किये जाने चाहिए, ताकि लोग उन्हें देख भी सकें. अभी लोग कुम्हरार पहुंचते हैं तो जिन धरोहरों की वजह से वह स्थल महत्वपूर्ण माना जाता है, उसे ही नहीं देख सकते.

इन दोनों विशेषज्ञों की बातें काफी हद तक सही हैं. दुनिया भर में ऐतिहासिक धरोहरों को संरक्षित करने के ऐसे तरीके विकसित किये गये हैं जिससे वे मौसम के प्रभाव से भी बचे रहें और उन्हें पर्यटक भी देख सकें. एक जागरूक पर्यटक बच्छराज नखत कहते हैं कि पौराणिक अवशेषों की ऐसी उपेक्षा भारत में ही संभव है. कुछ दिनों पहले जब मैं ग्रीस गया था तो वहां देखा कि कैसे खंडहरों को संरक्षित किया जाता है. उसे शीशे से घेर दिया जाता है. हमने उन्हें शीशे की छत पर चलते हुए देखा था. नेपाल में बुद्ध की जन्मभूमि को भी इसी तरह शीशे से ढक दिया गया है. मगर हमारी धरोहरें इसी तरह बाहर बिखरी हैं और मौसम की मार झेल रही हैं.

 बिहार की ज्यादातर धरोहरें अमूमन बुद्धकालीन हैं
दुखद तथ्य तो यह भी है कि बिहार की ज्यादातर धरोहरें जो अमूमन बुद्धकालीन हैं, उनकी सुरक्षा के लिए सुरक्षा प्रभारी की तैनाती भी नहीं की गयी है. कई जगहों से बौद्ध स्तूपों से ईंटे चुराने की खबरें आती हैं. राज्य के ज्यादातर संग्रहालयों में कोई प्रभारी नहीं है, कुछ तो बगैर स्टाफ के हैं, इसलिए बंद रहते हैं. जबकि बिहार में हर जगह ऐसी धरोहरें मौजूद हैं कि अगर उन्हें पर्यटन के हिसाब से विकसित कराया जाये और उनका प्रचार प्रसार किया जाये तो राजस्थान की तरह बिहार का पर्यटन भी बड़े लाभ के उद्योग में विकसित हो सकता है.

यहां बुद्ध और महावीर से जुड़े कई महत्वपूर्ण स्थल हैं, जिनमें दुनिया भर के पर्यटकों की रुचि है. यह सीता की जन्मस्थली है. यह लोकतंत्र की जन्मस्थली है. यह सिख धर्म के दसवें और आखिरी गुरू गुरुगोविंद सिंह की जन्मस्थली है. यह सूफी संप्रदाय का बड़ा केंद्र है. यह देश के पहले सत्याग्रह चंपारण सत्याग्रह की भूमि है. यह वही धरती है, जहां न्याय दर्शन की शुरुआत हुई थी. यह शेरशाह जैसे बादशाह की धरती है, जिसने अपने महज चार साल के शासन में ऐसे काम किये, जो आज तक भारत की शासन व्यवस्था का आधार है.

अपने ही इतिहास से अनजान है
एक साथ इतने ऐतिहासिक धरोहरों को समेटे रहने वाली बिहार की धरती आज अपने ही इतिहास से अनजान है. अपने धरोहरों के प्रति उसमें उपेक्षा भाव है. काश सरकार और समाज दोनों इन धरोहरों का असली महत्व समझती और इसे संरक्षित करती. इनका विकास पर्यटन के लिहाज से करती. काश इस चुनाव में इन सवालों पर भी बातें होतीं. मगर अभी तो धरोहरें बाढ़ के पानी का मुकाबला कर रही हैं. (डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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First published: September 28, 2020, 11:45 AM IST
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