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Opinion: ज्योति का यह गौरव हमारे लिए ग्लानि से डूब मरने की बात है!

नाम-ज्योति. उम्र-13 साल. उपलब्धि- अपने बीमार पिता को साइकिल की पिछली सीट पर बिठा कर दिल्ली से दरभंगा तक की 12 सौ किमी की यात्रा महज सात दिनों में पूरी करना. इन दिनों ज्योति भारतीय मीडिया की सेंशेसन है. उसकी इस अभूतपूर्व उपलब्धि के बारे में जानकर भारतीय साइकिल फेडरेशन ने उसे ट्रायल के लिए बुलाया है.

Source: News18Hindi Last updated on: May 23, 2020, 12:31 PM IST
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Opinion: ज्योति का यह गौरव हमारे लिए ग्लानि से डूब मरने की बात है!
एक देश, एक नागरिक के तौर पर ये हमारे विफल होने के प्रमाणपत्र हैं. (फाइल फोटो)
नाम-ज्योति. उम्र-13 साल. उपलब्धि- अपने बीमार पिता को साइकिल की पिछली सीट पर बिठा कर दिल्ली से दरभंगा तक की 12 सौ किमी की यात्रा महज सात दिनों में पूरी करना. इन दिनों ज्योति भारतीय मीडिया की सेंशेसन है. उसकी इस अभूतपूर्व उपलब्धि के बारे में जानकर भारतीय साइकिल फेडरेशन ने उसे ट्रायल के लिए बुलाया है. अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बेटी इवांका ट्रंप उसकी उपलब्धियों से इतनी चमत्कृत हैं कि उन्होंने उसकी तारीफ करते हुए ट्वीट किया है. उस ट्वीट के बाद भारत के कई बड़े पत्रकार और महत्वपूर्ण लोग उस ट्वीट को री-ट्वीट कर रहे हैं और कह रहे हैं कि हमें इस तेरह साल की गरीब किशोरी पर गर्व करना चाहिए. कुल मिलाकर उसे दूसरा दशरथ मांझी बनाने का अभियान चल रहा है.

पिता को बिठाकर महज सात दिनों में 12 सौ किमी की साइकिल यात्रा करने वाली ज्योति को अपनी यह उपलब्धि बिल्कुल भी हैरतअंगेज नहीं लगती है. वह कहती है- क्या करते. साइकिल थी तो साइकिल से आ गये. उसकी इस सरल और सहज अदा पर इंडियन इलीट क्लास बुरी तरह फिदा हो गया है. लोगों को लगता है कि यह हुई कुछ अलग बात, अलग तरह का इंस्टिंक्ट. इस वक्त जब लोग छोटी-छोटी मुसीबतों में हिम्मत हारने लगते हैं, तब एक किशोरी इतना बड़ा हिम्मत कर बैठती है. और इस गर्वानुभूति, इस हैरतअंगेज कारनामे के जिक्र के पीछे वे तमाम सवाल गुम हो जाते हैं, जो पिछले दो महीने से चाहे-अनचाहे इस देश की सत्ता और इलीट वर्ग के सिर पर सवार थे कि आखिर क्यों इस लॉक डाउन में लाखों को पैदल, साइकिल पर, ट्रकों पर, रिक्शे-ठेले पर, ऑटो पर क्यों हजार-डेढ़ हजार किमी की दूरी, मुसीबत भरी यात्रा करनी पड़ती है. ठीक उसी तरह जैसे दशरथ मांझी के पहाड़ तोड़ कर रास्ता बनाने के बाद जो उनकी उपलब्धियों का गान शुरू हुआ, उसमें यह सवाल छिप गया कि आखिर उस इलाके में सड़क क्यों नहीं बन पा रही थी.

13 साल की बच्ची से कोई नहीं पूछ रहा ये सवाल
अब हर तरफ ज्योति का यशोगान है. कोई यह नहीं पूछ रहा है कि आखिर 13 साल की बच्ची को जिसकी पढ़ने और खेलने-कूदने की उम्र थी, उसे क्यों साइकिल पर 12 सौ किमी तक अपने बीमार पिता को ढोना पड़ा? उस अपने रास्ते में तीन राज्यों की सीमा पार की और हजारों लोगों से मिलीं, जिनमें पुलिस वाले भी होंगे. आखिर क्यों किसी ने उसकी मदद नहीं की कि उसकी मुसीबतें कम हो जायें. सरकार ने उसके लिए ट्रक या बस का इंतजाम क्यों नहीं किया, स्पेशल ट्रेन तो एक मई से चलने लगी थी, किसी पुलिस वाले ने यह क्यों नहीं कहा कि बच्ची इतना लंबा रास्ता तुम कैसे तय करोगी, आओ तुम्हें किसी ट्रेन पर चढ़ा देते हैं. यह ठीक उसी तरह हुआ जैसे 22 साल तक पहाड़ तोड़ रहे दशरथ मांझी को सरकार के किसी आदमी ने कभी नहीं कहा कि अरे, तुम इतनी मेहनत क्यों कर रहे हो, हमलोग इस सड़क को बनवा देते हैं. वह अकेला मजदूर अपनी एक तिहाई जिंदगी पहाड़ को तोड़ने में लगा बैठा, जब वह यह सब कर रहा था, तो लोग उसे पागल कहते थे. जब उसने रास्ता बना दिया तो अचानक मसीहा बन बैठा. वह मसीहा बनना नहीं चाहता था, वह तो अपने गांव के लिए सिर्फ एक रास्ता चाहता था. हमारी व्यवस्थाएं गांवों को रास्ता देना नहीं जानती है, हां, खुद रास्ता बनाने वालों को मसीहा बना देने और मसले को डाइवर्ट करने का हुनर बखूबी जानती है.
सवाल सिर्फ ज्योति का नहीं
यहां सवाल सिर्फ ज्योति का नहीं है. उन हजारों लोगों का है, जिन्होंने पैदल और साइकिल से पिछले दो महीने में यह रास्ता तय किया है. ज्योति के बिहार आने से कुछ ही दिन पहले एक और महिला साइकिल से बिहार आयी थी, दिल्ली से बेगूसराय सिर्फ नौ दिन में. फर्क सिर्फ इतना था कि जहां 13 साल की ज्योति अपने पिता को पीछे बिठाकर खुद साइकिल चला रही थी, वह महिला खुद वयस्क थी और उसकी साइकिल की अगली सीट पर उसका तेरह साल का बेटा था. इसी तरह एक गर्भवती महिला पैदल रास्ते में अपने बच्चे को जन्म देने के बाद फिर पैदल चल पड़ी. एक व्यक्ति जिसके पांवों में बैंडेज था, वह भी पैदल चलने वालों के साथ था. दसियों लोग अपनी मां, अपने पिता, अपने बच्चे, अपनी पत्नी को कंघे पर, पीठ पर उठाये पैदल चल रहे थे और अभी भी चल रहे हैं.

ना हैं मैराथन धावक और न ही कोई सपना एथलीट बनने काये सभी मैराथन धावक नहीं हैं, न इनका कोई सपना है एथलीट बनने का. न ही इनमें से कोई एथलेटिक सोसाइटी के आमंत्रण के इंतजार में है. ये सब के सब मजदूर हैं, जो बस अपने घर पहुंचना चाहते थे. वे जहां थे, वह उनके लिए परिस्थितियां काफी विषम हो गयी थीं, तभी उन्होंने तय किया कि तमाम मुसीबतों को सहते हुए इस असंभव सी लगने वाली यात्रा को पूरा करेंगे. ठीक वैसे ही ज्योति ने यह यात्रा भारतीय साइकिल फेडरेशन द्वारा आमंत्रित कियो जाने के लिए नहीं की. उसके सामने खड़ी पहाड़ सी परिस्थितियों ने उसे यह कदम उठाने के लिए मजबूर किया.

इवांका का ट्वीट सामूहिक विफलता का प्रसंग
ऐसे में अगर आपको लगता है कि आप ज्योति की उपलब्धियों के लिए गर्व कर सकते हैं, तो गलत हैं. इवांका ट्रंप ने अगर ज्योति की उपलब्धियों को रेखांकित करते हुए ट्वीट किया है, तो यह ज्योति की व्यक्तिगत उपलब्धि हो सकती है. एक देश, एक इंसान के तौर पर यह हमारे लिए सामूहिक विफलता का प्रसंग है कि हम एक 13 साल की लड़की को इस जोखिम भरी यात्रा करने से रोक नहीं पाये. हमारे देश के लिए यह भी निराशा की ही बात है कि जब लॉक डाउन में दुनिया भर के लोग अपने घरों में सुरक्षित रहने की कोशिश कर रहे थे, हमारे करोड़ों लोग अपने लिए एक सुरक्षित ठिकाना तलाश रहे थे, अपने घरों तक पहुंचने के लिए हजारों किमी की दूरी इस तरह नाप रहे थे.

कौन सी रही होंगी परिस्थितियां
इंवाका ट्रंप के ट्वीट से दुनिया को एक भारतीय किशोरी के अदम्य साहस की कहानी तो मालूम हुई होगी, मगर उसके साथ-साथ लोगों ने यह भी जानने की कोशिश की होगी कि आखिर क्यों इस बच्ची को 12 सौ किमी साइकिल से चलना पड़ा. भारत में आखिर किस तरह की परिस्थितियां थीं, जिस वजह से करोड़ों लोग सड़कों पर पैदल चल रहे थे.

एक नागरिक के तौर पर विफल होने का प्रमाण
ज्योति की उपलब्धियां उन सैकड़ों सवालों और उन सैकड़ों दुखद कहानियों के साथ दुनिया के मंच पर पहुंची है. उन सब कहानियों में एक देश, एक नागरिक के तौर पर हमारे विफल होने के प्रमाणपत्र हैं. ठीक वैसे ही जैसे दशरथ मांझी की सफलता की कहानी के पीछे बिहार की सरकारों और यहां के नागरिक समाज के विफलता की कहानियां थीं, जिन्हें हम पढ़ना भूल गये और उनकी उपलब्धियों पर गौरवान्वित होते रहे.

 

 

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First published: May 23, 2020, 12:20 PM IST
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