क्यों हर क्राइसिस में दो ही अफसर याद आते हैं बिहार सरकार को?

पिछले कुछ सालों से बिहार की ब्यूरोक्रेसी (Bureaucracy) पर नजदीकी निगाह रखने वाले लोग जानते हैं कि बिहार सरकार जब भी किसी क्राइसिस में फंसती है तो उससे निकलने की जिम्मेदारी दो अफसरों को ही दी जाती है.

Source: News18 Bihar Last updated on: July 29, 2020, 2:07 PM IST
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क्यों हर क्राइसिस में दो ही अफसर याद आते हैं बिहार सरकार को?
ऐसे माहौल में ज्यादातर अधिकारी या तो केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर चले जाना पसंद करते हैं.
पटना. कोरोना संक्रमण (Corona Infection) काल में यह दूसरा मौका है, जब बिहार सरकार ने स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव को बदल दिया है. इस रविवार को उदय सिंह कुमावत (Uday Singh Kumawat) को पद से हटा कर विभाग की जिम्मेदारी अमृत प्रत्यय को दे दी गई. जबकि उदय सिंह कुमावत को महज दो माह पहले 20 मई को विभाग का जिम्मा मिला था. उससे पहले संजय कुमार (Sanjay Kumar) विभाग के प्रधान सचिव थे. ऐन कोरोना संक्रमण के दौर में स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव को दो बार बदला जाना, विभाग की लचर स्थिति पर तो सवाल खड़े कर ही रहा है. इसके साथ-साथ एक अन्य सवाल भी खड़ा हो रहा है कि सरकार ने इन महत्वपूर्ण विभाग की जिम्मेदारी एक ऐसे अधिकारी को क्यों दे दी, जिसके पास पहले से ही आपदा प्रबंधन विभाग की जिम्मेदारी थी. इस वक्त बिहार (Bihar) कोरोना के साथ-साथ बाढ़ की तबाही से भी जूझ रहा है. ऐसे में आपदा प्रबंधन विभाग को संभालने के लिए एक स्वतंत्र अधिकारी की जरूरत थी, मगर दोनों महत्वपूर्ण विभागों का जिम्मा एक ही व्यक्ति को दे दिया गया. सवाल यह भी उठने लगे कि क्या बिहार सरकार के पास इस आपदा की घड़ी में काबिल अफसरों की कमी है, क्या उसके पास स्वास्थ्य विभाग को स्वतंत्र रूप से संभालने के लिए कोई और सक्षण अधिकारी नहीं हैं.

पिछले कुछ सालों से बिहार की ब्यूरोक्रेसी पर नजदीकी निगाह रखने वाले लोग जानते हैं कि बिहार सरकार जब भी किसी क्राइसिस में फंसती है तो उससे निकलने की जिम्मेदारी दो अफसरों को ही दी जाती है. पहले प्रत्यय अमृत हैं, जो अभी स्वास्थ्य और आपदा प्रबंधन जैसे दो महत्वपूर्ण विभागों का जिम्मा संभाल रहे हैं, इससे पहले ऊर्जा विभाग का भी अतिरिक्त भार संभाल रहे थे. दूसरे आनंद किशोर हैं, जो अभी सचिव स्तर के अधिकारी हैं, जिन्हें सरकार इतना सक्षम मानती है कि कभी बिहार माध्यमिक परीक्षा बोर्ड का अध्यक्ष बना देती है, तो कभी पटना का कमीश्नर बना देती है, कभी पटना मेट्रो की जिम्मेदारी दे देती है. सच तो यह है कि हाल के वर्षों में सरकार जब-जब किसी इमेज क्राइसिस में फंसी, उन्हें सीएम ने उस आपदा को हैंडल करने के लिए खड़ा कर दिया. वे अभी इतने प्रभारों में दबे हैं कि केंद्र सरकार ने उन्हें पटना मेट्रो के एमडी का पद देने से ही इनकार कर दिया.

 काबिल अफसरों की घोर कमी है
ये उदाहरण बताते हैं कि बिहार सरकार के पास महत्वपूर्ण विभागों का जिम्मा संभालने और आपदा की स्थिति से व्यवस्था को उबारने के लिए काबिल अफसरों की घोर कमी है. सरकार को दो के अलावा तीसरा विकल्प नहीं मिलता. राज्य सरकार के सामान्य प्रशासन विभाग के आंकड़े भी इस बात की पुष्टि करते हैं. राज्य सरकार के अधीन इस वक्त कुल 42 विभाग हैं, इन्हें 33 कैबिनेट मंत्री मिलकर देखते हैं. मगर इन विभागों को हेड करने के लिए राज्य सरकार के पास बमुश्किल 13 प्रधान सचिव स्तर के अधिकारी हैं. ऐसे में ज्यादातर विभागों को सेक्रेटरी स्तर के अधिकारी ही हेड कर रहे हैं. जबकि कायदे से हर विभाग को संभालने के लिए प्रधान सचिव स्तर का अधिकारी होना चाहिए. कम से कम उन महत्वपूर्ण विभागों में तो होना ही चाहिए जिनके पास बड़ी जिम्मेदारी है.
33 वरीय अधिकारी प्रधान सचिव स्तर की जिम्मेदारी संभाल सकते थे
ऐसा नहीं है कि बिहार में सीनियर अधिकारियों की कमी है और इस वजह से ऐसी दिक्कत पेश आ रही है. राज्य के सामान्य प्रशासन विभाग के ही आंकड़े कहते हैं कि राज्य के 33 वरीय अधिकारी जो प्रधान सचिव स्तर की जिम्मेदारी संभाल सकते थे, वे लंबे समय से केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर हैं. अगर वे अधिकारी बिहार में होते तो हर विभाग में कम से कम एक प्रधान सचिव तो होता ही. कोरोना जैसे संकटकाल में सरकार को महत्वपूर्ण पदों पर बिठाने के लिए लोगों की कमी नहीं होती. यह अपने आप में अजीब स्थिति है, क्योंकि अमूमन ऐसा माना जाता है कि अगर केंद्रीय प्रतिनियुक्ति में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी न मिले तो अधिकारी अपने राज्य में किसी विभाग का प्रधान सचिव बनना अधिक पसंद करते हैं. मगर बिहार के मामले में ज्यादातर अधिकारी केंद्रीय प्रतिनियुक्ति लेकर दिल्ली चले जाना पसंद करते हैं. क्योंकि उन्हें लगता है बिहार में जिम्मेदारी संभालना बड़ा रिस्की काम है. इसलिए भी ऐसी धारणा बन रही है.

यहां सीएम का एक किचेन कैबिनेट हैबिहार के ब्यूरोक्रसी में एक बात दबे स्वर में कही जाती है कि यहां सीएम का एक किचेन कैबिनेट है, उसके बाहर के किसी भी अधिकारी को न कभी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी जाती है, और अगर दी भी गयी तो उन्हें काम करने की और प्रयोग करने की आजादी नहीं मिलती. इसके साथ ही उनके किचेन कैबिनेट के लोग ऐसे अधिकारियों पर कड़ी निगाह रखते हैं, उन्हें छोटी सी गलती पर भी हटा दिया जाता है. इसी वजह से स्वास्थ्य विभाग से संजय कुमार को हटा दिया गया, क्योंकि उनकी सफलता लोगों को खटक रही थी. उदय सिंह कुमावत को बहुत सीमित अधिकार दिए गए. और जब हालात बेकाबू होने लगे तो उन्हें बलि का बकरा बना दिया गया. जबकि तमाम विफलताओं के बावजूद अमृत प्रत्यय और आनंद किशोर जैसे अधिकारी अपने पद पर बने रहते हैं और उन्हें सारे महत्वपूर्ण विभाग मिलते रहते हैं.

केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर चले जाना पसंद करते हैं
ऐसे माहौल में ज्यादातर अधिकारी या तो केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर चले जाना पसंद करते हैं या बिहार में ही किसी महत्वहीन विभाग में रहकर समय काट लेना चाहते हैं. जिम्मेदारी न लेना यहां के अधिकारियों के लिए सेफ गेम हो गया है. ब्यूरोक्रेसी के लोग कहते हैं कि किचेन कैबिनेट होना कोई बहुत गलत बात नहीं है और हर शासक अपने विश्वस्त लोगों को ही महत्वपूर्ण जिम्मा देता है. मगर दिक्कत यह हो गई है कि सरकार के विश्वस्त अधिकारियों की संख्या भी बहुत कम है. कुल मिलाकर दो अफसर ही हैं, जो हर मोर्चे पर लगा दिए जाते हैं.

 क्राइसिस का असर सरकार के काम-काज पर दिखता है
आखिरकार इस लीडरशिप क्राइसिस का असर सरकार के काम-काज पर दिखता है. पहले से ही बदहाल राज्य बिहार तेजी से आगे नहीं बढ़ पा रहा. थोड़ी सी चुनौती आने पर असहाय नजर आने लगता है. रूटीन आपदाओं में भी यहां का इंफ्रास्ट्रक्चर भरभरा कर गिर जाता है. ऐसे में यही लगता है कि सिर्फ संसाधनों की कमी ही नहीं, जिम्मेदार अफसरों का अभाव भी बिहार के पिछड़ते रहने की एक बड़ी वजह है.
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First published: July 29, 2020, 1:47 PM IST
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