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बिहार को चमचमाती सड़कों-फ्लाइओवरों के बदले बेहतर आंगनबाड़ी केंद्रों की जरूरत क्यों?

सड़कों के निर्माण पर एक लाख करोड़ से अधिक खर्च करने वाले बिहार में कुपोषित बच्चों, एनीमिक किशोरियों और महिलाओं के लिए सालाना 13 सौ करोड़ ही हैं. इनमें से भी ज्यादातर राशि कर्मियों के मानदेय पर खर्च होने वाली है.

Source: News18Hindi Last updated on: January 16, 2021, 10:44 AM IST
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बिहार को चमचमाती सड़कों-फ्लाइओवरों के बदले बेहतर आंगनबाड़ी केंद्रों की जरूरत क्यों?
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सरकार गठन के बाद कई सड़क परियोजनाओं का उद्घाटन किया है. (फाइल फोटो)
इस शुक्रवार, 15 जनवरी 2021 को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (Cm Nitish Kumar) ने पटना में 380 करोड़ की लागत वाले 6.3 किमी लंबे अटल पथ का और राजगीर में 31 करोड़ की लागत वाले घोड़ाकटोरा पार्क का उद्घाटन किया. घोड़ाकटोरा पार्क में एक ग्लास ब्रिज (Bihar Glass Bridge) भी बन रहा है, जिसे देश का दूसरा ग्लास ब्रिज कहा जा रहा है. इससे पहले वे 1289 करोड़ की लागत से बने एम्स दीघा एलिवेटेड रोड और 266 करोड़ की लागत से बने कोइलवर पुल का उद्घाटन कर चुके हैं. इस बीच बिहार की नयी सरकार ने 4154 करोड़ की लागत से बिहार के 120 शहरों में बायपास और एलिवेटेड सड़क बनाने की घोषणा की है. 3390 करोड़ का गंगा पाथवे पहले ही बन रहा है. 72 सौ करोड़ की लागत वाला औरंगाबाद से दरभंगा तक का एक्सप्रेसवे भी बनेगा. पटना में देश के पहले पावर म्यूजियम (Power Musium) के बनने की भी घोषणा कर दी गयी है. पटना मेट्रो (Patna Metro), पटना का नया बस पड़ाव, विज्ञान भवन, जेपी सेतु के समानांतर एक फोरलेन पुल, चार हजार करोड़ की लागत से सात एनएच सड़कें. यह सब भी बन रहा है.

इनमें से ज्यादातर घोषणाएं पिछले दो महीने में नीतीश कुमार की नयी सरकार ने की है. कोईलवर पुल के उद्घाटन के वक्त तो सीएम ने साफ-साफ कहा कि सड़कों और पुल-पुलियों के निर्माण में बिहार सरकार की तरफ से 54 हजार करोड़ खर्च हो रहे हैं और केंद्र से उसे अतिरिक्त 50 हजार करोड़ की मदद मिली है. यानी बिहार में सिर्फ सड़क और पुल-पुलियों पर एक लाख करोड़ से अधिक का खर्च हो रहा है. भवनों, इमारतों और संग्रहालयों के निर्माण पर होने वाला खर्च अलग है. इसका अभी आकलन नहीं हुआ है. मगर जिस रफ्तार से घोषणाएं हो रही हैं, ऐसा लगता नहीं है कि वह खर्च भी 40 से 50 हजार करोड़ से कम होगा.

पिछड़े राज्य में तीव्र विकास
यह उस बिहार की कहानी है, जिसे देश में सबसे पिछड़ा माना जाता है. जो बिहार बाढ़, पलायन, रोजगार और दूसरी कई गंभीर समस्याओं का शिकार है और शिक्षा, स्वास्थ्य से लेकर प्रति व्यक्ति आय तक के मानकों पर अमूमन यह राज्यों की सूची में सबसे निचले पायदान पर नजर आता है. खुद नीतीश कुमार मानते हैं कि राज्य पिछड़ा हुआ है और वे इसके तीव्र विकास के लिए विशेष राज्य का दर्जा भी मांगते रहे हैं. 2020 के विधानसभा चुनाव के वक्त जब राज्य सरकार के 4.5 लाख से अधिक खाली पदों को भरे जाने की मांग उठी थी तब सरकार की तरफ से आंकड़े जारी करके कहा गया था कि हमारे पास इतना पैसा कहां कि इतने लोगों को नौकरी दे सकें.
हालांकि बाद में राजनीतिक कारणों से एनडीए गठबंधन को भी खाली पदों को भरने और 17 लाख लोगों को रोजगार देने का वादा करना पड़ा. परंतु ये खबरें बताती हैं कि बिहार की नयी सरकार की प्राथमिकता सड़कों, पुल-पुलियों, इमारतों और संग्रहालयों के भवनों के निर्माण पर अधिक है. तभी बिहार में भले कोई औऱ उद्योगपति निवेश के लिए न आ रहा हो, एल एंड टी, गैमन इंडिया, सपोरजी पालोनी जैसी बड़ी कंस्ट्रक्शन कंपनियां काम करती नजर आ जायेंगी.

सेहत का ख्याल नहीं
इस बीच कहीं से ऐसा नहीं लगता कि सरकार का ध्यान राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के आंकड़ों की तरफ भी है, जिसमें यह बताया गया है कि बिहार में पिछले चार साल में महिलाओं और बच्चों के बीच एनीमिया और कुपोषण के मामले घटने के बदले बढ़ गये. इन आंकड़ों के मुताबिक 2015-16 में बिहार में छह माह से पांच साल के बीच के 63.5 फीसदी बच्चे एनीमिक थे, वहीं 2019-20 के इन आंकड़ों के मुताबिक यह संख्या बढ़कर 69.4 हो गयी है. 15-49 वर्ष के आयु वर्ग की सामान्य महिलाओं में पहले 60.4 फीसदी एनीमिक थीं, अब 63.6 फीसदी एनीमिक हो गयी हैं. इसी आयु वर्ग में गर्भवती महिलाओं में एनीमिया 58.3 फीसदी से बढ़कर 63.1 फीसदी हो गया है. जहां तक 15-19 साल के बीच की किशोरियों का सवाल है, पहले 61 फीसदी एनीमिक थीं, अब 65.7 फीसदी किशोरियां एनीमिक हैं.ऐसा क्यों हुआ. क्योंकि बिहार सरकार की प्राथमिकता इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट की तरफ तो खूब रही, मगर मानव संसाधन के विकास पर उसका ध्यान कभी नहीं गया. क्योंकि इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े प्रोजेक्ट में ठेकेदारों से लेकर अफसरों और मंत्रियों तक के लिए कमाई के भरपूर अवसर होते हैं. राज्य की गरीब आबादी को कुपोषण औऱ एनीमिया के भंवर से बाहर निकालने में कमाई के वैसे अवसर नहीं होते.

आंगनबाड़ी पर खर्च कम
आंकड़े इसकी गवाही देते हैं. साल 2018-19 में आंगनबाड़ी केंद्रों में पोषाहार बांटने का कुल बजट 1213 करोड़ रुपये था, जिस बजट में से लगभग पौने दो लाख आंगनबाड़ी सेविकाओं और सहायिकाओं को मानदेय भी दिया गया. उसी वर्ष किशोरियों के स्वास्थ्य एवं स्वच्छता के लिए सिर्फ 12.71 करोड़ रुपये खर्च किये गये. राज्य में गर्भवती और प्रसूता महिलाओं को बंटने वाली 5 हजार रुपये की राशि के लिए भी सिर्फ 78.22 करोड़ रुपये खर्च हुए. यानी बमुश्किल डेढ़ लाख महिलाओं को यह सहायता मिल पायी. कामकाजी महिलाओं के बच्चों के लिए शिशुशाला यानी क्रेच खोलने के लिए तो सिर्फ 90 लाख रुपये खर्च किये गये.

मतलब साफ है, सड़कों के निर्माण पर एक लाख करोड़ से अधिक खर्च करने वाले बिहार में कुपोषित बच्चों, एनीमिक किशोरियों और महिलाओं के लिए सालाना 13 सौ करोड़ ही हैं. इनमें से भी ज्यादातर राशि कर्मियों के मानदेय पर खर्च होने वाली है.

इसी वजह से राज्य की अगली पीढ़ी भी कुपोषण और एनीमिया के उसी मकड़जाल में कैद है, जिस मकड़जाल में वह पिछले कई दशकों से फंसी नजर आती है. इन परिस्थितियों में फंसे बच्चे बड़े होकर न स्वस्थ हो पायेंगे न ही उनमें किसी और प्रतिभा का विकास हो पायेगा. ऐसे में उन्हें भी अपनी पिछली पीढ़ी की तरह छोटे-छोटे रोजगार के लिए देश के विकसित राज्यों और बड़े महानगरों की तरफ पलायन करना होगा.

मानकों पर कहां खड़ा है राज्य
सड़कों, पुल-पुलियों और आलीशान इमारतों के बना देने से बिहार बाहर से तो एक संपन्न राज्य नजर आयेगा, मगर उसके लोग उतने ही गरीब होंगे, जितने दस-बीस या पचास साल पहले थे. यही वजह है कि आज जहां देश की औसत प्रति व्यक्ति आय सालाना एक लाख रुपये से अधिक है, बिहार के लोग औसतन सालाना 35,590 रुपये ही कमा पाते हैं. बिहार की लगभग 34 फीसदी आबादी अभी भी गरीबी रेखा से नीचे गुजर बसर करती है. मानव विकास सूचकांक पर अभी भी हम 36वें स्थान पर हैं.

ये आंकड़े बार-बार इशारा करते हैं कि बिहार सरकार को अपनी नीति में बदलाव लाने की जरूरत है. उसे सड़कों, पुल-पुलियों और भवनों के निर्माण के बदले अपने नागरिकों के निर्माण पर अधिक राशि खर्च करने की जरूरत है. हमें अच्छे फ्लाइओवरों के बदले बेहतर तरीके से संचालित आंगनबाड़ी केंद्रों की जरूरत है. ऐसे आंगनबाड़ी केंद्र जहां राज्य के सभी कुपोषित बच्चों और एनीमिक महिलाओं को ढंग से समुचित पोषाहार मिले और उन्हें एक स्वस्थ इंसान बनाने का काम गंभीरता से हो. इसके लिए बजट बढ़ाने और योग्य लोगों को इस अभियान से जोड़ना होगा. अभी तो बिहार के आंगनबाड़ी केंद्र खाना-पूर्ति करते ही नजर आ रहे हैं. (डिस्क्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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First published: January 16, 2021, 10:44 AM IST
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