Opinion: क्यों बिहार को केरल का मनरेगा मॉडल अपनाने की जरूरत है?

बिहार और केरल, दोनों ही राज्यों में अकुशल मजदूरों की मजदूरी दर 300 रुपये के आसपास ही है. चूंकि केरल में मजदूरों को 300 रुपये की मजदूरी मिल जाती है, इसलिए वहां उनकी नजर मनरेगा के काम-काज पर रहती है. बिहार के मजदूरों का काम 193.8 रुपये की मजदूरी से नहीं चलता, इसलिए वे मनरेगा के बदले पलायन का विकल्प चुनते हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: December 30, 2020, 3:42 PM IST
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Opinion: क्यों बिहार को केरल का मनरेगा मॉडल अपनाने की जरूरत है?
बिहार में मनरेगा जैसी योजनाओं की जरूरत है.
साल 2020 के आखिरी दिनों में केरल से एक अच्छी खबर आयी कि वहां हाल ही में संपन्न हुए स्थानीय पंचायतों के चुनाव में 2007 सीटें मनरेगा मजदूरों ने जीती है. इनमें नब्बे फीसदी से अधिक महिलाएं ही हैं. जाहिर सी बात है कि यह मनरेगा के बेहतर क्रियान्वयन से ही मुमकिन हुआ है. कभी जिस योजना की हंसी उड़ायी जाती थी, उसने केरल के गरीब मजदूरों को संपन्न और सशक्त बना दिया है. मगर इस खबर को पढ़ते हुए जब हम बिहार राज्य पर नजर डालते हैं, जहां मनरेगा जैसी योजनाओं की बड़ी जरूरत है, क्या वहां भी मनरेगा ऐसे बदलाव ला पाया है? यह सवाल खुद सवालों के घेरे में है.

हालांकि ऐसा नहीं है कि बिहार में कोई मनरेगा मजदूर राजनीतिक रूप से सक्षम नहीं है. उन्होंने चुनाव लड़े या जीते नहीं हैं. हाल ही में बीते विधानसभा चुनाव में मुजफ्फरपुर के कुरहनी विधानसभा से मनरेगा मजदूर संजय साहनी चुनाव के मैदान में उतरे थे. हालांकि उन्हें जीत नहीं मिली. उनके भाई भी इस बार पंचायत चुनाव में दावेदारी करने की तैयारी कर रहे हैं. वहीं कटिहार के मनसाही प्रखंड के चित्तौड़िया पंचायत में मुखिया और सरपंच दोनों मनरेगा मजदूर ही हैं. मुखिया दीपनारायण पासवान मेठ रह चुके हैं और सरपंच जीतेंद्र पासवान उनके साथी मनरेगा मजदूर हैं.

सशक्त हुए मजदूर
मगर ये सब इक्का-दुक्का मामले हैं. संस्थाओं और संगठनों की मदद से ऐसे कुछ लोग आगे बढ़े और सशक्त हुए हैं. जबकि केरल की सफलता सामूहिक सफलता है, यह मनरेगा योजना की सफलता है, जिसने बड़ी संख्या में मजदूरों को ताकतवर बनाया है. बिहार में तो इस साल सिर्फ 10,627 मजदूरों को ही 100 दिन का रोजगार मिल सका है. जबकि इस साल कोरोना और लॉकडाउन में 30 लाख के करीब मजदूर बिहार लौटे थे. यह हम सब जानते हैं कि सरकार के तमाम दावों के बावजूद इनमें से ज्यादातर मजदूर फिर वापस पलायन कर गये, क्योंकि सरकार इनके लिए राज्य में मजदूरी की व्यवस्था नहीं कर पायी.
हालांकि बिहार सरकार का दावा है कि 30 दिसंबर तक राज्य में मनरेगा के तहत 47.2 लाख मनरेगा मजदूरों को औसतन 38 दिन का रोजगार उपलब्ध कराया गया है. जबकि केरल राज्य ने 16.8 लाख मजदूरों को औसतन 47 दिन का रोजगार उपलब्ध कराया है. इस लिहाज से देखें तो दोनों राज्यों में मनरेगा के क्रियान्वयन में उन्नीस-बीस का ही फर्क है. मगर जब हम इस योजना के एंड रिजल्ट को देखते हैं तो केरल के मजदूर काफी सशक्त नजर आते हैं. इसकी वजह है, वहां इस योजना का क्रियान्वयन ठीक से हुआ है. वहां मनरेगा मजदूरी की दर लगभग 300 रुपये है, जबकि बिहार में अभी मनरेगा मजदूरी की दर 200 के पार भी नहीं जा पायी है.


कम मजदूरी, इसलिए पलायन
हालांकि यह बहुत छोटी सी बात है, मगर इस बात ने दोनों राज्यों में मनरेगा के क्रियान्वयन में बड़ा फर्क उपस्थित किया है. दरअसल दोनों राज्यों में अकुशल मजदूरों की मजदूरी दर 300 रुपये के आसपास ही है. मगर चूंकि केरल में मनरेगा में भी मजदूरों को 300 रुपये की मजदूरी मिल जाती है, इसलिए वहां के मजदूरों की नजर मनरेगा के काम-काज पर रहती है. बिहार के मजदूरों का काम 193.8 रुपये की मजदूरी से नहीं चलता, इसलिए वे मनरेगा के बदले पलायन का विकल्प चुनते हैं. जाहिर है ऐसे में बिहार में मनरेगा के तहत जो पैसा खर्च हो रहा है, उसमें बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हो रहा है.जमीनी रिपोर्ट यही बताते हैं कि बिहार में मनरेगा के तहत जो भी काम होता है, वह अक्सर मशीनों से करा लिया जाता है और कुछ डमी मजदूरों के खाते में मजदूरी डाल कर फिर उस पैसे का बंदरबांट किया जाता है. राज्य सरकार कहने को वृक्षारोपण और तालाब खुदाई जैसे पर्यावरण से जुड़े काम मनरेगा से करवाने का प्रचार प्रसार कर रही है. मगर इन तमाम योजनाओं के पीछे बड़े पैमाने पर सांगठनिक भ्रष्टाचार हो रहा है. पहले से खुदे हुए तालाब को मनरेगा का तालाब बताकर और पहले से लगे पेड़ों को मनरेगा में शामिल कर राशि निकाली जा रही है और बंदरबांट की जा रही है.

इस साल जब लॉकडाउन के शुरुआत में बड़ी संख्या में बिहार के मजदूर देश के अलग-अलग राज्यों से लौटे, तब भी यह कहा गया था कि जो लोग स्वेच्छा से बिहार में रहना चाहेंगे, उन्हें यहीं काम-काज उपलब्ध कराया जाएगा. उस वक्त अमूमन 30 लाख से अधिक मजदूर बिहार लौटे थे. क्वारंटीन सेंटरों में रह रहे इन मजदूरों से संवाद करते हुए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा था, नून रोटी खाएंगे, जिंदगी यहीं बिताएंगे. उस वक्त कहा गया था कि बड़े पैमाने पर मनरेगा के तहत लोगों को काम उपलब्ध कराया जायेगा.

इस कोरोना वाले साल में बिहार में मनरेगा का परफार्मेंस कैसा रहा यह तो इसी बात से जाहिर होता है कि कोरोना के खतरों के बावजूद जो मजदूर बिहार आए थे, उनमें से ज्यादातर वापस लौट गए. आंकड़े भी यही बताते हैं कि राज्य सरकार मनरेगा में पिछले साल के मुकाबले इस साल कुछ खास नतीजे नहीं दे पायी.


पिछले साल के मुकाबले इस साल बमुश्किल 8 लाख अधिक मजदूरों को ही काम उपलब्ध कराया जा सका. पिछले साल के मुकाबले आधे मजदूरों को ही 100 दिन का रोजगार उपलब्ध कराया जा सका है. पिछले साल 20 हजार से अधिक लोगों को 100 दिनों का रोजगार उपलब्ध कराया गया था, इस बार दस हजार मजदूरों को ही सौ दिनों का रोजगार मिल सका है.

ये तमाम आंकड़े बताते हैं कि पलायन और बेरोजगारी की बीमारी से ग्रस्त बिहार राज्य में जिस इमानदारी और निष्ठा के साथ मनरेगा जैसी योजनाओं को लागू करने की जरूरत थी, वह नहीं हो सका है. ऐसे में बिहार को केरल जैसे राज्यों से सीखने की जरूरत है, जहां मनरेगा के जरिये बड़े पैमाने पर मजदूर सशक्त और सक्षम हो रहे हैं. (डिस्क्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं.)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
पुष्यमित्र

पुष्यमित्रलेखक एवं पत्रकार

स्वतंत्र पत्रकार व लेखक. विभिन्न अखबारों में 15 साल काम किया है. ‘रुकतापुर’ समेत कई किताबें लिख चुके हैं. समाज, राजनीति और संस्कृति पर पढ़ने-लिखने में रुचि.

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First published: December 30, 2020, 3:42 PM IST
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