Bihar Panchayat Election: क्यों 'ठेकेदार' बनकर रह गये बिहार के मुखियाजी?

Bihar Panchayat Election: मुखिया और वार्ड सदस्य अपने इलाके के लिए कभी कोई योजना खुद नहीं बनाते. उन्हें राज्य या केंद्र की योजनाओं को लागू करने के लिए फंड मिल जाता है और वे उसे बस लागू कराते हैं. इसलिए उनकी हैसियत ठेकेदारों के जैसी हो गयी है.

Source: News18Hindi Last updated on: February 28, 2021, 1:42 PM IST
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Bihar Panchayat Election: क्यों 'ठेकेदार' बनकर रह गये बिहार के मुखियाजी?
अभी भी बिहार में ग्रामसभा की बैठकें औपचारिक तरीके से ही होती हैं. (सांकेतिक फोटो)
पटना. बिहार सरकार (Bihar Government ) के पंचायती राज विभाग के प्रधान सचिव अमृतलाल मीणा (Amritlal Meena) ने हाल ही में एक अजीबोगरीब बयान दे डाला है. उन्होंने कहा है कि जिन पंचायत प्रतिनिधियों ने राज्य सरकार की नल-जल योजना का काम पूरा नहीं किया है, उनके चुनाव लड़ने पर रोक लग सकती है. किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में आज तक ऐसा नहीं हुआ था कि कोई अधिकारी जनप्रतिनिधियों के सामने यह शर्त रखे कि चूंकि आपने हमारा दिया काम पूरा नहीं किया है, इसलिए आप चुनाव नहीं लड़ सकते. चुनावों में राजनेता जरूर लोगों से कुछ वादे करते हैं, मगर यह कभी नहीं होता कि अगर चयनित प्रतिनिधि ने अपने वादों को पूरा नहीं किया तो उन्हें चुनाव लड़ने से रोक दिया जाये.

फर्ज कीजिये कि अगर ऐसा ही आदेश सांसदों, विधायकों, मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और यहां तक कि प्रधानमंत्री तक के लिए जारी कर दिया जाये तो क्या होगा? केंद्र और राज्य के कितने नेता ऐसे हैं, जो हर टर्म में अपना काम पूरा कर लेते हैं? मगर उन्हें कोई कुछ कह नहीं सकता, पंचायत के प्रतिनिधि चूंकि लोकतंत्र (Democracy) की सबसे निचली सतह के प्रतिनिधि हैं, इसलिए एक अधिकारी उन्हें ऐसे बयान देकर डिक्टेट कर लेता है. मगर क्या यह बयान लोकतंत्र की भावना और पंचायती राज के स्वप्न के अनुकूल है?

हालांकि, अभी राज्य के पंचायती राज विभाग इस संबंध में कोई आधिकारिक आदेश जारी नहीं किया है, प्रधान सचिव महोदय के इस बयान को पंचायत प्रतिनिधियों को दी गयी धमकी के तौर पर ही देखा जा रहा है. मगर यह बयान कुछ ऐसा ही है, जैसे किसी ठेकेदार को दी गयी धमकी कि आप अपना काम समय से पूरा कर लें, वरना आपके टेंडर डालने पर रोक लगा दी जायेगी.

सीएम की महत्वाकांक्षी योजना

दरअसल, नल जल योजना के तहत राज्य के हर घर में नल का जल पहुंचाने की यह योजना बिहार सरकार की और खास तौर पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की महत्वाकांक्षी योजनाओं में से एक है. राज्य सरकार इस योजना को किसी भी तरह 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव से पहले सफलतापूर्वक पूरा करना चाहती थी, ताकि चुनाव में इसका लाभ लिया जा सके. पंचायतों और नगर निकायों को इसे लागू करने वाली एजेंसी बना दिया गया था. कई वजहों से यह योजना समय से पूरी नहीं हो पायी और चुनाव में यह बैकफायर कर गयी. इस वजह से राज्य सरकार पंचायत प्रतिनिधियों से नाराज चल रही है. वे इसका बदला अप्रैल-मई, 2021 में होने वाले पंचायत चुनाव में निकालना चाह रही है. यह बयान उसी की प्रतिक्रिया है. मगर नाराज सरकार पंचायत प्रतिनिधियों से ठेकेदारों जैसा बर्ताव कर रही है. मगर क्या मुखिया और वार्ड सदस्य महज ठेकेदार हैं, सरकारी योजनाओं को लागू कराने की एजेंसी, क्या पंचायती राज व्यवस्था इसी मकसद से लागू की गयी थी?

अगर पंचायती राज कानूनों का ठीक से अध्ययन किया जाये तो इसे एक स्वायत्त सरकार की शक्तियां दी गयी हैं. जिस तरह दिल्ली में केंद्र सरकार है और राज्य में राज्य सरकार. उसी तरह गांवों में एक अलग और स्वायत्त पंचायत सरकार की कल्पना की गयी है. जिस तरह केंद्र सरकार राज्य के अंदरूनी मामलों में एक हद तक हस्तक्षेप नहीं कर सकती, उसी तरह राज्यों को भी पंचायतों के काम-काज में बहुत हस्तक्षेप नहीं करना है. जैसे केंद्र में लोकसभा है, राज्यों में विधानसभा, उसी तरह पंचायतों में ग्राम सभा की व्यवस्था है, जो स्थानीय जरूरतों के हिसाब से अपनी योजनाएं बनायेगी और उसे लागू करेगी. उसे अपने क्षेत्र में कर संग्रह के द्वारा राजस्व अर्जित करने के भी अधिकार हैं. इस व्यवस्था के पीछे गांधी जी के ग्राम स्वराज की परिकल्पना है. गांधी जी चाहते थे कि भारत गांवों का संघ बने. हर गांव में लोग अपने नजरिये से अपनी योजनाएं तैयार करें और उसे लागू करें. मगर शुरुआत से ही पंचायत में राज्य सरकारें हस्तक्षेप करती रहीं. उन्हें कभी स्वायत्त शासन इकाई बनने नहीं दिया.

हर पंचायत में लागू हुई नल-जल योजना

अभी भी बिहार में ग्रामसभा की बैठकें औपचारिक तरीके से ही होती हैं. उनका एजेंडा भी राज्य सरकार के अधिकारी तय करते हैं और वे ही वहां बैठकर उसे अक्षरशः लागू कराते हैं. इसी वजह से पूरे राज्य की ग्रामसभाएं हमेशा एक जैसे फैसले लेती हैं और उसे लागू कराती हैं. नल जल योजना भी इसी का प्रत्यक्ष उदाहरण है. राज्य की हर ग्रामसभा में इसका प्रस्ताव पारित हुआ है और एक ही पैटर्न पर हर पंचायत में इसे लागू कराया गया है. किसी ग्रामसभा में यह तय नहीं हुआ कि हमें नल का पानी नहीं पीना है, या हम इसका किराया प्रति माह 30 रुपये नहीं दे सकते. पंचायत प्रतिनिधियों ने इस फैसले में कोई योगदान नहीं दिया. वे बस मिले फंड को तय एजेंसी की मदद से खर्च करते रहे. इससे भ्रष्टाचार जरूर बढ़ा मगर गांव के सरकार की स्वायत्ता खत्म हो गयी.

अफसरों के साझीदार बने जनप्रतिनिधि


सिर्फ इसी योजना की बात नहीं है. मुखिया और वार्ड सदस्य अपने इलाके के लिए कभी कोई योजना खुद नहीं बनाते. उन्हें राज्य या केंद्र की योजनाओं को लागू करने के लिए फंड मिल जाता है और वे उसे बस लागू कराते हैं. इसलिए उनकी हैसियत ठेकेदारों के जैसी हो गयी है. इस वजह से हम पाते हैं कि राज्य के ज्यादातर मुखिया या वार्ड सदस्य के प्रति उसके क्षेत्र में कोई सम्मान का भाव नहीं है. उनके हिस्से में बस भ्रष्टाचार के जरिये कमाया हुआ धन भर आता है. वे अपने समाज के, अपने गांव के लीडर नहीं बन पाये हैं. वे एक तरह से अपने इलाके में राज्य और केंद्र सरकार के एजेंट भर हैं. पहले जो काम प्रखंड विकास पदाधिकारी और उसकी टीम अकेले करती थी, अब उसमें मुखिया और दूसरे पंचायत प्रतिनिधि साझीदार हो गये हैं.

स्वराज की भावना के प्रतिकूल सिस्टम


यह सिर्फ राज्य या केंद्र सरकार की गलती नहीं है, इसमें पंचायत प्रतिनिधियों की भी बड़ी चूक है. वे अपने अधिकारों के प्रति कभी सचेत नहीं हुए. कुछ एक उदाहरणों को छोड़ दिया जाये तो ज्यादातर प्रतिनिधियों ने अपने पद का इस्तेमाल कभी अपने पंचायत को एक स्वायत्त इकाई के रूप में विकसित करने में नहीं किया. उन्होंने खुद ही यह विकल्प चुना कि वे सरकारी योजनाओं को लागू करने की एजेंसी की तरह बन जायेंगे. ठेकेदार बन जायेंगे. क्योंकि इसमें कमाई के अवसर थे. इसी वजह से अब राज्य में पंचायत प्रतिनिधि के चुनाव में भी लोग खूब पैसे खर्च करते हैं. अब तक वार्ड सदस्य के ज्यादातर पद निर्विरोध चुने जाते थे, इस बार उसमें भी खूब पैसे खर्च होने वाले हैं, क्योंकि नल जल योजना और नाली गली योजना जैसे प्रोजेक्ट ने उनके लिए भी अवैध कमाई के रास्ते खोले हैं. मगर यह सिस्टम न लोकतंत्र के लिए ठीक है, न ग्राम स्वराज की भावना के अनुकूल. यह व्यवस्था तभी बेहतर मानी जायेगी जब मुखिया और वार्ड सदस्य अपने क्षेत्र के लीडर होंगे, अभी तो उन्हें ठेकेदार बनाकर रख दिया गया है. (डिस्क्लेमर : ये लेखक के निजी विचार हैं)
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First published: February 28, 2021, 1:23 PM IST
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