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Opinion: क्या कोरोना की दूसरी लहर को झेल पायेगा बिहार?

Bihar COVID-19: चुनाव घोषणा के काफी पहले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (CM Nitish Kumar) ने आरटी-पीसीआर टेस्ट की संख्या को बढ़ाकर रोजाना 20 हजार करने की हिदायत सूबे के सेहत महकमे को दी थी, मगर आज तक स्वास्थ्य विभाग को उस लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाया है.

Source: News18 Bihar Last updated on: December 1, 2020, 1:41 PM IST
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Opinion: क्या कोरोना की दूसरी लहर को झेल पायेगा बिहार?
राजधानी पटना में इस वक्त एक्टिव 2022 मरीजों में से सिर्फ 97 अस्पतालों में भर्ती हैं. (PTI)

पटना. बिहार (Bihar) में भीड़भाड़ भरी चुनावी रैलियों का दौर बीत गया है. देश के स्वास्थ्य विभाग ने कोरोना (Corona) के दूसरे लहर के आने की घोषणा कर दी है. इस बीच बिहार सरकार के सेहत महकमे का अमला बार-बार 97 फीसदी रिकवरी रेट और रोजाना एक लाख सैंपल के जांच के दावे कर यह जताने की कोशिश कर रहा है कि यहां सब ठीक-ठाक है. मगर इन दावों के बीच यह सवाल हर किसी के मन में है कि क्या सचमुच बिहार में कोरोना को लेकर सब खैरियत है? क्या बिहार सरकार के दावे सचमुच भरोसे के काबिल हैं? यह अविश्वास इसलिए भी है, क्योंकि पिछले अनुभव यही बताते हैं कि डॉक्टरों और नर्सों की भारी कमी झेलने वाला बिहार सरकार (Government Of Bihar) का सेहत महकमा किसी भी क्रिटिकल मामले का मुकाबला सक्षम साबित नहीं होता है.


यह सच है कि राज्य में पिछले एक हफ्ते से अधिक समय से रोजाना एक लाख से अधिक कोरोना के सैंपल जांच किये जा रहे हैं और सरकारी आंकड़ों के मुताबिक कोरोना संक्रमित मरीजों के स्वस्थ होने की दर 97.06 फीसदी पहुंच गयी है. मगर एक आंकड़ा जिसकी चर्चा बहुत कम हो रही है, वह यह है कि राज्य में अभी भी कोरोना जांच की सबसे सटीक तकनीक आरटी-पीसीआर विधि से बहुत कम जांच हो रही है. अभी भी 90 फीसदी से कोविड टेस्टिंग एंटीजन विधि से हो रही है, जिसे रैपिड टेस्ट भी कहा जाता है और जिसके जरिये बहुत जल्द रिजल्ट मिल जाता है. मगर विशेषज्ञ इस विधि में गलती की गुंजाइश मानकर चलते हैं. बताया जाता है कि इस विधि से टेस्टिंग में बड़े पैमाने पर फाल्स निगेटिव रिपोर्ट आते हैं.


अभी भी उसको लेकर घोषणाएं ही हो रहीं
बिहार में अभी भी रोजाना सिर्फ 12 हजार लोगों की जांच कोरोना जांच की सबसे सटीक विधि आरटी-पीसीआर के जरिये हो रही है. यह रोजाना होने वाले कुल जांच का महज 10 फीसदी है. चुनाव घोषणा के काफी पहले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने आरटी-पीसीआर टेस्ट की संख्या को बढ़ाकर रोजाना 20 हजार करने की हिदायत सूबे के सेहत महकमे को दी थी, मगर आज तक स्वास्थ्य विभाग को उस लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाया है. अभी भी उसको लेकर घोषणाएं ही हो रही हैं.

छह गुना अधिक मरीज कोविड पॉजिटिव
इन दोनों विधि के फर्क को इस बात से भी समझा जा सकता है कि राजधानी पटना में एंटीजन विधि से जितनी जांच हुई है, उसमें सिर्फ 2.5 फीसदी लोग ही कोविड संक्रमित पाये गये, जबकि आरटी-पीसीआर विधि से जांच कराने वालों में 18 फीसदी मरीज कोरोना पाजिटिव थे. इससे जाहिर है कि बिहार में होने वाली जांच की प्रक्रिया से बड़े पैमाने पर लोग छूट जा रहे हैं, कोविड पॉजिटिव भी निगेटिव बता दिये जा रहे हैं और खुद को स्वस्थ मानकर सामान्य जीवन जी रहे हैं. जाहिर है कि स्वास्थ्य विभाग जितने लोगों को कोविड पॉजिटिव बता रहा है, उससे पांच से छह गुना अधिक मरीज कोविड पॉजिटिव हैं. वे खुद भी खतरे की जद में हैं और दूसरों के लिए खतरा बन रहे हैं.


इस बीच राज्य में हुए चुनाव के दौरान सोशल डिस्टेंसिंग तमाम बाध्यताएं टूटीं और लोग खूब एक-दूसरे के संपर्क में आये. राज्य के कई बड़े राजनेता कोविड पॉजिटिव पाये गये. जाहिर सी बात है, जो कोविड पॉजिटिव नहीं हुए उन्हें भी पूरी तरह संक्रमण विहीन नहीं कहा जा सकता. क्योंकि आज की तारीख में कोविड पॉजिटिव होने का पता तभी चल रहा है, जब व्यक्ति कोरोना टेस्ट करवा रहा है.

संक्रमण का खतरा
चुनाव के दौरान राज्य के स्वास्थ्य विभाग ने कोविड पॉजिटिव लोगों के कांटेक्ट की तलाश करना, उनकी जांच कराना, कंटोनमेंट जोन बनाना आदि का काम भी पूरी तरह बंद कर दिया था. ऐसे में कोई भी संक्रमित व्यक्ति बड़ी आसानी से दूसरे को संक्रमित कर सकता था, टेस्ट कम होने और सटीक टेस्ट न होने की वजह से इसका पता भी नहीं चल रहा था कि कौन संक्रमित है औऱ वह कितने लोगों को संक्रमित कर दे रहा है. अब जब कोविड के दूसरे लहर की चेतावनी जारी हुई है तो फिर से कंटेनमेंट जोन बनाने की घोषणा हुई है, हालांकि, उसे राजधानी पटना में भी अभी तक ठीक से लागू नहीं कराया जा सका है. दूर-दराज के इलाकों की तो बात ही छोड़ दी जाये.


कोविड प्रबंधन नीति पर भी सवाल
राज्य में कोविड प्रबंधन की एक और नीति इसके संक्रमण को बढ़ाने में मददगार हो रही है. राज्य में अमूमन पांच फीसदी से भी कम कोविड मरीज इस वक्त अस्पताल में या किसी अन्य तरह के मेडिकल सुपरविजन में हैं. शेष 95 फीसदी लोगों को होम आइसोलेशन में उनके खुद के भरोसे छोड़ दिया गया है. चुनाव की उनकी रेगुलर मॉनिटरिंग भी नहीं के बराबर हो पा रही थी. उनका इलाज भी उनकी अपनी क्षमता पर निर्भर रहा औऱ वे दूसरों को संक्रमित भी करते रहे. इस मामले में अभी तक कोई ठोस बदलाव नहीं हो पाया है.


चिंताजनक हालात
राजधानी पटना में इस वक्त एक्टिव 2022 मरीजों में से सिर्फ 97 अस्पतालों में भर्ती हैं. शेष मरीज होम आइसोलेशन में हैं. जबकि ताजा जानकारी के मुताबिक, अब राज्य के कोरोना संक्रमितों को स्वस्थ होने में औसतन 10 से 12 दिन लग रहे हैं, जबकि पहले यहां के मरीज औसतन पांच से सात दिन में ठीक हो जा रहे थे. पटना में कोरोना मरीजों के उपचार से जुड़े स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों का कहना है कि पहले संक्रमित मरीज खुद-बखुद ठीक हो जाते थे, अब ज्यादातर मरीजों को आइसीयू में भर्ती होने की जरूरत हो रही है. यह एक अलग तरह का खतरा है. इन तमाम खतरों को देखते हुए ऐसा लग रहा है कि कोरोना को लेकर बिहार में आने वाले दिन खतरों से भरे हो सकते हैं.


234 नये मरीज सिर्फ पटना में मिले
बिहार सरकार के स्वास्थ्य विभाग के कल तक के आंकड़ों के मुताबिक, राज्य में अब तक 2,35,159 कोरोना संक्रमित मरीज मिले हैं, जिसमें 2,28,251 स्वस्थ हो चुके हैं. 1259 संक्रमित मरीजों की मृत्यु अब तक कोरोना की वजह से हो गयी है.  इस वक्त राज्य में 5648 मरीज एक्टिव हैं. इनमें दो हजार से अधिक सिर्फ राजधानी पटना में हैं.  रविवार, 29 नवंबर, 2020 को हुई जांच में 606 नये मरीज मिले, जिनमें 234 नये मरीज सिर्फ पटना में मिले. (डिस्क्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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First published: December 1, 2020, 1:41 PM IST
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