कश्मीर कथा- 2: नीलमत पुराण में है कश्मीर के उद्भव का सबसे पुराना किस्सा

कश्मीर को लेकर सबसे प्राचीन पुस्तक है नीलमत पुराण. कल्हण के मुताबिक, ईसा पूर्व 1182 के आसपास अभिमन्यु प्रथम व गोनंद तृतीय के शासनकाल के दौरान चंद्र देव ने इसे संकलित किया. ऋषि कश्यप के पुत्र नीला को इसका रचयिता माना जाता है. इसमें कश्मीरी कर्मकांडों व रीतियों का विवरण है.

Source: News18Hindi Last updated on: August 4, 2020, 5:10 PM IST
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कश्मीर कथा- 2: नीलमत पुराण में है कश्मीर के उद्भव का सबसे पुराना किस्सा
कश्मीर को लेकर सबसे प्राचीन पुस्तक है नीलमत पुराण. कल्हण के मुताबिक, ईसा पूर्व 1182 के आसपास अभिमन्यु प्रथम व गोनंद तृतीय के शासनकाल के दौरान चंद्र देव ने इसे संकलित किया. ऋषि कश्यप के पुत्र नीला को इसका रचयिता माना जाता है. इसमें कश्मीरी कर्मकांडों व रीतियों का विवरण है.
‘दुनिया में बहुत कम क्षेत्र ऐसे मिलेंगे जिनकी किस्मत सरकारों के मामले में कश्मीर से भी खराब रही हो.’ यह बात पिछली सदी की शुरुआत में ब्रिटिश इतिहासकार विंसेट एच. स्मिथ ने लिखी थी। डोगरा शासन के दौरान भूमि बंदोबस्ती के लिए वहां रहे वाल्टर लॉरेंस ने फ्रेंच यात्री विक्टर जैक्मों को उद्धृत करते हुए लिखा है ‘कश्मीर शानदार चौखटे में जड़ी बदसूरत तस्वीर है.’ आज से करीब 800 साल पहले कल्हण पंडित ने ‘राजतरंगिणी’ में कश्मीर का विवरण देते हुए लिखा था, ‘कश्मीर ऊंची पर्वतमालाओं से जड़ा हुआ है और इसे मजबूत सेना की ताकत से भी विजित नहीं किया जा सकता. यहां के लोगों को कोई भय नहीं सताता. वे विश्व कल्याण की भावना से प्रेरित हैं और उन्हें यदि कोई चिंता रहती है तो जगद्भविष्य की. सर्दियों में यहां लोग नदियों के गुनेगुने पानी से नहाते हैं और गर्मियों में नदियों के किनारे ठंडक का आनंद प्राप्त करते हैं. नदियां शांत और खतरनाक जल-जंतुओं से मुक्त हैं. यह वह देश है जहां सूर्य का ताप कोमल है कश्यप के इस स्थान की शोभा को बढ़ाने वाला. तीनों लोक में कैलाश श्रेष्ठ है, कैलाश में हिमालय श्रेष्ठ है और हिमालय में कश्मीर सर्वश्रेष्ठ.’ हाल में, यानी 2018 में आई पुस्तक कश्मीरनामा में अशोक कुमार पांडेय शुरुआत मिरियम वाडिंगटन की कविता ‘कनाडियन' से करते हैं और लिखते हैं, ‘कश्मीर. जमीन का एक ऐसा खूबसूरत टुकड़ा जहां सब एक बार जाना चाहते हैं, मगर जिसकी कहानी कोई नहीं सुनना चाहता.’ वाडिंगटन की कविता इस प्रकार है, ‘हम दिखते हैं भूगोल की तरह लेकिन / बस खुरचो हमें / और बहने लगता है इतिहास…/ हम असली हैं या फिर किसी ने आविष्कार किया हमारा.’

कश्मीर को लेकर सबसे प्राचीन पुस्तक है नीलमत पुराण. कल्हण के मुताबिक, ईसा पूर्व 1182 के आसपास अभिमन्यु प्रथम व गोनंद तृतीय के शासनकाल के दौरान इसको संकलित करने का काम चंद्र देव ने किया. ऋषि कश्यप के पुत्र और नगाओं के प्रमुख नीला को इसका रचयिता माना जाता है. लेकिन इसे 18 पुराणों में स्थान नहीं प्राप्त है. इसमें कश्मीरी कर्मकांडों व रीतियों का विवरण है. साथ ही, कश्मीर के उद्भव, वुलर झील आदि के उद्भव के बारे में कहानियां भी नीलमत पुराण में हैं. कश्मीर के उद्भव का सबसे पुराना किस्सा इसी नीलमत पुराण से लिया जाता है. नीलमत पुराण की शुरुआत में वैश्यंपायन व जन्मेजय का संवाद है. जन्मेजय पूछते हैं कि कश्मीर के राजा को महाभारत युद्ध से दूर क्यों रखा गया? वैश्यंपायन इसके जवाब में एक कथा सुनाते हैं, ‘महाभारत से पहले, मथुरा में यादवों के खिलाफ युद्ध में कश्मीर का राजा गोनंद मारा जाता है. गोनंद जरासंध की ओर से लड़ रहा था. गोनंद का पुत्र दामोदर अपने पिता का बदला लेने की ठानता है. जब उसे पता चलता है कि श्रीकृष्ण स्वयंवर में हिस्सा लेने के लिए गांधार आए हुए हैं तो वह चौहरी सेना के साथ हमला करता है लेकिन श्रीकृष्ण के हाथों मारा जाता है. कश्मीर की पवित्रता की महत्ता को समझते हुए अंतर्यामी श्रीकृष्ण स्वयं कश्मीर आकर दामोदर की गर्भवती पत्नी यशोवती के राज्याभिषेक का आयोजन करते हैं. कुछ दिनों पश्चात यशोवती पुत्रवती हो जाती है. उसका नाम बालगोनंद रखा जाता है. जब महाभारत शुरू हुआ तब बालगोनंद की उम्र बहुत कम थी और इसलिए महाभारत के युद्ध में कश्मीर के राजा को आमंत्रित नहीं किया गया.’

नीलमत पुराण के मुताबिक, वैश्यंपायन कहते हैं कि कश्मीर पार्वती का भौतिक प्रकटीकरण है और इसीलिए श्रीकृष्ण खुद यशोवती के राज्याभिषेक के लिए गए थे. पूर्व मनवंतरों में यहां सतीसरस नाम की एक विशाल झील हुआ करती थी. इस पर जन्मेजय ने सवाल किया कि यह झील मनोहारी घाटी के रूप में परिवर्तित कैसे हुई? वैश्यंपायन ने जवाब देते हुए कहा कि यही सवाल गोनंद ने तीर्थाटन के क्रम में कश्मीर पहुंचे ऋषि वृहदस्व से पूछा था.

नीलमत पुराण में गोनंद और वृहदस्व के बीच संवाद में यह बताया गया है कि कश्मीर अस्तित्व में कैसे आया. कश्मीर का चित्रण करते हुए वृहदस्व बताते हैं कि दक्ष प्रजापति की पुत्री और महर्षि कश्यप की पत्नी कद्रू के पुत्र नगाओं ने कद्रू की बहन विनता व उसके पुत्र को गुलाम बना रखा था. विनता भी महर्षि कश्यप ऋषि की पत्नी थी. विनता के पुत्र गरुड़ ने इंद्र से वरदान प्राप्त किया कि वह नगाओं का भक्षण कर सकेगा. इससे नगाओं का नाश होने लगा. अपने वंश को नाश होता देख नगाओं ने भगवान विष्णु को प्रसन्न कर उनकी मदद से सतीसरस झील में शरण ली और नीला को अपना राजा नियुक्त किया.
अब अगला किस्सा है जलोद्भव का. दरअसल, एक बार देवताओं के राजा इंद्र अपनी पत्नी सची के साथ रमण के लिए कश्मीर आए जहां सची की सुंदरता देखकर संग्रह नाम के एक दैत्य ने सची का बलात्कार करने की कोशिश की. लेकिन वह सची के सौंदर्य में बिंधकर पहले ही स्खलित हो गया और उसका वीर्य सतीसरस के पानी में गिरा. इस वीर्य से जन्मा जलोद्भव. जलोद्भव का लालन-पालन नगाओं ने ही किया. उसने तप करके ब्रह्मा से जल में अभय का वरदान प्राप्त कर लिया. जैसे-जैसे वह बड़ा होता गया, उसमें दैत्यों के सभी गुण आ गये. नगा उससे बहुत त्रस्त हुए. एक बार महर्षि कश्यप तीर्थाटन के लिए हिमालय आए तो नीला उनसे जाकर मिला और जलोद्भव के बारे में बताया. तीर्थाटन खत्म कर महर्षि कश्यप जब देवलोक पहुंचे तो उन्होंने सभी देवताओं को राजी किया. ब्रह्मा, विष्णु व महेश समेत सभी देवता सतीसरस पहुंचे लेकिन जलोद्भव को जल में अभय प्राप्त था. अंत में सतीसरस का पानी बारामुला की तरफ निकाला गया और इस तरह सतीसरस सूख जाने से जलोद्भव मारा गया. इस तरह सतीसरस की भूमि कश्मीर कहलाई और ब्रह्मा, विष्णु व महेश ने अपना निवास यहां बनाया. तो यह एक कथा है कश्मीर के बनने की. और भी कथाएं हैं. उन कथाओं को जानेंगे अगली कड़ी में.  (ये लेखक के निजी विचार हैं)
ब्लॉगर के बारे में
राजेन्द्र तिवारी

राजेन्द्र तिवारीवरिष्ठ पत्रकार

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. अपने लंबे करियर के दौरान इन्होंने देश के प्रतिष्ठित अखबारों में अपनी सेवाएं दी हैं.

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First published: August 4, 2020, 5:10 PM IST
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