दिमाग में शब्दों से पूरा चित्र खींच देने वाले 'रंगबाज' शायर थे राहत इंदौरी

डॉ. राहत इंदौरी (Rahat Indori) को अच्छे से जानने वाले समझ रहे थे कि ‘सूरज को निचोड़’ लेने का दावा करने वाला का कोरोना (COVID-19) क्या बिगाड़ लेगा. हफ्ते भर में ठीक होकर राहत साहेब फिर आ जाएंगे. लेकिन शाम होते होते इस दौर की उर्दू अदब का ये सूरज दुनिया के पार चला गया.

Source: News18Hindi Last updated on: August 12, 2020, 9:06 AM IST
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दिमाग में शब्दों से पूरा चित्र खींच देने वाले 'रंगबाज' शायर थे राहत इंदौरी
राहत इंदौरी का कोरोना संक्रमण के चलते निधन हो गया.
राहत इंदौरी मंच पर जितना बड़ा जादू बिखेरते थे उससे कहीं ज्यादा वजन उनके अशआर में भी रहा है. मुशायरों में वे अक्सर कहा करते थे – ‘गौर से सुनिएगा, पता नहीं कब कोई बड़ा शेर आ जाए.’ और शब्दों का ये जादूगर अपने उसी अंदाज में अनंत यात्रा पर निकल भी लिया. किसी को पता भी नहीं चला. अभी सुबह की ही बात है कि इंदौर से साथी अरुण त्रिवेदी ने खबर दी और ट्विटर पर राहत साहेब की ओर से जानकारी आई – ‘कोरोना हो गया है.’ अपने ही अंदाज में उन्होंने चाहने वालों को ट्विटर पर ताकीद भी की – ‘घर पर फोन मत करिएगा, फेसबुक और ट्विटर से जानकारी मिल जाएगी.’

उन्हें अच्छे से जानने वाले मान रहे थे और शुभकामना कर रहे थे कि ‘सूरज को निचोड़’ लेने का दावा करने वाला का कोरोना क्या बिगाड़ लेगा. हफ्ते दो हफ्ते में ठीक होकर राहत साहेब फिर आ जाएंगे. लेकिन शाम होते-होते इस दौर की उर्दू अदब का ये सूरज दुनिया के पार चला गया.

राहत के जाने की खबर सुन कर बेचैनी में समझ में ही नहीं आ रहा है कि उन्हें याद कैसे किया जाए. किस रूप में उनके बारे में लिखा जाए. एक महबूब शायर के तौर पर. एक बेहद मेहरबान दोस्त या फिर अपनी शर्तों पर जीने और लिखने वाले फनकार के तौर पर. ये सारी खूबियां राहत इंदौरी भरी हुई थीं. डॉक्टर राहत इंदौरी का बड़प्पन ऐसा कि अगर एक बार किसी ने बात कर ली, तो जिंदगी भर नहीं भूल सकता. राहत इंदौरी ने कहा भी है -

खाली कशकोल पे इतराई हुई फिरती है
ये फकीरी किसी दस्तार की मोहताज नहीं.

बेशक फकीर ही थे. कशकोल,भले राहत साहेब कहा करते थे, लेकिन वो भिक्षा-पात्र की जगह दान देने का अक्षय-पात्र था, जिसमें सबके लिए कुछ न कुछ होता था. हर उम्र वालों के सुनने याद करने लायक शेर और मिलने बैठने पर खाने पीने के लंबे दौर. सब कुछ. अपनी इसी फकीराना तबीयत की वजह से बिना दस्तार या बिना किसी ताज के हर महफिल के सरदार खुद ही हो जाते थे.  मेरा परिचय राहत इंदौरी से शुरुआत में तो एक पसंदीदा शायर के तौर पर ही हुआ. बाद में शायर और पत्रकार हसन काजमी के जरिए परिचय गहरा होता गया. एक दफा इंदौर गया और उनके घर नहीं जा सका तो खुद राहत साहेब खाना और दिगर असबाब लेकर स्टेशन आ गए थे. मेरे लिए ये न भूल पाने वाला वाकया है, क्योंकि मुझ जैसे साधारण पत्रकार से मिलने और खाना लेकर ट्रेन तक इतने बड़े शायर का आ जाना बड़ी बात थी, लेकिन उनको नजदीक से जानने वाले बताते हैं कि वे दोस्ती कुछ ऐसी ही करते रहे हैं.

सिर्फ शायरी ही नहीं उसूल भीएक बार उनका बड़प्पन उस वक्त देखने को मिला था जब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी. शायद 2007 का वाकया है. किसी काम से राहत साहेब दिल्ली आए थे. मुशायरा नहीं था. शायद कहीं जाना था, लेकिन होम मिनिस्टर से उन्हें मिलना भी था. श्रीप्रकाश जायसवाल गृहमंत्री थे. 14 अगस्त की तारीख थी. राहत साहेब ने जामा मस्जिद इलाके में दावत दी. शायर और पत्रकार हसन काजमी और पत्रकार पवन अतुल के साथ मैं वहां गया. हालांकि उन्हें हम लोग नोएडा बुलाना चाह रहे थे. उन्होंने कहा – 'आ जाओ, फिर तय करेंगे.' वे पुरानी दिल्ली के ह्वाइट हाउस होटल में ठहरा करते थे. कहते –“सिगरेट और होटल अपनी तबीयत का ही अच्छा लगता है.” साधारण सा होटल था. बैठा गया, बात-चीत और खाने पीने का दौर चल ही रहा था कि पुलिस वाले आ गए. कहने लगे कल यहां लाल किले पर 15 अगस्त का आयोजन होता है होटल खाली करना होगा.

इधर राहत साहेब के लिए हमारी ओर से नोएडा में दावत का इंतजाम किया गया था. हम चाहते भी थे कि वे वहां से नोएडा आ जाएं. पुलिस वालों के साथ हम लोगों ने भी गुजारिश की कि राहत साहेब चलिए नोएडा में आपके लिए शानदार इंतजाम किया गया है. कई बार कहने पर वे मान गए. कहने लगे कपड़े बदल लूं फिर चलता हूं. कपड़े बदलने बाथरूम में गए और उनका मिजाज बदल गया. अड़ गए – “आजादी की पहले वाली शाम मैं क्यों होटल खाली करूं. सिर्फ इसलिए कि ये होटल नयी दिल्ली इलाके में नहीं है. क्या इन लोगों ने नयी दिल्ली के होटल खाली कराए हैं.”  लगा राहत साहेब का ही शेर दिख रहा है –

बहुत गुरुर है तुझको ऐ सिरफिरे तूफान

मुझे भी ज़िद है कि दरया को पार करना है.

राहत साहेब अड़ गए तो अड़ गए. पुलिस वाले पहले तो कड़े रहे, लेकिन कुछ ही देर में वे नरम पड़ गए. समझाने लगे. गुजारिश इल्तिजा करने लगे, लेकिन राहत साहेब नहीं हटे. यानी वे सिर्फ शेर लिखते ही नहीं थे, शेरों को जीते भी थे. उस वक्त से राहत साहेब के लिए मन में इज्जत और बढ़ गई. आज उनके चले जाने पर उनके ना जाने कितने शेर याद आते हैं और दिमाग में उमड़ घुमड़ मचा देते हैं. अपने शुरूआती दौर में उन्होंने पेंटिंग भी की थी. लगता है शायर के तौर पर वे एक ऐसे पेंटर थे जो शब्दों की 'रंगबाजी' करता था. पेंटिंग भी ऐसी जिसमें सबको अपने लिए कोई न कोई रंग  मिल ही जाता था.

सूरज सितारे चांद मेरे साथ में रहे,
जब तक तुम्हारे हाथ मेरे हाथ में रहे
शाखों से टूट जायें वो पत्ते नहीं हैं हम.
आंधी से कोई कह दे कि औकात में रहे
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First published: August 11, 2020, 6:36 PM IST
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