कहीं हमारे घर में तो नहीं छिपे हैं कोविड के केस बढ़ने के कारण?

विश्व स्वास्थ्य संगठन की गाइडलाइन के मुताबिक कोविड से निपटने के लिए साबुन से तीस सेकंड तक हाथ धोना जरूरी है, लेकिन हिंदुस्तान में कोविड आने से पहले तक हाथ धुलाई का हाल भी बहुत बुरा था. सर्वेक्षण के वक्त तक देश में तकरीबन 66 प्रतिशत लोग भोजन करने से पहले साबुन से हाथ धोने के आदी नहीं थे

Source: News18Hindi Last updated on: August 16, 2020, 8:14 AM IST
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कहीं हमारे घर में तो नहीं छिपे हैं कोविड के केस बढ़ने के कारण?
देश में तकरीबन 66 प्रतिशत लोग भोजन करने से पहले साबुन से हाथ धोने के आदी नहीं थे, 61 प्रतिशत लोग केवल पानी से हाथ धोकर काम चला लेते हैं. (फोटो-AP)
मध्य प्रदेश के रायसेन जिले के गौहरगंज की एक मलिन बस्ती में अनिता (परिवर्तित नाम) रहती हैं. वह एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं. कोविड संक्रमण के साथ ही उन्होंने इसके प्रति लोगों को जागरुक करने का काम किया, लेकिन इसी दौरान वह खुद बीमार हो गईं. तेज बुखार और अन्य लक्षणों के चलते उन्हें लगा कि वह भी संक्रमण का शिकार हो गई हैं. अप्रैल महीने में ऐसे इलाकों की टेस्ट की रिपोर्ट आने में चार दिन का वक्त लग रहा था. गौहरगंज जैसे कस्बाई शहरों में तब तक क्वारंटीन करने के भी पर्याप्त इंतजाम नहीं थे. अनिता की रिपोर्ट मिल जाने तक उनका घर में एकांतवास जरुरी था, लेकिन दो कमरे के मकान में पांच सदस्यों के साथ ऐसा संभव नहीं था. अनिता रिस्क के बावजूद घर में रहीं और बैचेनी के साथ रिपोर्ट का इंतजार करते रहीं. सौभाग्य से उनकी रिपोर्ट नेगेटिव आई, लेकिन इस बीच उन्हें अपने पूरे परिवार को एक बड़ी रिस्क में डालना पड़ा. अनिता अकेली ऐसी महिला नहीं हैं.

जब हम कोविड संक्रमण को देखते हैं और अपने घरों की ओर देखते हैं तो हमें घर का महत्व भी समझ आता है और स्वच्छता का भी. सत्तर सालों के विकास के बाद हमें अपनी तंगहाली भी समझ में आती है. जब कोविड संकट ने हमें यह बताया कि इससे बचने के लिए पर्याप्त दूरी रखना है और यदि कोई परिजन ऐसी किसी संदिग्ध अवस्था में आया है जहां कि उसे दूसरों के बचाव के लिए चौदह दिनों तक एकांत की आवश्यकता है, इस परिस्थिति में हमारे पास पर्याप्त स्थान ही उपलब्ध नहीं था.

नेशनल सैम्पल सर्वेक्षण-2018 देश में पर कैपिटा रूम अवेलिबिलिटी के जो आंकड़े पेश करता है वह हमें चौंकाते हैं. सर्वेक्षण के मुताबिक देश में 59.6 प्रतिशत लोगों के पास रहने के लिए एक रूम से भी कम उपलब्ध है. ग्रामीण क्षेत्रों में 66.16 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 45.16 प्रतिशत लोगों के पास रहने के लिए एक कमरे से भी कम का स्थान है. 15.45 फीसदी लोगों के पास पर कैपिटा एक रूम उपलब्ध है. 24.95 फीसदी लोगों के पास एक से ज्यादा रूम उपलब्ध हैं. भारत जैसे देशों में जहां आर्थिक गैरबराबरी की खाई बहुत गहरी हो, वहां इन आंकड़ों पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए.

घर के साथ सैनिटेशन का मसला भी जुड़ा हुआ है. एनसएएसओ के मुताबिक ही 33 प्रतिशत घरों में पीने का पानी उन्हें 200 मीटर से लेकर डेढ़ किलोमीटर तक की दूरी से ढोकर लाना पड़ता है, पानी ढोने का काम 73 प्रतिशत घरों में महिलाओं के जिम्मे है. केवल 39 प्रतिशत घरों में पीने का पानी उपलब्ध है. 33 प्रतिशत घरों में बाथरूम और 28 फीसदी घरों में शौचालय नहीं है. दस प्रतिशत भवनों में एक ही कॉमन बाथरूम और 7 प्रतिशत शौचालयों का इस्तेमाल वहां रहने वाले सभी परिवार करते हैं.
विश्व स्वास्थ्य संगठन की गाइडलाइन के मुताबिक कोविड से निपटने के लिए साबुन से तीस सेकंड तक हाथ धोना जरूरी है, लेकिन हिंदुस्तान में कोविड आने से पहले तक हाथ धुलाई का हाल भी बहुत बुरा था. सर्वेक्षण के वक्त तक देश में तकरीबन 66 प्रतिशत लोग भोजन करने से पहले साबुन से हाथ धोने के आदी नहीं थे, 61 प्रतिशत लोग केवल पानी से हाथ धोकर काम चला लेते हैं, एक फीसदी लोग ऐसे भी पाए गए जिन्हें हाथ धुलाई उचित नहीं लगती है. 26 प्रतिशत लोग शौच के बाद साबुन से हाथ नहीं धोते, 13 प्रतिशत राख से हाथ धाते हैं, और 12 प्रतिशत केवल पानी से हाथ धोकर काम चला लेते हैं. पर ऐसा क्यों है ? क्या जागरुकता की कमी है, या उनके पास ऐसे बेहतरीन आवास नहीं हैं, जिसकी वजह से वह एक स्वच्छ जीवन व्यवहार अपनाने से वंचित हो जाते हैं. क्या देश में सभी परिवारों के पास रहने के एक बेहतर आवास, जिसमें साफ—सफाई, हवा रोशनी, पानी, बिजली के सारे इंतजाम हों, जहां वह एक बेहतरीन जीवन अपना सकें. दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हो पाया है.

हम देखते हैं कि हमारी धार्मिक जीवन पदधतियों में साफ—सफाई को पर्याप्त इज्जत दी गई है. घर में, मंदिर में, मस्जिद में, गुरुद्वारों में यह आदतें अनिवार्य रूप से शामिल रही हैं. महात्मा गांधी ने सौ रुपए की लागत से जब अपना सेवाग्राम आश्रम में अपने घर का निर्माण किया तो वहां भी इस बात का खास ख्याल रखा गया. बापूकुटी में हवा, पानी, रोशनी, सैनिटेशन और स्वच्छता और पर्यावरण के तमाम पहलुओं को ध्यान में रखकर निर्माण करवाया, जिसका आवास की जरूरत के संबंध में एक बड़ा संदेश है. पर हम इस मकसद को पूरा करने में लगातार असफल होते रहे.

तो क्या इसको यह मानना चाहिए कि आजादी के बाद से अब तक हमने अपने घरों की जरूरत पर ध्यान नहीं दिया है ? नहीं, ऐसा कहना एकदम सही नहीं होगा. पिछले सत्तर सालों में देश की आबादी चालीस करोड़ से बढ़कर आज 130 करोड़ के आसपास पहुंच रही है. इस मान से मांग भी बढ़ती चली गई और उसकी पूर्ति भी.
शुरुआत के सालों में सरकार ने आवास की बुनियादी जरुरत को पूरा करने का काम खुद ही इसको अपने हाथ में लिया और पंचवर्षीय योजनाओं के एजेंडे में इसे भी एक बिंदु के रूप में शामिल किया जाता रहा. केन्द्र और राज्यों की जिम्मेदारी को लेकर भी स्थिति स्पष्ट नहीं थी, इसलिए केन्द्र सरकार ने शहरों में सब्सीडाइज्ड हाउसिंग स्कीम फॉर इंडस्टियल वर्कर्स (1952) लो इंकम ग्रुप हाउसिंग स्कीम (1953) मिडिल इंकम ग्रुप हाउसिंग स्कीम (1959) स्लम क्लियरकेंस एंड इम्प्रूपवमेंट स्कीम (1956) जैसी योजनाओं के जरिए शहरी लोगों को मकान की जरूरतों को पूरा किया वहीं राज्य सरकारों ने ग्रामीण इलाकों में जिम्मेदारी उठाई. इसके लिए केन्द्र ने नेशनल बिल्डिंग आर्गनाईजेशन (1954) टाउन एंड कंट्री प्लानिंग आर्गनाइजेशन (1962) जैसी संस्थाएं बनाई, वहीं राज्यों की ओर से हाउसिंग बोर्ड के जरिए लोअर इंकम ग्रुप को फोकस्ड करते हुए काम किया. शहरों के मास्टर प्लान तैयार हो सकें और उनका व्यवस्थित विकास हो सके इसकी कवायदें भी हुईं, इसके लिए खासकर बड़े शहरों की अलग एजेंसिंयां भी बनाई गईं. दिल्ली डेवलपमेंट अथॉरिटी बोर्ड (1957) देश की पहली ऐसी एजेंसी थी, इसके बाद अन्य शहरों के लिए भी ऐसी ही एजेंसियां बनाई गईं. सत्तर के दशक में पहली बार इसे इकॉनोमी के नजरिए से देखा गया और उसके प्रमोशन के लिए हाउसिंग एंड अरबन डेवलमेंट कॉरपोरेशन (1970) जैसी संस्थाएं बनीं.

सन 1980 से 2000 के बीच उदारीकरण का दौर शुरू होता है जिसकी आर्थिक नीतियों का साफ असर हाउसिंग सेक्टर पर दिखाई दिया. इस दौरान हाउसिंग में प्राइवेट प्लेयर्स ने अपनी भूमिका निभानी शुरू की. वहीं 1985 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने इंदिरा गांधी के नाम से इंदिरा आवास योजना को लांच किया. इसके केन्द्र में गरीब और लोअर क्लास के लोग थे.


2015 में नरेन्द्र मोदी ने सब के लिए आवास के लक्ष्य के साथ प्रधानमंत्री योजना को लांच किया, जिससे लोगों के घरों का सपना पूरा हो पा रहा है. इसमें शहरी क्षेत्रों में 112 लाख घरों को बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है. पिछले साल के अंत तक 103 लाख घरों को स्वीकृत किया जा चुका है. 32 लाख घर पूरे करके लोगों को दिए जा चुके हैं जबकि साठ लाख घर बनाने का काम प्रगति पर है.जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में भी एक करोड़ से ज्यादा घरों को पूर्ण किया गया है. आने वाले सालों में तकरीबन इतने ही मकान और बनने जा रहे हैं.

सतत विकास लक्ष्य- 11 के अंतर्गत शहरों के टिकाऊ विकास, और बेहतर आवास के साथ समुदायों की सुरक्षा का लक्ष्य रखा गया है. इस लक्ष्य के तहत वर्ष 2030 तक भारत में सभी को आवास और बेहतर सेनीटेशन सुविधाएं और मलिन बस्तियों को अपग्रेड करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है. इस नजरिए से आने वाले दस साल हिंदुस्तानियों के जीवन में गुणवत्तापूर्ण जीवन का लक्ष्य पाने के लिए महत्वपूर्ण होंगे, विकास के इन सालों में पर्यावरणीय नजरिए से भी बहुत भार पड़ने वाला है. ऐसा अनुमान है कि 2030 तक आवासीय क्षेत्र 2017 की तुलना में दोगुना हो जाएगा. इस परिस्थिति में उर्जा की खपत में भी भारी बढ़ोत्तरी होने वाली है. आज रिहायशी भवनों में कुल देश की बिजली खर्च का हिस्सा तकरीबन 25 प्रतिशत होता है, यह बढ़कर 37 प्रतिशत तक हो जाएगा. इसके लिए जरुरी होगा कि रिहायशी भवनों को ऐसे डिजाइन किया जाए जिनमें कम से कम बिजली की खपत हो. इसके लिए 2018 में इको निवास संहिता का एक मॉडल बिल्डिंग कोड दिया गया है. हमें भविष्य की इमारतों में इस कोड में दी गई तीन प्रमुख बातों, बेहतर प्राकृतिक वेंटीलेशन, बिजली की बचत और पर्याप्त प्रकाश की उपलब्धता के सिदधांतों को कड़ाई से पालन करवाना चाहिए. यह सिदधांत केवल उर्जा बचाने के नजरिए से ही नहीं, बल्कि अब कोविड 19 के संदर्भ में किसी भी संक्रमण या बीमारी की अवस्था से सुरक्षित रहने के लिए भी प्रासंगिक हो गए हैं.
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First published: August 16, 2020, 8:07 AM IST
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