बलिदान दिवस : क्या देश एक पवित्र राह चुनेगा?

बीते गणतंत्र दिवस पर किसान आंदोलन में ट्रैक्टर रैली के दौरान हुई हिंसा की घटनाओं के संदर्भ में सोचें तो यह समझ आता है कि सत्य और अहिंसा ही वह माध्यम हैं, जिससे किसी आदर्श समाज का निर्माण होता है.

Source: News18Hindi Last updated on: January 30, 2021, 10:52 AM IST
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बलिदान दिवस : क्या देश एक पवित्र राह चुनेगा?
किसान आंदोलन (फाइल फोटो)

क्या राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के बलिदान दिवस पर उनकी अहिंसा की राह और अधिक प्रासंगिक हो गई है ? बीते गणतंत्र दिवस पर किसान आंदोलन में ट्रैक्टर रैली के दौरान हुई हिंसा की घटनाओं के संदर्भ में सोचें तो यह समझ आता है कि सत्य और अहिंसा ही वह माध्यम हैं, जिससे किसी आदर्श समाज का निर्माण होता है. अहिंसा ही समाज में स्थायित्व लाती है और अंततः जीतती भी वही है. गांधी लिखते भी हैं ‘हिंसा की सीमा है, लेकिन अहिंसा की कोई सीमा नहीं है, और इसीलिए यह अपराजेय है.’


26 जनवरी को देश में जिस तरह की हिंसक घटनाएं सामने आईं, वह अस्वीकार्य हैं. साथ ही यह भी तय हुआ कि देश की अस्मिता के प्रतीक लाल किले पर तिरंगे के अलावा किसी भी रंग का झंडा हमें स्वीकार नहीं. देश इस बात के लिए भी आश्वस्त हो सकता है कि किसी भी सूरत-ए-हाल में लाल किले (और उस जैसी ऐतिहासिक और संवैधानिक इमारतों पर) केवल और केवल तिरंगा ही लहराता रहेगा. इस घटना ने दो माह से चल रहे किसान आंदोलन को पहली बार बैकफुट पर ला दिया, कारण हिंसा. तमाम खिलाफ बातों के बाद भी यह आंदोलन इससे पहले तक इसलिए सिर उठाकर खड़ा हुआ था, क्योंकि उसे महात्मा के दिखाए अंहिसा के रास्ते पर आगे बढ़ाया जा रहा था, यही इसकी सबसे बड़ी ताकत भी थी.


देश में जब भी और जहां भी हिंसा के जरिए आंदोलन हुए हैं उन्हें जनमानस में स्वीकार्यता नहीं मिली है, उनकी अवधि बहुत कम रही है, जबकि इसी देश में नर्मदा बचाओ आंदोलन पिछले चार- दशकों से अनवरत रूप से उसी अहिंसा और सत्याग्रह के रास्ते चला है, नर्मदा बचाओ आंदोलन पर हिंसा करने का एक भी आरोप नहीं है, जबकि पीड़ितों के घर बार, खेत खलियान तक डूब गए. अपेक्षित परिणामों के बारे में सवाल किया जा सकता है, कि आखिर चार दशकों के बाद भी उन लोगों को क्या मिला, वे कहां तक सफल रहे ? पर क्या इतना लम्बा संघर्ष अपने-आप में सफलता नहीं है ! खैर, वह विषय अलग है.


किसान आंदोलन ने एक बार फिर अहिंसा शब्द को प्रासंगिक बना दिया है. इस बार इस अहिंसा शब्द को हमने उन लोगों से भी सुना, जो हमेशा एक किस्म की हिंसा की बात करते रहे हैं. संवैधानिक मूल्यों को अपनी सुविधा से इस्तेमाल करते हैं, इसके बावजूद उन्हें मानना पड़ा कि अहिंसा ही वह हथियार है जिससे अपने शत्रु को स्थायीभाव से पराजित किया जा सकता है.

अहिंसा की ताकत इतनी बड़ी है, और इस ताकत को अपनाकर एक व्यक्तित्व इतना विराट हो सकता है इसका एक उदाहरण ऐसे भी समझ सकते हैं कि गांधी के सेवाग्राम आश्रम में एक अंग्रेज वायसराय आजू-बाजू खटिया लगाकर सो सकते हैं. जिसकी दम पर महात्मा गांधी चंपारण में निलहा किसानों के साथ एक ऐसा संबंध स्थापित कर लेते हैं, जिसे वह ईश्वर से संबंध स्थापित करने के बराबर बताते हैं. गांधी अहिंसा को एक आदर्श स्थिति तक ले जाते हैं वहीं सरदार पटेल इस विषय पर बार बार असहमत भी होते हैं. गांधी अहिंसा को लेकर किसी भी तरह के समझौते के लिए तैयार नहीं होते, वहीं पटेल भी यथार्थवादी होकर मुखर होते हैं, वह उसे छिपाते नहीं. 19 मार्च 1940 को दिए अपने भाषण में सरदार पटेल ने यह साफ किया कि मौजूदा परिस्थितियों में अहिंसा का पूर्ण रूप से व्यवहार करना संभव नहीं है. उनका मानना था कि जब तक संपूर्ण विश्व अहिंसा को नहीं अपना लेता तब तक इसे अपनाना एक आदर्श बना रहेगा.


आज हम देख ही रहे हैं कि किस तरह से हमारे आसपास एक हिंसक वातावरण है अथवा उसे तैयार किया जा रहा है. हमारी भाषा किस तरह से हिंसक हो चुकी है, हमें तमाम मीडिया के माध्यम से किस भयंकर हिंसा का सामना करना पड़ रहा है. हम अपने विचारों और उससे जुड़ी असहमतियों को लेकर इस कदर क्रूर हो गए हैं कि सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर लोगों में तलवारें खिंची रहती हैं. ऐसे दौर में हम यदि केवल एक पक्ष से अहिंसा की उम्मीद करते हैं तो उसमें कोई न कोई खामी रह ही जाती है. अंहिसा पूरी तरह से अंहिसा तभी हो सकती है जब वह पूर्ण रूप से पूर्ण समाज के द्वारा अपनाई जाए. वह दिखावे के लिए नहीं हो. उस पर श्रद्धा और विश्वास हो. थोड़ा सोचियेगा कि क्या हम एक अहिंसक समाज की रचना कर रहे हैं ?


किसान आंदोलन में अपनाई गई अहिंसा भी रणनीतिक अहिंसा ज्यादा लगती है, (तो भी अच्छी है) उसके व्यवहार को कोई माडल हमारे समाज ने बीते साठ-सत्तर सालों में नहीं अपनाया है. हम केवल अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए उसका उपयोग करने लगे हैं!

लेकिन दूसरी तरफ यह भी कैसे हो सकता है कि बीते दो महीने में दिल्ली की सीमाओं पर सौ से अधिक किसानों की मौतें हो जाती हैं और हम चुप रहते हैं, क्योंकि वह हमारे एक निर्णय से असहमत हैं ! पर यह भी कैसे हो सकता है कि तीन सौ से अधिक पुलिसवालों पर हुई हिंसा को जायज बताने लग जाएँ! यदि मनुष्यता के मूल्यों में हमारा भरोसा है तो या तो हम अहिंसा को पूरी तरह मानेंगे या नहीं मानेंगे. हमें यह भी समझना होगा कि अब अंग्रेजों का राज नहीं है. यह एक चुना हुआ लोकतंत्र है, इसलिए न तो किसान सरकार के दुश्मन है और न ही सरकार को किसानों को अपना दुश्मन मानकर उनकी असमहतियों पर बिजली-पानी काट देना चाहिए. यह उसी देश में हो रहा है जहां बापू से बात करने के लिए अंग्रेज वायसराय सेवाग्राम आश्रम में टेलीफोन की हाटलाइन लगवा देता है ताकि वह बापू से संवाद कर सके.


जब बापू और अंग्रेज में संवाद हो सकता है, तो किसानों और सरकार में क्यों नहीं? संवाद के लिए विश्वास जरूरी है और विश्वास के लिए सुचिता. यदि लक्ष्य पवित्र हो तो अविश्वास को समाप्त किया जा सकता है. विश्वास तब बनेगा जब आप उनके पास सरदार पटेल की तरह जाएंगे. एक बार गांधी जी ने सरदार पटेल को तार भेजकर कानपुर अथवा बनारस में उनसे मिलने को कहा सरदार पटेल ने उन्हें यह कहते हुए मना कर दिया कि उनका पहला दायित्व और कर्तव्य गुजरात के किसानों के प्रति है, उन्हें वहां पहले जाना चाहिए. सरदार ने यह भी कहा मैं गुजरात अपने उन लोगों के बीच, किसानों के बीच वापस जा रहा हूं, उन किसानों के बीच, जिन्होंने इतना कष्ट सहा है और देश के हित के लिए वह सब कुछ न्योछावर कर दिया है, जो उनके पास था, ताकि मैं उनमें आशा और विश्वास पैदा कर सकूं.


आज बापू के बलिदान दिवस पर क्या देश एक पवित्र राह चुनेगा ?


(डिस्क्लेमर: यह लेखक के निजी विचार हैं) 



(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
राकेश कुमार मालवीय

राकेश कुमार मालवीयवरिष्ठ पत्रकार

20 साल से सामाजिक सरोकारों से जुड़ाव, शोध, लेखन और संपादन. कई फैलोशिप पर कार्य किया है. खेती-किसानी, बच्चों, विकास, पर्यावरण और ग्रामीण समाज के विषयों में खास रुचि.

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First published: January 30, 2021, 10:49 AM IST
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