संसार की सबसे बड़ी त्रासदी और कोई एक मिनट जेल भी न गया!

ठीक है कि यदि सजा नहीं भी मिल पाई और इस कंपनी का तत्कालीन कर्ताधर्मा वारेन एंडरसन अब सजा पाने के लिए इस दुनिया में मौजूद नहीं है, पर क्या इसके कचरे पर और इससे होने वाले दुष्प्रभावों पर कोई ठोस निर्णय लिया जा सकता है, ताकि आने वाले वक्त में भोपाल की पीढ़ियां सेहतमंद हो सकें. हम सभी ने देखा है और इस बात के आंकड़े भी प्रस्तुत किए गए हैं कि अन्य लोगों की तुलना में कोरोना जैसी महामारी का असर भी यहां पर ज्यादा हुआ है.

Source: News18Hindi Last updated on: December 3, 2021, 1:32 PM IST
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संसार की सबसे बड़ी त्रासदी और कोई एक मिनट जेल भी न गया!

रात के कुछ घंटों में हजारों लोगों को मौत के आगोश में हमेशा के लिए सुला देने वाली संसार की सबसे भीषणतम त्रासदी का सबसे बड़ा दुख क्या है? वह यह है कि इस त्रासदी के सैंतीस बरस गुजर जाने के बाद भी कोई व्यक्ति इसके लिए दोषी न ठहराया जा सका, कोई अपराधी एक मिनट के लिए जेल न गया, इसके सबसे बड़े गुनहगार को भारत की अदालतों के कठघरे में खड़ा न किया जा सका, और तो और इस त्रासदी की कानूनी और नैतिक जिम्मेदारियों को न समझकर पूरा का पूरा जिम्मा राज्य सरकार पर ही छोड़ दिया गया.


भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया है, वह पिछले सैंतीस बरस से हर दिन खुद से जुड़ा हुआ एक ज्वलंत सवाल कर रहे हैं, लेकिन अब उनकी सुनने वाला भी कोई नहीं है.


रशीदा बी एक लंबे समय से भोपाल गैस पीड़ितों के हक की लड़ाई लड़ रही हैं, वह कहती हैं कि हम चाहते हैं कि दुनिया को पता चले कि विश्व के सबसे भीषण औद्योगिक हादसे के 37 साल बाद भी भोपाल गैस पीड़ितों को न्याय से अब तक वंचित रखा गया है, हमें यह बताते हुए खेद हो रहा है कि किसी भोपाली को पर्याप्त मुआवजा नहीं मिला है और आज तक कोई भी अपराधी एक मिनट के लिए भी जेल नहीं गया है. बात सही भी है, आखिर क्या कारण है कि किसी भी पार्टी की सरकारों ने इस भयंकरतम त्रासदी के गुनहगारों के प्रति नरम रवैया रखा है.


2014 से भोपाल जिला अदालत द्वारा डाव केमिकल कंपनी को 6 बार हाज़िर होने का आदेश जारी किया गया है और हर बार कंपनी ने उसे अनसुना कर दिया है. ऐसे में एक कठिन निर्णय लेकर एक ऐसा संदेश देने की जरुरत है कि कोई भी कंपनी हमारे देश में आकर पर्यावरणीय और मानवीय विनाश की जुर्रत न कर सके, होना यह चाहिए कि भारतीय अदालत के आदेश का पालन न करने वाली अमरीकी कंपनी को केंद्र और प्रदेश की सरकारें भारत में व्यापार प्रतिबंधित कर दें?


यह और भी जरुरी हो जाता है जबकि हजारों टन जहरीला कचरा अब भी इस खूनी कारखाने के पेट में भरा पड़ा है, जो भोपाल शहर की 41 बस्तियों तक फैल चुका है. पानी में मिलकर यह धीरे-धीरे और लोगों को भी अपनी चपेट में ले रहा है, इस पर तमाम अध्ययन और रिपोर्ट हैं, पर उन पर पड़ी धूल को साफ कौन करे और क्यों करे?


भोपाल गैस पीड़ित महिला पुरुष संघर्ष मोर्चा की शहजादी बी कहती हैं कि अस्पतालों में भीड़, संभावित हानिकारक दवाओं का बेहिसाब और अंधांधुंध इस्तेमाल और मरीजों की लाचारी वैसी ही बनी हुई है जैसी हादसे की सुबह थी. आज यूनियन कार्बाइड की गैसों के कारण फेफड़े, हृदय, गुर्दे, अंत:स्त्रावी तंत्र, तंत्रिका तंत्र और रोग प्रतिरोधक तंत्र की पुरानी बीमारियों के लिए इलाज की कोई प्रामाणिक विधि विकसित नहीं हो​ पाई है, क्योंकि सरकार ने हादसे के स्वास्थ्य पर प्रभाव के सभी शोध बंद कर दिए हैं और यूनियन कार्बाइड कंपनी ही है जिसके पास स्वास्थ्य संबंधी सारी जानकारी है और आज तक कंपनी ने इस जानकारी को दबा कर रखा है.


ठीक है कि यदि सजा नहीं भी मिल पाई और इस कंपनी का तत्कालीन कर्ताधर्मा वारेन एंडरसन अब सजा पाने के लिए इस दुनिया में मौजूद नहीं है, पर क्या इसके कचरे पर और इससे होने वाले दुष्प्रभावों पर कोई ठोस निर्णय लिया जा सकता है, ताकि आने वाले वक्त में भोपाल की पीढ़ियां सेहतमंद हो सकें. हम सभी ने देखा है और इस बात के आंकड़े भी प्रस्तुत किए गए हैं कि अन्य लोगों की तुलना में कोरोना जैसी महामारी का असर भी यहां पर ज्यादा हुआ है. सैकड़ों गैस पीड़ित कोरोना होने की वजह से मारे गए हैं, क्योंकि पहले से ही उन्हें कई किस्म की बीमारियां थीं, ऐसे में संसार की सबसे भीषण त्रासदी झेलने वाला यह शहर खुद के लिए अतिरिक्त केयर की मांग करता है, लेकिन जैसे—जैसे समय बीतता जा रहा है, वह कम होती जा रही हैं.


अभी हाल ही में भोपाल गैस पीड़ितों के लिए बने अस्पतालों में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी देखी जा रही है, उनकी दवाई के पर्चों पर कई दवाओं के आगे नॉट अवेलेबल लिखकर वापस कर दिया जा रहा है, मरीजों को डाय​लिसिस करवाने में भी परेशान होना पड़ रहा है, गरीब लोगों को हर महीने चार से पांच सौ रुपए की दवाएं बाजार से खरीदनी पड़ रही हैं, यह जख्मों पर मलहल की जगह नमक छिड़कने जैसा व्यवहार है. मानवता इसकी इजाजत नहीं देती.


क्या उन सवालों पर गौर किया जाएगा जो पीड़ितों ने पूछे हैं, जो भोपाल की छाती पर अब भी जिंदा हैं



  • गैस कांड की वजह से हुई विधवाओं की संख्या 5000 फिर कुल मौतों की संख्या 5295 कैसे?


  • यूका व डाव केमिकल से मुआवजे की मांग क्यों नहीं की?


  • गैस पीड़ितों को आज तक सिर्फ लाक्षणिक इलाज ही क्यों मिल रहा है?


  • गैस राहत अस्पतालों में डाक्टरों के 40% और विशेषज्ञों के 56% प्रतिशत पद 10 सालों से खाली क्यों?


  • मिट्टी और भूजल के जहरीले प्रदूषण की वैज्ञानिक संस्थानों की रिपोर्ट नज़रअंदाज़ क्यों?


  • जहरीले प्रदूषण के फैलाव की निगरानी के लिए आज तक कोई व्यवस्था क्यों नहीं?


  • यूका के कानूनी नुमाइंदे को हाज़िर करने के लिए आज तक कोई कदम क्यों नहीं उठाया है?


  • भोपाल मेमोरियल अस्पताल में आज तक स्त्री रोग, बाल्य रोग और जनरल मेडिसन के विभाग क्यों नहीं है?


  • गैस पीड़ितों के बेहतर स्वास्थ्य के लिए 7 योग केंद्र पिछले 9 सालों से खाली क्यों?


  • 6 गैस राहत अस्पतालों में किसी में भी एक भी मानसिक रोग चिकित्सक क्यों नहीं है?


  • गैस पीड़ितों के इलाज में योग शामिल क्यों नहीं?


  • भोपाल गैस काण्ड की वजह से विधवा हुई 500 से ज्यादा विधवाएं पेंशन से वंचित क्यों?



(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
राकेश कुमार मालवीय

राकेश कुमार मालवीयवरिष्ठ पत्रकार

20 साल से सामाजिक सरोकारों से जुड़ाव, शोध, लेखन और संपादन. कई फैलोशिप पर कार्य किया है. खेती-किसानी, बच्चों, विकास, पर्यावरण और ग्रामीण समाज के विषयों में खास रुचि.

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First published: December 3, 2021, 1:32 PM IST
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