Opinion: भोपाल गैस त्रासदी अब एक रस्म अदायगी भर है!

Bhopal Gas Tragedy: 35 साल पहले भयानक त्रासदी झेलने वाले भोपाल गैस पीड़ितों के सवाल अभी पूरी तरह बुझे नहीं हैं. गैस पीड़ितों लोगों के प्रदर्शन में इस साल कोरोना त्रासदी के नए बिंदु भी जुड़ गए हैं. गैस लगने वाले कमजोर शरीरों के लिए यह दोहरी मार साबित हो रहा है.

Source: News18 Madhya Pradesh Last updated on: December 3, 2020, 10:47 AM IST
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Opinion: भोपाल गैस त्रासदी अब एक रस्म अदायगी भर है!
Bhopal Gas Tragedy: 2-3 दिसंबर की दरम्यानी रात भोपाल में हुआ था भयानक हादसा. (फाइल फोटो)
दुनिया की सबसे भयंकर त्रासदियों में से एक भोपाल गैस त्रासदी (Bhopal Gas Tragedy) की बरसी अब एक रस्म अदायगी भर बन गई है. भोपाल शहर में कुछ एक घंटों में हुई हजारों मौतों का न तो कोई सबक रहा और न दोषियों को सजा ही दिला पाए और न ही उसके बाद की स्वास्थ्य, पर्यावरण और मानवीय समस्याओं का ही उचित हल निकला. हत्यारी कंपनी कुछ करोड़ रुपए का मुआवजा देकर फारिग हो गई, सबसे बड़ा दोषी एंडरसन मर ही गया, पर उसे कोई भी सरकार कोर्ट के कटघरे में खड़े कर पाने में नाकाम रही, सजा तो दूर की बात है. जब भी त्रासदी या किसी बड़ी भयंकर दुर्घटना के बारे में कोई समाचार मिलता है तो हमें ख्याल भोपाल का ही आ जाता है. जितना यह शहर अपनी कुदरती बसाहट के कारण खूबसूरत है उससे उतनी ही बड़ी इसकी त्रासदी भी है.

झीलों के इस शहर के एक बड़े हिस्से का पानी धीरे-धीरे जहर से जहर हुआ जा रहा है और यह सब बड़ी खामोशी से अनदेखा कर दिया जाता है. इल्जाम तो यह भी लगाया जाता है कि भोपाल के खून में कोई उबाल नहीं है वह झील को देखकर ही अपने आप को शांत कर लेता है. क्या यह इल्जाम सही है. शायद नहीं. गैस पीड़ितों ने यहां लंबा संघर्ष किया. नतीजे भी रहे, लेकिन दोषियों को सजा देने के लिए जो पुरजोर राजनैतिक इच्छाशक्ति होनी चाहिए थी वह नदारद रही. क्या इसलिए क्योंकि भारत एक गरीब देश रहा है, और संभवत: जहर बनाने के लिए इस गरीब देश की मिटटी, हवा, पानी को यूनियन कार्बाइड ने चुना होगा. और संभवत: इसलिए भी कि यदि ऐसी कोई घटना हो जाती है तो उनका कोई बाल बांका भी नहीं कर पाएगा! क्या यूनियन कार्बाइड यह जानता था. पिछले 36 बरस के पन्ने पलटा कर देखें तो यूका की यह रणनीति ठीक ही रही होगी. जैसा वो सोचते होंगे, वैसा ही उन्होंने हमको पाया. मरा हुआ. यही त्रासदी किसी प्रभुत्ववादी देश में हुई होती तो उसके सबक कुछ अलग होते, खैर.

जहरीले प्लांट से दुखों का पीव
लंबे संघर्ष के बाद अब इसकी बरसी महज एक दिन का इवेंट है. कुछ सालों से तीन दिसम्बर के दिन हम इसे याद करके यूं छोड़ देते हैं जैसे कुछ हुआ ही न हो. अलबत्ता वह जहरीला प्लांट वैसा ही पड़ा है, पीड़ितों की आंखों में वैसे ही आंसू हैं, जख्मों से धीरे-धीरे दुखों का पीव बहता रहता है, पर उससे किसी को अब कोई फर्क नहीं पड़ता, पत्रकार कभी-कभार उस पर कोई खबर कर देते हैं, हर साल एक दो पेज की वही कहानियां अखबारों में आ जाती हैं, एक-दो धरना प्रदर्शन भर. अब सत्ता को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कब यह तारीख आती और गुजर जाती है.
दो पुलिसवालों पर सुरक्षा का जिम्मा
इस कारखाने में अंदर जाने के लिए हमें पिछले साल विशेष अनुमति लेने के लिए काफी जद्दोजहद करनी पड़ी थी. पर अंदर जाकर देखा तो इसमें बिना अनुमति घुस जाने के बीसियों रास्ते थे, जिनसे होकर गाय-भैंस, बकरी से लेकर बच्चे निर्बाध रूप से प्रवेश करते हैं. कारखाने के भीतर के एक हिस्से में क्रिकेट मैच का नजारा भी आप देख सकते हैं. दो पुलिसवाले इस 66 एकड़ के प्लांट की सुरक्षा आखिर कर भी पाएं तो कैसे. प्लांट के अंदर अवशेष और मशीने वैसे ही पड़ी हैं. वह खतरनाक टैंक भी जिससे गैस रिसी थी.
इसे त्रासदी के एक स्मारक के रूप में तब्दील कर दुनिया के लिए एक नजीर बना दिया जाना चाहिए था, जहां आकर दुनिया ऐसे विनाशकारी कारखानों को बनने नहीं देती और बनते भी तो उसमें ऐसी लापरवाहियां न करने की सीख मिलती. पिछले सप्ताह अखबार में एक तस्वीर छपी थी, जो जापान के परमाणु संयंत्रों की है. सुनामी के बाद ध्वस्त हुए इन संयंत्रों से अब भी घातक रेडिएशन निकल रहा है. जापान सहित कई देशों ने इन घटनाओं के बाद से ऐसे संयंत्रों को बनाना बंद कर दिया है, लेकिन हमारे यहां भोपाल से कुछ सौ किलोमीटर की दूरी पर नर्मदा नदी के किनारे तमाम विरोधों के बावजूद वैसे ही संयंत्र बनना शुरू हो गया है. नर्मदा नदी पर बड़े-बड़े बांध बनाकर उसे पहले ही बड़े-बड़े सरोवर में तब्दील कर ही दिया गया है.कोरोना त्रासदी के बीच गैस पीड़ितों का हाल
भोपाल गैस त्रासदी के सवाल अभी पूरी तरह बुझे नहीं हैं. गैस पीड़ितों लोगों के प्रदर्शन में इस साल कोरोना त्रासदी के नए बिंदु भी जुड़ गए हैं. गैस लगने वाले कमजोर शरीरों के लिए यह दोहरी मार साबित हो रहा है. उनकी मांग है कि भोपाल में गैस पीड़ितों के लिए एक अलहदा कोविड सेंटर बनाया जाए, ताकि उन्हें आसानी से इलाज मिल सके और दूसरे लोगों को दिक्क्क्त न हो. भोपाल मेमोरियल अस्पताल की व्यवस्थाओं को बेहतर किए जाने और खाली पड़े पदों को भरने की मांग भी एजेंडे में शामिल है.
कोविड तो आएगा और चला जाएगा, लेकिन गैस त्रासदी का दंश तो जैसे भोपाल के पीड़ितों के दुख का स्थायी भाव है. जब तक 365 टन जहरीला कचरा शहर की छाती पर पड़ा रहेगा वह बोझ ही रहेगा. अब तो कोई इसकी बात भी नहीं करता. (डिस्क्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं.)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
राकेश कुमार मालवीय

राकेश कुमार मालवीयवरिष्ठ पत्रकार

20 साल से सामाजिक सरोकारों की पत्रकारिता, लेखन और संपादन. कई फैलोशिप पर कार्य किया है. खेती-किसानी, बच्चों, विकास, पर्यावरण और ग्रामीण समाज के विषयों में खास रुचि.

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First published: December 3, 2020, 10:39 AM IST
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