मध्य प्रदेश: ऑक्सीजन संकट और हीरों की खोज के बीच चिपको आंदोलन की तैयारी

छतरपुर जिले में हीरा खनन के लिए 2 लाख से ज्यादा पेड़ों को कुर्बान किए जाने की तैयारी के खिलाफ स्थानीय युवा कर रहे आंदोलन. पेड़ों को बचाने और इस इलाके के पर्यावरण को संरक्षित करने के लिए चिपको आंदोलन की भी हो रही तैयारी.

Source: News18Hindi Last updated on: May 20, 2021, 12:52 PM IST
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मध्य प्रदेश: ऑक्सीजन संकट और हीरों की खोज के बीच चिपको आंदोलन की तैयारी
मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में हीरा उत्खनन के लिए 2 लाख से ज्यादा पेड़ काटे जाने का हो रहा विरोध.
कोरोनाकाल में ऑक्सीजन के मौजूदा संकट ने हमें व्यावहारिक तौर पर यह समझा दिया है कि पेड़ कितने कीमती हैं. इसके बाद होना तो यही चाहिए कि अपने पर्यावरण को सबसे प्राथमिकता में रखा जाए, लेकिन विकास परियोजनाओं में पेड़ों की अंधाधुंध बलि चढ़ाई जाती रही है. ताजा मामला मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले का है. यहां पर जमीन में छिपे हीरा निकालने के लिए दो लाख पंद्रह हजार से भी ज्यादा पेड़ों को कुर्बान किए जाने की तैयारी चल रही है. इस पर स्थानीय समुदाय का तीखा विरोध शुरू हो गया है, कोविड संकट को देखते हुए अभी यह विरोध सोशल मीडिया माध्यमों पर ही किया जा रहा है, लेकिन फैसला नहीं बदला गया तो इसे चिपको आंदोलन की तर्ज पर आगे बढ़ाने की तैयारी है.

बुंदेलखंड प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर इलाका है. इस क्षेत्र के पन्ना, जहां कि करोड़ों रुपए के हीरे निकलने की खबरें यदा-कदा आती ही रहती हैं. इसी से सट छतरपुर जिले की बक्सवाहा तहसील में घना जंगल है. बीस साल पहले आस्ट्रेलियन कंपनी रियो टिंटो ने यहां एक सर्वेक्षण करने के बाद बताया था कि इस जमीन के नीचे 3.42 करोड़ कैरेट हीरा दफन है. इसे निकालने के लिए कंपनी ने तकरीबन 900 हेक्टेयर जमीन की मांग की थी, जिस पर लगे तकरीबन 11 लाख पेड़ों को काटा जाना था. तब स्थानीय समुदाय ने इसका विरोध किया था और यह योजना ठंडे बस्ते में चली गई.

हाल ही में इस इलाके में उत्खनन के लिए एक बार फिर बोली लगाई गई. इसके लिए 382 हेक्टेयर क्षेत्र को चिह्नित किया गया. इसमें 62.64 हेक्टेयर में उत्खनन किया जाना है. बाकी तकरीबन 200 हेक्टेयर क्षेत्र में खनन के दौरान उपयोग किया जाएगा, क्योंकि खनन के बाद निकले मलबे को डंप किया जाता है. इस काम के लिए आदित्य बिरला समूह ने सबसे ऊंची बोली लगाकर 50 साल के लिए लीज अपने नाम की. इस पर तकरीबन 2500 करोड़ रुपए कंपनी खर्च करेगी.

वन विभाग के एक सर्वेक्षण के मुताबिक संबंधित खनन क्षेत्र में 2,15,875 पेड़ लगे हैं. 40 हजार पेड़ कीमती सागौन के हैं. इन सभी पेड़ों को खनन के लिए काटना कंपनी की मजबूरी होगी. इस इलाके में वन्यजीवों के पाए जाने की रिपोर्ट हैं, एक पूरा पर्यावरणीय तंत्र है. ऐसे में इस इलाके का भारी पर्यावरणीय विनाश होना तय है. इससे पहले केन-बेतवा लिंक परियोजना में 20 लाख से ज्यादा पेड़ डूबने का अनुमान जताया गया है. बुंदेलखंड एक्सप्रेस वे में भी तकरीबन दो लाख पेड़ों की बलि चढ़ाई जा चुकी है.
यूं तो कैम्पा अधिनियम की शर्तों के तहत काटे गए पेड़ों के बदले दोगुने पेड़ लगाए जाने का प्रावधान है. स्थानीय विधायक प्रद्युम्न लोधी भी एक पेड़ के बदले 15 पेड़ लगाने की क्षतिपूर्ति का दावा कर रहे हैं, लेकिन दिक्कत यह है कि पूर्व के अनुभव बेहद ख़राब रहे हैं. सालों पुराने बरगद, नीम के पेड़ काटकर कनेर के पौधे सड़क किनारे रौप दिए जाते हैं और क्षतिपूर्ति होना बता दिया जाता है. भला कनेर का पौधा बरगद के पेड़ की क्षतिपूर्ति कैसे करेगा ? इसमें एक और पेंच है, जिस पर पर्यावरणविद बहुत जोर देते हैं. उनका मानना है कि जंगल सैकड़ों सालों में अपने आप पनपता है, उसकी जैवविविधता, उसके जीव जंतु, और उसकी नैसर्गिकता पैदा नहीं की जा सकती, मतलब नर्सरी तो लगाई जा सकती है, किंतु जंगल नहीं.

हालांकि ऐसा नहीं है कि वन विभाग इसकी कीमत को समझता नहीं है. पिछले महीने ही एमपी के ही रायसेन जिले में एक युवक पर दो सागौन के पेड़ काट देने पर एक करोड़ चार लाख रुपए का जुर्माना किया गया. यह पेड़ अपनी पूरी उम्र में कितनी आक्सजीन, लकड़ी और अन्य चीजें देते इस आधार पर इसकी गणना की गई. यानी वन विभाग मानता है कि पेड़ कितने कीमती हैं! वहीं दूसरी तरफ इसी एमपी में दो लाख से ज्यादा पेड़ काटने की अनुमति दी जा रही है, उनमें 40 हजार पेड़ सागौन के हैं. इस आधार पर गणना यहां के नुकसान की गणना की जाए तो सोचिए यह संख्या क्या होती है?

विरोध इसी बात को लेकर है. बड़ा मलेहरा क्षेत्र के तकरीबन पचास-साठ युवा सक्रिय रूप से इसके खिलाफ सोशल मीडिया पर विरोध कर रहे हैं. एक युवा संकल्प जैन कहते हैं कि इस प्रोजेक्ट के बाद यह पूरा क्षेत्र में पर्यावरण का भारी विनाश होगा. उन्होंने बताया सैकड़ों साल उम्र वाले पेड़ों को काटा नहीं जाना चाहिए. इसके लिए सोशल मीडिया पर हम अभियान चला रहे हैं, इससे पूरे देश से तकरीबन 1000 लोग जुड़ चुके हैं. उनका कहना है कि हमारी बातें नहीं मानी गई तो यहां भी चिपको आंदोलन शुरू किया जाएगा.
हालांकि वन विभाग जंगल काटने के बदले 382 हेक्टेयर राजस्व भूमि को वन भूमि में परिवर्तित करने की बात कह रहा है. इस भूमि पर ही पेड़ लगाए जाएंगे और इसका खर्चा संबंधित कंपनी ही उठाएगी पर इससे लोग संतुष्ट नहीं है. युवाओं का कहना है कि हमें हीरा नहीं पर्यावरण चाहिए. इसी मामले में सर्वोच्च न्यायालय में भी दिल्ली की समाजसेविका नेहा सिंह ने एक जनहित याचिका लगाकर इस प्रोजेक्ट पर स्टे लगाने की मांग की गई है. इसमें उन्होंने मांग की है कि इस प्रोजेक्ट में एक भी पेड़ नहीं काटा जाना चाहिए.

अब देखना यह होगा कि कोरोना संकट में जब समाज को प्राणवायु की कीमत वास्तव में समझ में आई है तब सैकड़ों सालों पुराने जंगलों पर सरकार क्या निर्णय करती है, उसकी प्राथमिकता में हीरा है या लाखों पेड़? लोग इन जंगलों को बचाने की लड़ाई किस हद तक ले जाते हैं और क्या वास्तव में देश में एक दूसरा चिपको आंदोलन का साक्षी बनेगा? (डिस्क्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं.)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
राकेश कुमार मालवीय

राकेश कुमार मालवीयवरिष्ठ पत्रकार

20 साल से सामाजिक सरोकारों की पत्रकारिता, लेखन और संपादन. कई फैलोशिप पर कार्य किया है. खेती-किसानी, बच्चों, विकास, पर्यावरण और ग्रामीण समाज के विषयों में खास रुचि.

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First published: May 20, 2021, 12:48 PM IST
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