जितनी मजदूरी मिली उससे ज्यादा कर्ज हो गया

मुख्तयार बहुत निराशा भरे चेहरे और रुआंसी आवाज में कहते हैं जब गए थे तब कर्ज नहीं था. लौटे हैं तो 6000 रुपये का कर्ज हो गया है. अभी और पता नहीं कितना उधार लेना पड़ेगा? काम बंद है और महंगाई के कारण खर्च बढ़ गया है. हालांकि उन्हें मनरेगा से उम्मीद है.

Source: News18Hindi Last updated on: June 6, 2020, 12:40 PM IST
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जितनी मजदूरी मिली उससे ज्यादा कर्ज हो गया
मुख्तयार पोहरी ब्लॉक के आमई गांव निवासी के निवासी हैं
शिवपुरी. कोरोना (Coronavirus) का कहर भूमिहीन मजदूरों पर बुरी तरह बरपा है. जाहिर है, भूमिहीन हैं तो मजदूरी के लिए पलायन करना इनकी जिंदगी का हिस्सा है. शिवपुरी के पोहरी ब्लॉक के आमई गांव निवासी मुख्तयार आदिवासी भी इन्हीं में से एक है.

आमई गांव में 13 सहरिया और 25 यादव परिवार रहते हैं. सहरिया मध्यप्रदेश के संरक्षित जातियों में से एक है. इस प्रजाति में कुपोषण और खादय सुरक्षा बहुत बड़ी चुनौती है. गांव ब्लॉक मुख्यालय से महज आठ किलोमीटर दूर है, लेकिन मजदूर पलायन न करें तो फाकाकशी को मजबूर हो जाएं. मुख्तयार पत्नी, दो बेटी और दो बेटों को लेकर हर साल की तरह इस साल फरवरी में आगरा चला गया. वह कुछ रुपये कमाकर लौटते थे, जिससे बारिश के दिनों में परिवार का गुजारा हो जाता था, लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ. लॉकडाउन से मजदूरी छिन गई.

मुख्तयार ने बताया कि आगरा में पूरा परिवार एक महीने तक रुका. इस दौरान महज 12 दिन काम मिला. बेमौसम बारिश के कारण बाकी दिन खाली बैठना पड़ा. इस बीच महीने भर में 2400 रुपये तो खाने पर ही खर्च हो गए. जब उन्हें पता चला कि कोरोना वायरस के कारण लॉकडाउन हो गया है. काम पूरी तरह बंद हो गया. जिसके यहां मजदूरी की उसने कह दिया ‘अब लौट जाओ. कैसे लौटोगे? यह तुम जानो.‘

मुख्तयार इस तरह हुए कर्जदार
मुख्तयार ने बताया कि ‘लॉकडाउन और काम देने वाले के व्यवहार से घबरा गया. आखिर परिवार को लेकर अचानक कहां चला जाए? घर वापसी की उम्मीद में मुख्तयार के परिवार को 10 दिन वहीं रहना पड़ा. इस बीच बचा पैसा भी खर्च हो गया. एक दिन गाड़ी वाले ने 1000 रुपये किराया लिया और गांव छोड़ गया.“ उस वक्त मुख्तयार खाली हाथ था, इसलिए किराए के रुपये उसने गांव आने पर किसी यादव से उधार लेकर दिए. इसके अलावा 3000 रुपये घर का सामान खरीदने के लिए लेना पड़ा.

मुख्तयार ने बताया कि लौटे हैं तो महंगाई मिली. यहां तो तीन का सामान तेरह में दे रहे हैं. पहले खाने का जो तेल 90 रुपये में मिलता था अब 120 रुपये में मिल रहा है. समझ नहीं आता जीवन कैसे कटेगा ? इसी बीच एक बेटी बीमार हो गई, जिस पर करीब 1000 रुपये खर्च हुए. सरकारी अस्पताल में इलाज नहीं करवा पाए.

मुख्तयार बहुत निराशा भरे चेहरे और रुआंसी आवाज में कहते हैं जब गए थे तब कर्ज नहीं था. लौटे हैं तो 6000 रुपये का कर्ज हो गया है. अभी और पता नहीं कितना उधार लेना पड़ेगा? काम बंद है और महंगाई के कारण खर्च बढ़ गया है. हालांकि उन्हें मनरेगा से उम्मीद है.काम करने बाहर तो जाना पड़ेगा

क्या काम के लिए फिर बाहर जाएंगे? इस पर मुख्तयार का दो टूक जवाब था- “नहीं जाएंगे तो बच्चों का पालन-पोषण कैसे करूंगा. कुछ समय बाद बारिश आएगी तब परिवार को क्या खिलाऊंगा. बाहर तो जाना ही पड़ेगा.“ हम हर साल सुपाड राजस्थान (मध्यप्रदेश- राजस्थान की सीमा पर एक इलाका) से ले आते थे, जिससे बारिश के चार महीने कट जाते थे. इस बार तो हम सुपाड भी नहीं गए. कैसे कोटेंगे चौमासे?

मुख्तयार ने बताया कि अंत्योदय योजना के तहत राशनकार्ड बना है. इस पर उन्हें 35 किलो महीने के हिसाब से तीन महीने का 105 किलो अनाज मिला था. इसे एक महीने की पूर्ति हो गई. 60 किलो चावल था, जो वे खाते नहीं हैं. इसलिए, उन्होंने चावल 13 रुपये किलो बेच दिए और 18 रुपये किलो गेहूं खरीदे. अब आने वाले दिनों में खाने की दिक्कत होगी.

(कोविड ने प्रवासी मजदूरों की जिंदगी में दोहरा संघर्ष पैदा कर दिया है. शहर से निकलकर गांव तो पहुंच गए, लेकिन मुश्किलें अभी थमी नहीं हैं. सरकार से राहत मिली है, पर अभी और राहत की जरूरत है. भारत के ऐसे ही मजबूर इंसानों की कहानी पढ़िए इस सीरीज में.)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
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First published: June 6, 2020, 11:49 AM IST
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