प्रवासी की बात: अब शहर वापस नहीं जाना चाहते मजदूर

कोविड-19 (Coronavirus) ने प्रवासी मजदूरों (Migrant Workers) की जिंदगी में दोहरा संघर्ष पैदा कर दिया है. शहर से निकलकर गांव तो पहुंच गए, लेकिन मुश्किलें अभी थमी नहीं हैं. सरकार से राहत मिली है, पर अभी और राहत की जरूरत है. भारत के ऐसे ही मजबूर इंसानों की कहानी पढ़िए इस सीरीज में.

Source: News18Hindi Last updated on: June 27, 2020, 2:42 PM IST
शेयर करें: Facebook Twitter Linked IN
प्रवासी की बात: अब शहर वापस नहीं जाना चाहते मजदूर
कोविड-19 ने प्रवासी मजदूरों की जिंदगी में दोहरा संघर्ष पैदा कर दिया है.
बंगलों के फर्श के लिए चमचमाती टाइल्स बनाने वाले राजबहोर कोल की जिंदगी में अब चमक नहीं है. जो थोड़ी-बहुत आशा थी वह कोरोना (Coronavirus) ने खत्म कर दी. मध्य प्रदेश के रीवा जिले की बौसड पंचायत के गांव महिलोखर निवासी राजबहोर कोल के परिवार में पत्नी सुनीता और चार बच्चे हैं. परिवार की जरूरतें पूरी करने के लिए वह पलायन चार-पांच साल से गुजरात के राजकोट काम करने जाते हैं.

राजकोट में वह 10 हजार रुपये महीने पर एक टाइल्स कंपनी में काम करते हैं. सालभर में एक महीने के लिए घर आते हैं. पत्नी गांव में रहकर खेतों में मजदूरी करती है. महीने भर में उसे 10-12 दिन काम मिल पाता है. घर की जरूरतों के लिए उसके बैंक खाते में रुपये जमा कर दिया करते हैं.

सब कुछ ठीक था, कोरोना ने खत्म कर दिया
लॉकडाउन हुआ तो फैक्टरी बंद हो गई. राजबहोर वहीं फंस गए. कुछ दिन तक लॉकडाउन खुलने का इंतजार किया. उम्मीद थी कि लॉकडाउन खुलेगा तो फैक्टरी खुल जाएगी और काम मिल जाएगा, लेकिन लॉकडाउन बढ़ गया. तमाम उम्मीदें खत्म होती दिखीं. बकौल राजबहोर उन्हें यह अंदाजा हो गया कि अब राजकोट में रुके तो आर्थिक स्थिति खराब हो जाएगी. गांव में परिवार परेशान होगा वह अलग. उनके साथ एक कमरे में तीन अन्य लोग भी रहते थे. लॉकडाउन का दूसरा चरण शुरू होते ही राजबहोर ने घर आने का निर्णय किया.
राजबहोर ने बताया कि उसे लगा जैसे लॉकडाउन और आगे बढ़ता जाएगा, इसलिए परिवार के पास चले जाना अच्छा है. राजकोट में भी काम तो बंद हो ही गया था. उसने कंपनी के सुपरवाइजर से घर वापसी की बात कही. साथ ही यह भी कहा कि मजदूरी का हिसाब करके पैसा दे दें. सुपरवाइजर ने राजबहोर को पूरा पैसे दे दिया. उसने ई-पास बनवाने में मदद भी की.


कोरोना आया तो राजबहोर और सुनीता की मजदूरी छूट गई. राजबहोर ने बताया कि राजकोट से सतना तक हजारों मजदूर पैदल चलते मिले. चिलचिलाती धूप में महिलाएं और बच्चे भूखे-प्यासे आगे बढ़े जा रहे थे. सिर पर गठरी थी सो अलग. यह देखकर राजबहोर की आंखों में आंसू आ जाया करते थे. राजबहोर ने बताया कि जब-जब ये मंजर देखता था, तब-तब मुझे मेरा दर्द उनसे कम लगता था. मैं उनकी तकलीफों के आगे अपना दर्द भूल जाता था.

राजकोट से बस मध्यप्रदेश की सीमा तक पहुंचे किराया 1500 रुपये लगे, वहां से फिर एक हजार रुपये देकर ट्रक में बैठकर सतना पहुंचा. सतना से सात-आठ लोगों के साथ 160 किमी पैदल चलकर पांच मई को अपने गांव पहुंचा. इसमें पांच दिन लग गए. कई बार भूखा भी रहना पड़ा. कभी-कभार कुछ खरीदकर खा लिया करते. गांव पहुंचने के बाद स्कूल में 14 दिन क्वॉरंटीन रहे.एक-दो साल कहीं नहीं जाऊंगा
राजबहोर बताते हैं कि अब एक-दो साल के लिए कहीं बाहर नहीं जाएंगे. आसपास ही काम की तलाश करेंगे. सरकार ने कुछ काम उपलब्ध कराया तो बहुत अच्छा होगा. अब उसके पास महज 1300 रुपये बचे हैं. इससे कितने दिन का खर्च चल पाएगा. राजबहोर के परिवार को दो महीने का राशन पीडीएस की दुकान से मिल चुका है. इससे कुछ गुजारा हो जाएगा, लेकिन सब्जी-भाजी और तेल-मसालों के लिए रुपये की जरूरत होगी.

राजबहोर कहते हैं साहब, 'अब हालात विकट होने वाले हैं. न जाने परिवार का गुजारा कैसे होगा. बच्चों का स्कूल बंद है. इससे उन्हें मध्याह्न भोजन भी नहीं मिल रहा है. एक हफ्ते पहले 33-33 दिन का चावल दिया गया था.'


संदीप भी नहीं जाएंगे अब मजदूरी करने
संदीप जायसवाल भी एक प्रवासी मजदूर हैं. वह रीवा जिले की तुर्का पंचायत के गेदुरहा गांव के निवासी हैं. पत्नी, तीन बच्चों और बूढ़े माता-पिता के साथ रहने वाले संदीप जायसवाल के पास कहने को दो एकड़ कृषि भूमि है, लेकिन सिंचाई का साधन नहीं होने के कारण इसमें पैदावार इतनी नहीं होती कि सालभर का गुजारा हो जाए. इस साल नौ क्विंटल गेहूं हुआ है. वह खरीफ के सीजन में धान की खेती करता है.

संदीप का राशनकार्ड भी नहीं है, जिससे पीडीएस का राशन भी नहीं मिलता. ऐसे में काम के लिए पलायन करना उसकी मजबूरी है. संदीप खेती के काम निपटाने के बाद तीन-चार माह के लिए शहर का रुख कर लेता है. लौटकर फिर खेती में जुट जाता है. अब संदीप मजदूरी के लिए पलायन से तौबा कर चुका है.


संदीप कहते हैं कि अब यहीं अच्छी तरह से खेती करेगा. खुद का काम करके अपने परिवार का भरण-पोषण करेगा. संदीप ने बताया कि उसके पास महज 2000 रुपये हैं. आय का कोई साधन नहीं है. सरकार को भी मजदूरी उपलब्ध कराने की ओर ध्यान देना चाहिए.

(कोविड-19 ने प्रवासी मजदूरों की जिंदगी में दोहरा संघर्ष पैदा कर दिया है. शहर से निकलकर गांव तो पहुंच गए, लेकिन मुश्किलें अभी थमी नहीं हैं. सरकार से राहत मिली है, पर अभी और राहत की जरूरत है. भारत के ऐसे ही मजबूर इंसानों की कहानी पढ़िए इस सीरीज में.)
facebook Twitter whatsapp
First published: June 27, 2020, 2:42 PM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
corona virus btn
corona virus btn
Loading