प्रवासी की बात: क्यों भारत के पैरों में छाले हैं?

Coronavirus Lockdown: सतना से जिले के प्रवासी मजदूर को सात माह काम करने के बाद मिले आठ हजार रुपये, हैदराबाद से सतना के गांव मुडख़ोहा तक किया पैदल सफर.

Source: News18Hindi Last updated on: June 20, 2020, 10:10 AM IST
शेयर करें: Facebook Twitter Linked IN
प्रवासी की बात: क्यों भारत के पैरों में छाले हैं?
कोविड-19 ने प्रवासी मजदूरों की जिंदगी में दोहरा संघर्ष पैदा कर दिया है. शहर से निकलकर गांव तो पहुंच गए, लेकिन मुश्किलें अभी थमी नहीं हैं.
'किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकां आई
मैं घर में सबसे छोटा था मिरे हिस्से में मां आई...’

मुनव्वर राणा की गजल की ये पंक्तियां भारत गोंड पर सटीक बैठती हैं. सतना जिले की मझगवां तहसील, केल्हौरा पंचायत के गांव मुड़खोहा के भारत के परिवार में सात सदस्य हैं, लेकिन बड़े भाई राजा भैया ने अपना चूल्हा अलग कर लिया तो बेवा मां रज्जी बाई, भारत के हिस्से में आई. मां अक्सर बीमार रहती. दवाओं का खर्च लगातार बढ़ता जा रहा था. गांव में काम इतना नहीं मिलता कि बीवी-बच्चे के साथ रहकर महंगी दवाओं का खर्च भी निकल जाए. हालांकि, मां के नाम पर दो एकड़ असिंचित कृषि भूमि है. इसमें होने वाली पैदावार नाकाफी है.

रज्जी के नाम पर राशनकार्ड है, लेकिन इसमें तीन सदस्यों का नाम जुड़ा नहीं है, जिससे करीब 15 किलो राशन कम मिलता है. इससे पूरा महीना नहीं कट पाता. नतीजतन, भारत को रुपये कमाने के लिए बाहर जाना पड़ता है. वह सितंबर 2019 में अपनी पहचान के हाजीभाई के पास हैदराबाद गए. हाजीभाई का शटर का कारोबार है. हैदराबाद में रहने की व्यवस्था हाजीभाई ने की थी. भारत ने बताया कि उन्हें 450 रुपये प्रतिदिन मजदूरी दी जाती थी, लेकिन हाजीभाई सप्ताह में उन्हें केवल 500 रुपये देते थे. इससे वे हफ्तेभर का राशन खरीद लेते. हाजीभाई ने बाकी रुपये घर जाने से पहले देने का वादा किया था, लेकिन यह वादा उन्होंने तोड़ दिया. इससे भारत की उम्मीदें भी बुरी तरह टूट गईं.
migrant workers
भारत ने बताया कि नागपुर पहुंचने में उन्हें पांच दिन लग गए. रास्ते में कई जगह पुलिस वाले खाने-पीने का इंतजाम कर देते थे.


भारत ने बताया कि उसने सितंबर 2019 से मार्च 2020 तक करीब सात महीने तक काम किया. उनके साथ सात मजदूर और थे. 22 मार्च को पता चला कि कोरोना वायरस के कारण लॉकडाउन हो गया है. अब सभी काम-धंधे बंद हैं. कहीं किसी को आने-जाने की इजाजत नहीं है. हम 14 अप्रैल तक अपने रूम में ही रहे. बाहर से लगातार खबरें आ रही थी कि कोरोना महामारी और ज्यादा तेजी से फैलने लगी है. इसका डर हमारे दिल में भी बैठ गया. हर वक्त डर लगता कि कहीं हमें भी कोरोना न हो जाए. अंतत: हमने आपस में चर्चा कर घर वापसी का निर्णय लिया.

हमने हाजीभाई से कहा कि अब हमें घर जाना है. मजदूरी का हिसाब कर दो और बाकी के रुपये दे दो. हिसाब किया तो मेरे 26000 रुपये बने. हाजीभाई ने रुपये देने से साफ इनकार कर दिया. कहा, 'अभी मेरे पास पैसे नहीं हैं. मैं कोई पैसा नहीं दे सकता. तुम्हें लौटना है तो लौट जाओ. हमने खूब मिन्नतें की, तब जाकर हाजीभाई पैसा देने को तैयार हुए, लेकिन वह भी पूरे नहीं दिए. मुझे 8000 रुपये दिए और कहा कि बाकी के 18000 हजार रुपए लॉकडाउन के बाद दूंगा. अभी जो दे रहा हूं, यह भी उधार लेकर आया हूं.' इसी तरह हाजीभाई ने सभी के पैसे रख लिए.कदमों से ऐसे नापा हैदराबाद से घर का रास्ता
भारत ने बताया कि हम सातों लोग 15 अप्रैल को सुबह सात बजे घर की ओर पैदल ही निकल पड़े. उनके साथ सतना जिले के पांच और दो मजदूर अन्य जिलों के थे. पहले दिन सभी इतना चले कि घर की दूरी 100 किलोमीटर कम कर दी. सभी एक गांव पहुंचे, रात हो चुकी थी. कुत्तों के भौंकने के कारण वे गांव में नहीं घुसे. बाहर ही रास्ते किनारे सो गए.

अगले दिन 16 अप्रैल का सफर यहीं से शुरू हुआ और इस दिन सभी करीब डेढ़ सौ किलोमीटर पैदल चले. भारत ने बताया कि उसे याद नहीं कौन सी जगह थी, जहां पुलिस वाले मिले. उन्होंने सभी की जांच कराई और खाने-पीने की व्यवस्था की. यहां से पुलिस वालों ने एक नेक काम और किया, हमें ट्रक में बैठा दिया. हमने ट्रक से 60 किलोमीटर का सफर तय किया. इसके बाद करीब 250 किलोमीटर पैदल चलकर नागपुर पहुंचे.


भारत ने बताया कि नागपुर पहुंचने में उन्हें पांच दिन लग गए. रास्ते में कई जगह पुलिस वाले खाने-पीने का इंतजाम कर देते थे. खाना नहीं मिले तो हम बिस्किट, नमकीन, फल आदि खरीदकर काम चला लेते. किसी तरह चल-चलकर हम सिवनी पहुंच गए. यहां अपने प्रदेश में आकर घर वापसी का सपना पूरा होता दिखा. भारत ने कहा कि घर वापसी की लालसा इतनी ज्यादा थी कि सिवनी से पहले कभी ऐसा नहीं लगा कि हम थक गए हैं. सिवनी में थकान महसूस हुई तो यहां रात काटी. सुबह फिर पैदल चल पड़े. रोड़े और पत्थरों के रास्ते चलकर 22 अप्रैल को कटनी पहुंच गए.

पैरों में छाले दिल में मां का ख्याल था
भारत ने बताया कि कटनी पहुंचने तक हमारे पैरों में सूजन थी और छाले पड़ चुके थे. हमें लग रहा था कि अब और चला नहीं जाएगा, लेकिन दिल में बीमार मां और बच्चों की यादें भी थीं. परिजनों से मोबाइल फोन पर बात करो तो सभी बेहद दुखी होते थे. मेरी बूढ़ी मां मेरे हालात जानकर बहुत रोती थी. एक दिन कटनी में रुकने के बाद 24 अप्रैल को फिर पांव-पांव निकल पड़े. देवी धाम मैहर में शाम हुई तो एक रात यहां आराम कर लिया. अंतत: 25 अप्रैल को हम सतना पहुंच गए.

यहां जिला अस्पताल में सभी की जांच हुई. शुक्र है सबकुछ ठीक था. डॉक्टर ने घर जाने का कहा तो सभी चल पड़े घर की ओर. हिरौदी में शाम हो गई. यहां हम खेतों में सो गए. अब चूंकि घर पास ही था तो परिजनों से मिलने की आस दिल में बढ़ती जा रही थी, लेकिन पैरों की सूजन और छाले अब तेजी से घर पहुंचाने में सक्षम नहीं थे. अगले दिन 26 अप्रैल को हम फिर पैदल निकल पड़े और तागी पछीत के जंगलों से होते हुए केल्हौरा पंचायत तक पहुंच गए. कुछ देर आराम करने के बाद फिर चले और मुडख़ोहा अपने गांव पहुंच गए.

यहां सरपंच और सचिव को सूचना दी. उन्होंने हमारे रहने की व्यवस्था सरकारी स्कूल में कर दी. हम 14 दिन इसी में रहे. क्वॉरंटीन रहने के बाद 9 मई को हम अपने परिजनों से मिल सके.

घर वाले भी बुरी हालत में थे
भारत ने बताया कि वे 9 मई को घर पहुंचा तो पता चला कि पैसों की कमी के कारण घर वालों की स्थिति बहुत खराब हो चुकी थी. अपनों का दुख देखकर मैं मेरे पैरों की सूजन, दर्द, छाले सब भूल चुका था. मेरे पास जो रुपये बचे थे, उससे घर में सामान की व्यवस्था की. रास्ते में हमने करीब पांच-पांच सौ रुपये ही खर्च किए होंगे. अब हाजीभाई को फोन करते हैं तो वह रिसीव नहीं कर रहे हैं.

परिवार की माली हालत ठीक नहीं है तो काम के लिए बाहर तो जाना पड़ेगा, लेकिन इस बार हाजीभाई पुराना बकाया देने का वादा करेगा तभी जाएंगे. फिलहाल तो कोरोना ने हमें बुरी तरह बर्बाद कर दिया. काम छूट गया और जो काम किया था उसका पैसा भी नहीं मिला. अब हम घर के लिए दाल-सब्जी तक नहीं खरीद पा रहे हैं. हालांकि, भारत ने बताया कि उनके घर में तीन क्विंटल गेहूं और 40 किलो चावल है, लेकिन यह कब तक चलेगा?


(कोविड-19 ने प्रवासी मजदूरों की जिंदगी में दोहरा संघर्ष पैदा कर दिया है. शहर से निकलकर गांव तो पहुंच गए, लेकिन मुश्किलें अभी थमी नहीं हैं. सरकार से राहत मिली है, पर अभी और राहत की जरूरत है. भारत के ऐसे ही मजबूर इंसानों की कहानी पढ़िए इस सीरीज में)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
facebook Twitter whatsapp
First published: June 20, 2020, 9:39 AM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर