कोविड-19 में बच्चों के मन की बात: स्कूलों को कर रहे याद

कोरोना वायरस महामारी (Coronavirus Pandemic) के बच्चे अपने अधिकारों से सबसे ज्यादा वंचित और चिंतित हैं. कोविड काल में बच्चों के मन की बात सुनने का समय आ गया है वरना सामाजिक रूप से शैक्षिक खाई के गहराने की आशंका दिख रही है.

Source: News18Hindi Last updated on: November 18, 2020, 10:52 PM IST
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कोविड-19 में बच्चों के मन की बात: स्कूलों को कर रहे याद
14 नवम्बर यानी भारतीय बाल दिवस (Children's Day) से लेकर 20 नवम्बर तक का यह सप्ताह बच्चों के लिए खास महत्व का होता है.
नई दिल्ली. यह पहला मौका होगा, जब हम विश्व बाल अधिकार दिवस (World Children’s Day 2020) मना रहे होंगे और उसी समय बच्चे अपने अधिकारों से सबसे ज्यादा वंचित और चिंतित हैं. 14 नवम्बर यानी भारतीय बाल दिवस (Children's Day) से लेकर 20 नवम्बर तक का यह सप्ताह बच्चों के लिए खास महत्व का होता है. 20 नवम्बर को ही दुनिया भर के देशों ने सीआरसी (Convention on the Rights of the Child) पर हस्ताक्षर करके बच्चों के अधिकारों को सुनिश्चित करने की प्रतिबद्धता दिखाई थी, लेकिन इकतीस वर्षों बाद भी लक्ष्य बहुत दूर है.

सरकारें बच्चों की स्थितियों को ठीक करने के लिए अपनी गति से काम कर ही रही थीं कि कोविड-19 (Covid-19) के संकट ने तो इस दुनिया के सामने नई चुनौतियां लाकर खड़ी कर दी हैं. इसमें कोई संदेह नहीं है कि इससे हर तबका प्रभावित है, लेकिन बच्चों के सामने तो यह कई तरह से चुनौतीपूर्ण हो गया है.

बच्चों के लिए सबसे पहला मुद्दा है उनकी शिक्षा. अपने घर के बाद बच्चों के लिए सबसे ज्यादा महत्व है स्कूल (Schools) का. महामारी के संकट में स्कूल बंद करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था. कोरोनाकाल में ऑनलाइन क्लास (Online Classes) लगने लगीं, लेकिन यह सभी बच्चों के लिए संभव नहीं हो सकी. आर्थिक पैमानों के अलावा डिजिटल डिवाइड भी इतना ज्यादा और गंभीर है, जिसने सभी के लिए ऑनलाइन शिक्षा को सुलभ नहीं बनाया.

सभी बच्चों के लिए स्मार्टफोन न होना, इंटरनेट कनेक्शन न होना या कमजोर होना, ऑनलाइन क्लासेस के लिए जरूरी तकनीकी ज्ञान न होना, कहीं-कहीं बिजली नहीं होना, लंबे समय तक स्मार्टफोन के जरिए क्लास में उपस्थिति में सहज नहीं होना, क्लास करने के बाद समझ न आना, जाने ऐसी कितनी समस्याएं हैं, जिनका असर कहीं न कहीं दिखाई देने वाला है. इसमें न जाने कितने बच्चे दौड़ में पीछे रह जाने वाले हैं.
मध्य प्रदेश के दूरस्थ अंचलों में रहने वाले कुछ बच्चों की बातें सुन-पढ़ कर आप भी इस बात से सहमत होंगे कि कोविड संकट निकल जाने के बाद बच्चों की पढ़ाई के लिए हमारी क्या योजना होगी, जिससे पिछड़ गए बच्चे मुख्यधारा में शामिल हो पाएं. हमें इस बात की चिंता करनी होगी कि उनकी बुनियाद ही कमजोर न रह जाए. इस बात का भी वास्तविक आंकलन करना होगा कि इस बीच जो कुछ उन्हें पढ़ाया गया है वह कितना समझ आया.

शिवपुरी जिले के जाखनोद निवासी 13 वर्षीय विशाल यादव आठवीं कक्षा का छात्र है. विशाल ने बताया कि छह माह पढ़ाई नहीं करने के बाद भी उसे सातवीं से आठवीं कक्षा में कर दिया गया. अब स्मार्टफोन के जरिए ऑनलाइन पढ़ाई कराई जा रही है, लेकिन उसके पिता चंद्रशेखर और मां गिरजा यादव की माली हालत इतनी अच्छी नहीं है कि स्मार्टफोन ले सकें. विशाल का एक बड़ा भाई और एक छोटी बहन भी है. ऐसे में पढ़ाई लगभग बंद ही हो चुकी है.

ग्वालीपुरा की रहने वाली आरुषि ने बताया कि उसके पापा नरेश पढ़े-लिखे नहीं हैं, इसलिए वे सादा यानी की-पैड वाला मोबाइल फोन रखते हैं. ऑनलाइन पढ़ाई कराई जा रही है, लेकिन स्मार्टफोन नहीं है, जिससे पढ़ाई प्रभावित हो रही है. अगर फेल हो गई तो क्या होगा? एक दूसरी छात्रा साधना का कहना था, ‘कोरोना के आने से कहीं भी आना-जाना नहीं हो पाया. हमारी कोचिंग बंद हो गई और पढ़ाई नहीं हो पाई. छह माह हो गए हैं, हमारी सारी पढ़ाई चौपट हो गई. ऑनलाइन पढ़ाई नहीं की क्योंकि, हमारे पास मोबाइल नहीं था. हमारे पापा के पास पैसे नहीं थे.‘कल्पना धाकड़ पोहरी तहसील के रामपुरा गांव में रहती है. उसके पिता हरिशंकर खेती करते हैं. कल्पना के तीन भाई-बहन और हैं. कल्पना 8वीं में पढ़ती है. कल्पना कहती है कि महामारी ने हमें घरों में कैद कर दिया और पढ़ाई भी छीन ली. हम बाहर घूमने भी नहीं जा पाए.‘ कल्पना को अपनी पढ़ाई बंद होने का भी दुख है. उसने बताया कि हमारे पिताजी के पास पैसे भी नहीं थे कि वो स्मार्टफोन खरीदकर पढ़ाई के लिए दे सकें, इसलिए पढ़ाई बंद है.

मेहरागांव के सोनू धाकड़ कक्षा आठवीं में पढ़ते हैं. स्कूल बंद हुए तो पढ़ाई छूटने का डर दिल में बैठ गया. सोनू का कहना है कि अब लॉकडाउन हटा दिया गया है तो स्कूल भी खोल देने चाहिए. ऐसे घरों में बंद रहने से घुटन होती है. स्कूल जाते तो दोस्तों के साथ पढ़ते और खेलते. सोनू के पिता फूलसिंह खेती करते हैं. उसकी मां अनिता भी खेती के काम में उनकी मदद करती है. सोनू का कहना है कि सबको अपने-अपने काम की चिंता हो रही है. हम बच्चों के बारे में कोई सोच ही नहीं रहा है. हम ऑनलाइन पढाई नहीं कर रहे हैं, क्योंकि हमारे पास कोई साधन नहीं है.

छात्रा कृष्णा का मानना है कि ऑनलाइन पढ़ाई में हमें कुछ समझ नहीं आएगा. उसके घर टीवी भी नहीं है. बड़ा फोन (स्मार्टफोन) भी नहीं है. वह अपने पड़ोस में रहने वाले एक भैया को मोबाइल पर पढ़ते देखती है और उसे समझ आता है कि ऑनलाइन पढ़ाई से उसे कुछ समझ नहीं आएगा. कृष्णा का कहना है कि मोबाइल में ज्यादा देर तक देखो तो आंखों के सामने अंधेरा सा छा जाता है, क्योंकि हमारे घर में टीवी तक नहीं है तो इसे देखने की आदत नहीं है. हम तो स्कूल से पढ़ाई करना चाहते हैं.

पन्ना जिले कि राखी का कहना है कि उन बच्चों का क्या होगा, जिनके परिवार में स्मार्टफोन नहीं है? राखी ऑनलाइन पढ़ाई नहीं करना चाहती, क्योंकि पढ़ने में तो वैसे भी कम मन लगता है, जब मोबाइल हाथ में आ जाएगा तो मोबाइल चलाने में मन लग जाएगा. संतोषी ने बातचीत में बताया कि स्कूल में पढ़ाई अच्छे से हो जाती थी. वहां सभी विषय अच्छे से समझ भी आ जाते थे. अब कोई भी विषय कम्पलीट नहीं है, इसलिए पढ़ाई में मन नहीं लग रहा है. जैसे-तैसे एक-दो घंटे पढ़ाई कर लेती हूं.

पन्ना जिले की छात्रा रूबी उल्टे हमसे सवाल करती है कि जिन आदिवासी परिवारों के पास दोनों टाइम खाने का इंतजाम नहीं हो, उनके बच्चे ऑनलाइन पढ़ाई कैसे कर सकते हैं? इसके लिए स्मार्टफोन और इंटरनेट वाले बैलेंस की जरूरत होती है. जो परिवार अपने बच्चों को अच्छा खाना नहीं खिला पा रहे हैं, वे स्मार्टफोन कैसे दिला सकते हैं. इसलिए, सभी आदिवासी बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह बंद है. ऑनलाइन पढ़ाई तो पैसे वालों के लिए है.

रीवा जिले के दीपक का कहना है कि स्कूल बंद होने से हमारा मध्याह्न भोजन भी बंद हो गया. टीचर स्कूल में पढ़ाते थे वो समझ आता था, लेकिन घर में पढ़ने में समझ नहीं आता है. स्कूल बंद थे तो इस बीच हमने अपने खेतों में रोपा लगाया. गाय-भैसों की चरवाही भी की. दीपक ने बताया कि उसके गांव में बिजली भी शाम को आठ बजे आती है, तब तक सभी सो जाते हैं. कुछ बच्चों का यह भी मानना था कि ऑनलाइन पढ़ाई सरकारी स्कूलों के बच्चों के लिए नहीं है. वह तो बड़े लोगों के लिए है.

बच्चों के मन से सीधे आ रही इन बातों पर गौर करना होगा. वह अपने स्कूलों को बेतरह याद कर रहे हैं, इससे स्कूलों का महत्व भी समझ आता है कि हमें उन पर कितना ज्यादा ध्यान देकर बेहतर बनाना है. सबके लिए शिक्षा सुलभ कराना है. कोविड के तुरंत बाद इस एक साल में बच्चों से जो कुछ भी छूट गया है, उसका मूल्यांकन करके भरपाई की रणनीति भी तैयार करनी होगी, जिससे पहले से ही बनी खाई और गहरी न हो पाए.

डिस्क्लेमरः (ये लेखक के निजी विचार हैं)
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First published: November 18, 2020, 10:39 PM IST
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