कोविड में क्यों आधे ही निकले कुष्ठ के मामले?

कुष्ठ का प्रभाव हमारे यहां ही नहीं दुनिया में कितना गहरा रहा है उसके तमाम किस्से नए नहीं हैं. दक्षिण अफ्रीका में गांधी एक सभा को संबोधित कर रहे थे, उन्होंने देखा कि कुछ लोग दूर एक पेड़ के नीचे खड़े हैं,  बुलाने पर भी नजदीक नहीं आ रहे हैं. गांधी ने यह देखा तो वह खुद लोगों के पास जाने लगे, तभी उनमें से एक चिल्लाया कि ‘गांधी भाई यहां मत आईये हम लोग कुष्ठ रोगी हैं...

Source: News18Hindi Last updated on: January 31, 2022, 2:44 pm IST
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कोविड में क्यों आधे ही निकले कुष्ठ के मामले?

दुनिया में सबसे ज्यादा कुष्ठ रोगी भारत में हैं. पुरातनपंथी ताने—बाने में छूत का सबसे अधिक कलंक भी भारत में ही रोगियों को झेलना पड़ता है. भारी उपेक्षा का शिकार होना पड़ता है. भारत ने कुष्ठ उन्मूलन का एक लंबा रास्ता भारत ने तय किया है. चाहे गांधी हों, विनोबा हों या बाबा आमटे की पहल. न केवल सामाजिक तौर पर, बल्कि चिकित्सकीय तौर पर भी कुष्ठ का कलंक मिटाने के लिए कोशिशें हुई, लेकिन जैसा कि कोविड ने जीवन के हर पक्ष पर बहुत गंभीर प्रभाव डाले हैं, कुष्ठ उन्मूलन की दिशा में भी किए गए प्रयासों को गहरा धक्का दिया है.


कुष्ठ का प्रभाव हमारे यहां ही नहीं दुनिया में कितना गहरा रहा है, उसके तमाम किस्से नए नहीं हैं. दक्षिण अफ्रीका में गांधी एक सभा को संबोधित कर रहे थे, उन्होंने देखा कि कुछ लोग दूर एक पेड़ के नीचे खड़े हैं,  बुलाने पर भी नजदीक नहीं आ रहे हैं. गांधी ने यह देखा तो वह खुद लोगों के पास जाने लगे, तभी उनमें से एक चिल्लाया कि ‘गांधी भाई यहां मत आईये हम लोग कुष्ठ रोगी हैं.‘ गांधी मना करने के बाद भी वहां गए तो उन्होंने पाया कि उन लोगों के शारीरिक अंग खराब हो रहे हैं.


गांधी ने उनसे इसकी चिकित्सा के बारे में पूछा तो लोगों ने बताया कि कोई भी डॉक्टर उनका इलाज नहीं करना चाहता. वे लोग खुद ही नीम की पत्तियों से अपना इलाज करते हैं. उन्होंने कहा कि वह लोग एक धीमी मौत मर रहे हैं. इसके बाद गांधी आजीवन कुष्ठ रोगियों के लिए कुछ न कुछ करते ही रहे. आपको याद होगा परचुरे शास्त्री. संस्कृत के प्रकांड विद्वान. पर कुष्ठ हुआ तो समाज ने उन्हें धिक्कार दिया. इस अवस्था में वह सेवाग्राम पहुंचे. गांधी ने न केवल उनके इलाज का समुचित इंतजाम किया, बल्कि उनकी मालिश की जिम्मेदारी भी उठाई. सेवाग्राम आश्रम में उनकी वह कुटिया आज भी मौजूद है जहां गांधी ने उनकी सेवा की.


भारत में केवल अंग्रेजों की ही गुलामी नहीं थी. जीवन के ऐसे अनगिनत पक्ष थे, जिनसे लड़ना था, जिनके मुक्ति पाना था. कुष्ठ भी उनमें से एक था, भारत आजाद हुआ तो इसके उन्मूलन के लिए तमाम कोशिशें शुरू हुईं, 2005 आते—आते हम उस मुकाम पर पहुंचे जहां कुष्ठ रोग का प्रिवेलेंस रेट राष्ट्रीय स्तर पर घटकर 0.95 प्रति दस हजार तक जा पहुंचा है.

2020 में कुष्ठ रोगियों का एनुअल डिटेक्शन रेट 4.73 तक आया है, 2014—15 में यह 9.73 था. पिछले पांच—छह सालों में इस दर में काफी गिरावट आई है, लेकिन संख्या की दृष्टि से तो यह फिर भी चुनौतीपूर्ण रहा. इस घटी हुई दर के बावजूद भी पिछले दशक में हर साल तकरीबन सवा लाख नए रोगियों का पता चलता रहा है. हमने लक्ष्य बनाया है कि 2030 तक देश को कुष्ठ रोग से पूरी तरह से मुक्त कर देंगे.


विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट में पता चला है कि जहां 2011 से 2019 तक भारत में औसतन सवा लाख कुष्ठ रोग के केस सामने आते रहे हैं, वहीं वर्ष 2020 में यह आंकड़ा घटकर महज 65 हजार तक सिमट गया है. यह पूरा साल कोविड19 से प्रभावित रहा है. इस रिपोर्ट से पता चलता है कि इस साल कुष्ठ रोगियों की पहचान का काम एकदम से आधे पर आ गया है. यहां यह समझने की बात है कि कुष्ठ रोग उन्मूलन की सबसे बुनियादी बात यह है कि उसे आरंभिक अवस्था में ही पहचान लिया जाए और उसका उपचार शुरू हो जाए.


वर्ष 2021 के आंकड़े अभी सामने नहीं आए हैं, लेकिन उसमें भी हालात कमोबेश ऐसे ही होंगे, क्योंकि न केवल सरकार बल्कि पूरा स्वास्थ्स तंत्र इस दौरान कोविड महामारी से निपटने और उससे बचाव के लिए टीकाकरण जैसे महाअभियानों में लगा रहा है, यह जरूरी था भी, लेकिन इसने ऐसे रोगों के संघर्ष को भी और बढ़ा कर दिया है जो पहले से ही एक चुनौती रहे हैं. अगले दो तीन सालों में शोध के बाद ऐसे कई और पक्ष भी सामने आएंगे जिनके संकेतक कोविड19 के कारण पिछड़ गए हैं.


ऐसे में तैयारी यह भी करना चाहिए कि ऐसी महामारी के दौर में ऐसा और रिजर्व मानव संसाधन तैयार कर लिया जाए जिससे सारा दारोमदार केवल फ्रंट लाइन स्वास्थ्य वर्कर्स पर ही न आ जाए और उनके हिस्से का मूल काम ही न पिछड़ने लग जाए. अभी हमें पक्के तौर पर बिलकुल भी नहीं पता है कि यह महामारी कितनी लंबी चलने वाली है, ऐसे में गैर सरकारी संस्थाओं की भी मदद ले सकती हैं, देश के कोने—कोने में ऐसी स्वयंसेवी संस्थाएं काम भी कर रही हैं, लेकिन उनकी भूमिका को सकारात्मक तरीके से नहीं देखा जा रहा है, उनके सामने फंडिंग्स की दिक्कते हैं, कठोर निर्णयों के कारण उनके वित्तीय संसाधनों में भारी कमी आई है.

बेरोजगारों की एक लंबी फौज है, उनके थोड़े कौशल उन्नयन के साथ ऐसे अभियानों के लिए एक रिजर्व कैडर खड़ा किया जा सकता है, लब्बोलुआब यह है कि भले ही कोविड का संकट सामने है, लेकिन इससे पहले भी हमारे सामने जो संकट थे, और जिन्हें हमने बड़ी कोशिशों से ठीक किया है, कहीं वह दोबारा वहीं जाकर न खड़े हो जाएं.


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
राकेश कुमार मालवीय

राकेश कुमार मालवीयवरिष्ठ पत्रकार

20 साल से सामाजिक सरोकारों से जुड़ाव, शोध, लेखन और संपादन. कई फैलोशिप पर कार्य किया है. खेती-किसानी, बच्चों, विकास, पर्यावरण और ग्रामीण समाज के विषयों में खास रुचि.

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First published: January 31, 2022, 2:44 pm IST