महामारी में लड़ती हमारी सरकारें और मदद की आस में आसमान निहारती जनता

हमने बड़े संकटों के समय पूरे देश को एक होकर लड़ते देखा है. विदेशी हमला हो या कोई प्राकृतिक आपदा, हमने साथ मिलकर सामना किया है. लेकिन महामारी के इस संकट में यह भावना न जाने कहां खो गई है, जबकि कोरोना की दूसरी लहर तो भारत में कहर बनकर टूट रही है.

Source: News18Hindi Last updated on: May 14, 2021, 10:15 PM IST
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महामारी में लड़ती हमारी सरकारें और मदद की आस में आसमान निहारती जनता
कोरोना मरीजों का रिकवरी रेट अब दिन प्रतिदिन बढ़ने लगा है. (File Photo)
देश में कोविड केस ढाई करोड़ तक पहुंचने वाले हैं, ढाई लाख से ज्यादा घोषित मौतें हो चुकी हैं, महामारी अभी थमी नहीं है. ताज्जुब है कि हम एक देश होकर नहीं लड़ रहे हैं! राजनीतिक दलों पर महामारी को हराने से ज्यादा अपने विचार या कहें स्वार्थ हावी हैं. नागरिकों की जान बचाने से ज्यादा नेताओं की छवि चमकाने की चिंता है. इसके लिए अपने-अपने तर्क गढ़े जाते हैं और इल्जाम उछाले जाते हैं. राजनेताओं की ओर से सवाल के जवाब में कभी भी जवाब नहीं आता. हमेशा दूसरा सवाल उछालकर पहले सवाल को दबाने की कोशिश होती है. अगर विपक्ष कोई उचित सुझाव दे तो उसे अनसुना किया जाता है. और बेचारा नागरिक, केन्द्र और राज्यों की सीमाओं में बंधकर परिस्थितियों को बस देख पा रहा है. हम लगभग भूल जाते हैं कि यह एक देश की कहानी है, और इस वक्त पूरी दुनिया हमारी उन तस्वीरों को देख रही है जो दुखी करने वाली तो हैं ही, शर्मनाक भी हैं.

हमने बड़े संकटों के समय हमेशा पूरे देश को एक होकर लड़ते देखा है. खासकर जब कोई विदेशी ताकत भारत माता की तरफ आंख उठाकर भी देखती है तो पूरा देश भरपूर ताकत से उस पर हमला करता है. कोई प्राकृतिक आपदा आती है तब भी हम उससे हुए नुकसान की भरपाई में जी जान से जुट जाते हैं, जख्मों को भरने की कोशिश करते हैं. यह कभी ख्याल नहीं आता कि अमुक इलाके में किसकी सरकार है? वह करगिल का युद्ध हो या भूकंप की विभीषिकाएं या फिर अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर भारतीय नीति, हम हमेशा एक रहे हैं. कुछेक सालों में परिस्थितियां बदली हुई दिखाई दे रही हैं. महामारी के संकट में यह भावना न जाने कहां खो गई है, जबकि यह तो वैश्विक संकट है! और कोविड की दूसरी लहर तो भारत में कहर बनकर टूट रही है.

यह हकीकत अब सब स्वीकार चुके हैं कि कोरोना के सामने हमारी स्वास्थ्य व्यवस्थाएं लगभग नाकाम साबित हुईं. दुनियाभर में कोरोना की दूसरी लहर आई, लेकिन हम इसका अंदाजा लगाने में विफल रहे. वैज्ञानिकों ने सचेत किया था कि किसी भी महामारी में दूसरी-तीसरी लहर तो आती ही हैं. लेकिन हमारी सरकारें तैयारी करने की बजाय इल्जामों की फुटबॉल खेलती रहीं. लोकतंत्र में सरकारें पार्टी आधारित होती हैं. सरकार बनाने के बाद सत्तापक्ष का काम होता है कि वह सबको साथ लेकर काम करे. बिना भेदभाव के. लेकिन हमने केंद्र और राज्य सरकारों को बार-बार उलझते देखा. देश को बचाने की आवाजें कहां हैं, राजनीतिक दल तो देश से ज्यादा अपने खेमे को बचाने में लगे हैं!

यह बताइये कि कोरोना कहां नहीं है? दिल्ली में भी है और महाराष्ट्र, पंजाब, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, केरल और पश्चिम बंगाल में भी है. राज्य में अलग-अलग दलों के नेतृत्व वाली सरकारें हैं, लेकिन केन्द्र में तो एक ही पार्टी है न! देश तो एक ही है न! लोकतंत्र की पटरी पर यदि एक पार्टी ड्राइविंग सीट पर है तो दूसरी पीछे ही रहेंगी. लेकिन रहेंगी साथ ही. एकदूसरे के साथ. लोकतांत्रिक व्यवस्था में सभी दलों की जिम्मेदार होती हैं. ज्यादा सीटों से वह स्वेच्छाचारी नहीं हो सकती. इसी तरह कम सीटें आने से या हार जाने से क्या वह जिम्मेदारी से बाहर नहीं हो जाती हैं? सबका उतना ही महत्वपूर्ण रोल होता है.
होना तो यह चाहिए ​था​ कि इस मुसीबत से लड़ने के लिए सारे राजनीतिक दल एक होते, एक छत के नीचे बैठकर तय करते, सर्वदलीय बैठकों के माध्यम से पूरे देश को एक संदेश दिया जाता कि हम भले ही एक दूसरे के प्रतिद्वंद्वी हैं, लेकिन इस मुसीबत का सामना हम एक होकर करेंगे. ऐसा हो नहीं पाया, ​बल्कि ऐसे सुझावों को भी मन से नहीं सुना गया. हम भूल गए कि जब देशहित की बात आई तो पंडित जवाहरलाल नेहरू ने विरोधी पार्टी के श्यामा प्रसाद मुखर्जी को भी अपनी सरकार में जगह दी या कांग्रेस की नरसिंहराव सरकार ने भाजपा के अटल बिहारी वाजपेयी को यूएन में भारत की ओर पक्ष रखने को भेजा. कोरोनाकाल में भी हमने देखा कि केंद्र की भाजपा सरकार को पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से लेकर कई विपक्षी नेताओं ने सुझावी पत्र लिखे. सरकार ने इन पर क्या फैसला लिया या इन्हें कितनी तरजीह दी, यह तो बाद में पता चला. हां, सबने देखा कि सरकार की ओर से कोई प्रतिक्रिया आने से पहले ही सत्तापार्टी ने इन सुझावी पत्रों का मखौल उड़ाया. हां, यह भी सच है कि सरकार ने विपक्ष के कई सवालों को माना भी है, जिनमें वैक्सीन के आयात से लेकर वैक्सीन के उत्पादन में दूसरी कंपनियों की मदद लेने के सुझाव शामिल हैं. लेकिन क्या यह अच्छा नहीं होता कि अगर यही काम सहमति से होता तो ना सिर्फ देश में, बल्कि दुनिया में भी यह संदेश जाता कि भारतीय संकट में हमेशा साथ खड़े होते हैं.

हमें यह भी सोचना होगा कि केवल सरकार और राजनीतिक दल नहीं, बतौर नागरिक हम इस मुल्क के लिए क्या कर सकते हैं. यदि आज इस महामारी के वक्त हम केवल कोविड प्रोटोकाल का पालन कर लें, अपने-अपने परिवार बचा लें, अपना अड़ोस-पड़ोस बचा लें, अपना गांव ही बचा लें, तो क्या किसी महामारी की हिम्मत है कि वह हमें यूं अस्त-व्यस्त कर पाए. कोई महान काम तो नहीं करना है. ऐसा भी नहीं है कि हम इसे कर पाने में अक्षम हैं. हमारे पास कोई सपोर्टिंग सिस्टम नहीं है. या महामारी इतनी विकट है कि उसे थामा ही नहीं जा सके, यह देखिए कि हमने इस महामारी को फलने-फूलने में कितना योगदान दिया है. उम्मीद रखिए, यह समाज इतना कठोर नहीं है कि वह संकट के समय में मदद नहीं कर पाए, या गरीबों को भूखा मरते देखा करे. यह सब संभव है, लेकिन तब जबकि हम एक देश के रूप में युदध की तरह लड़ेंगे. (डिस्क्लेमर: यह लेखक के निजी विचार हैं.)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
राकेश कुमार मालवीय

राकेश कुमार मालवीयवरिष्ठ पत्रकार

20 साल से सामाजिक सरोकारों की पत्रकारिता, लेखन और संपादन. कई फैलोशिप पर कार्य किया है. खेती-किसानी, बच्चों, विकास, पर्यावरण और ग्रामीण समाज के विषयों में खास रुचि.

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First published: May 14, 2021, 10:15 PM IST
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